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एक्सप्लेनर: विदेश मंत्री ने क्यों दी खाद्य संकट की चेतावनी, क्या पांच करोड़ लोग होने वाले हैं भुखमरी का शिकार?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 29 Sep 2026 07:16 PM IST

सार

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दुनिया में बड़े खाद्य संकट की चेतावनी दी है। जानिए काला सागर मार्ग, होर्मुज से आवाजाही बंद होने, सुपर अल नीनो और उर्वरक किल्लत का भारत की फसलों, महंगाई और जन-जीवन पर क्या असर होगा।
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खाद्य संकट से दुनिया के सामने खतरा। - फोटो : अमर उजाला
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में एक बड़ी चेतावनी दी है। थिंक टैंक- एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के एक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान जयशंकर ने कहा है कि दुनिया में आने वाले कुछ महीनों के अंदर एक 'बड़ा खाद्य संकट' पैदा होने वाला है। उन्होंने इसकी वजह बताई और साथ ही सलाह दी कि कैसे इस संकट के पैदा होने से पहले ही इसे खत्म किया जा सकता है। 

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर विदेश मंत्री आने वाले दिनों में जिस बड़े खाद्य संकट की चेतावनी दे रहे हैं, वह कैसे पैदा हो सकता है और इसके संकेत क्या हैं? विदेश मंत्री ने जिन तीन बातों को इस संकट की वजह बताया है, उनकी स्थिति दुनिया और भारत के लिए कितनी गंभीर है और आगे हो सकती है? भारत की इस संकट से निपटने की तैयारी क्या है? आइये जानते हैं...
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खाद्य संकट से दुनिया के सामने खतरा। - फोटो : अमर उजाला
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में एक बड़ी चेतावनी दी है। थिंक टैंक- एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के एक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान जयशंकर ने कहा है कि दुनिया में आने वाले कुछ महीनों के अंदर एक 'बड़ा खाद्य संकट' पैदा होने वाला है। उन्होंने इसकी वजह बताई और साथ ही सलाह दी कि कैसे इस संकट के पैदा होने से पहले ही इसे खत्म किया जा सकता है। 

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर विदेश मंत्री आने वाले दिनों में जिस बड़े खाद्य संकट की चेतावनी दे रहे हैं, वह कैसे पैदा हो सकता है और इसके संकेत क्या हैं? विदेश मंत्री ने जिन तीन बातों को इस संकट की वजह बताया है, उनकी स्थिति दुनिया और भारत के लिए कितनी गंभीर है और आगे हो सकती है? भारत की इस संकट से निपटने की तैयारी क्या है? आइये जानते हैं...

पहले जानें- एस. जयशंकर का पूरा बयान क्या?

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, "जब खाने की बात आती है तो हम आज वह स्थिति देख रहे हैं, जहां कुछ बड़े अनाज निर्यातक अपना खाद्यान्न भेज नहीं पाएंगे। खासकर काला सागर के जरिए। हम पहले ही फर्टिलाइजर की भारी कमी देख रहे हैं, क्योंकि इसके अधिकतर उत्पादक पश्चिम एशिया और रूस में हैं। उनका फर्टिलाइजर उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके ऊपर हम सुपर-अल नीनो की स्थिति भी देख रहे हैं।"

विदेश मंत्री एस. जयशंकर। - फोटो : अमर उजाला
उन्होंने आगे कहा, "मैं नहीं समझता कि यह जो कुछ हो रहा है वह सोचा-समझा था या नहीं, लेकिन नीति निर्माता यह नहीं कह सकते कि यह स्थिति सोची-समझी नहीं थी। उन्हें अपने आप को उस जगह पर रखकर देखना चाहिए, जहां देश संकट में हैं और सोचना चाहिए कि उनके फैसलों का दुनिया पर क्या असर हो सकता है। देशों को इतना आत्म-केंद्रित नहीं होना चाहिए कि आप अपनी ही दुनिया में रह कर फैसले लेते रहें और कहें कि हमारी मंशा आपका जीवन संकट में डालने की नहीं थी।" 


अब जानें- जयशंकर ने खाद्यान्न संकट की जो वजहें बताईं, वो कितनी गंभीर?

1. काला सागर से अनाज की आपूर्ति प्रभावित
बीते चार साल से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से काला सागर के जरिए आने वाले अनाज की आवाजाही सबसे बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके चलते रूस और यूक्रेन से होने वाला खाद्यान्न निर्यात जबरदस्त रूप से गिरा है। गौरतलब है कि रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया के कुल गेहूं व्यापार का 25% से 30% और कुल अनाज व्यापार का 17% हिस्सा कवर करते हैं। दोनों देशों के प्रमुख बंदरगाहों (जैसे- ओडेसा, नोवोरोसिस्क) और अनाज टर्मिनलों पर सैनिक हमलों के कारण काला सागर मार्ग लगभग ठप हो गया है। रूस की 70% से अधिक और यूक्रेन की भारी निर्यात क्षमता प्रभावित हुई है।

2. ईंधन-उर्वरक का भारी संकट
इसी साल मार्च में शुरू हुए अमेरिका-ईरान युद्ध  के चलते ईंधन-उर्वरक का भारी संकट पैदा हो गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से अलग-अलग देशों को खेती के लिए न तो ईंधन मिल रहा है और न ही खेतों से अनाज-सब्जी-फल उगाने के लिए उनकी उर्वरक की जरूरत पूरी हो पा रही हैं। वसंत बुवाई सीजन के दौरान उर्वरकों की भारी किल्लत के कारण किसान खाद का इस्तेमाल कम कर रहे हैं, जिससे चावल, गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसी मुख्य फसलों की पैदावार में भारी कमी आ रही है।

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होर्मुज संकट के चलते ठप हुई कई अहम उत्पादों की सप्लाई। - फोटो : अमर उजाला
खाड़ी युद्ध और एलएनजी सुविधाओं पर हमलों से समुद्री मार्ग बंद होने के कारण वैश्विक स्तर पर यूरिया और अमोनिया उर्वरकों के दाम 20% से 60% तक बढ़ गए हैं।

3. सुपर अल-नीनो का प्रकोप 
  • प्रशांत महासागर में एक रिकॉर्ड-तोड़ सुपर अल नीनो विकसित हुआ है, जिसके समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया है। 
  • इसकी वजह से भारत, दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिणी अफ्रीका और मध्य अमेरिका में गंभीर सूखा, अप्रत्याशित मानसून और भीषण गर्मी पड़ी है। 
  • शोध दर्शाते हैं कि फसलों की कटाई से पहले होने वाला गंभीर जल संकट सीधे तौर पर वैश्विक खाद्यान्न कीमतों में उछाल की मुख्य वजह है।
  • सुपर अल-नीनो की वजह से चावल निर्यात भी प्रभावित होने की आशंका है, क्योंकि इसके प्रमुख उत्पादक देश, जैसे- भारत में मानसूनी सूखे की स्थिति बनी है, जिससे फसलों की पैदावार और निर्यात प्रभावित हुआ है।

आगे कितना गहरा हो सकता है खाद्यान्न संकट?

अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, जलवायु वैज्ञानिकों और खाद्य संगठनों के अध्ययनों के मुताबिक, आने वाले महीनों और वर्ष 2027 तक यह वैश्विक खाद्यान्न संकट और अधिक गंभीर व विकराल रूप ले सकता है। 

1. भुखमरी और खाद्य असुरक्षा में भारी बढ़ोतरी
  • संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) का अनुमान है कि 'सुपर अल नीनो' के प्रकोप के कारण वर्ष 2027 के अंत तक दुनिया भर में लगभग पांच करोड़ लोग गंभीर भुखमरी के खतरे में पड़ सकते हैं, जिनमें दक्षिणी अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
  • यूएन वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के मुताबिक, काला सागर मार्ग से अनाज का निर्यात ठप होने से 1.5 करोड़ से ज्यादा लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा की ओर धकेले जा सकते हैं। ईरान युद्ध के कारण ईंधन और उर्वरक की कमी से अकेले एशिया महाद्वीप में ही 91 लाख अतिरिक्त लोग खाद्य संकट की चपेट में आ सकते हैं।

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2. खाद्यान्न की कीमतों में अभूतपूर्व उछाल
जलवायु परिवर्तन और जल संकट पर हुए एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, अगर वैश्विक तापमान में 3 डिग्री की वृद्धि होती है, तो वैश्विक बाजार में गेहूं की औसतन कीमतें वर्ष 2010 के मुकाबले तीन गुना ($364 प्रति टन) तक बढ़ सकती हैं।
काला सागर संघर्ष और बंदरगाहों पर हमलों के कारण अंतरराष्ट्रीय शिकागो गेहूं वायदा की कीमतें पहले ही उछलकर 7.90 प्रति बुशेल के स्तर तक पहुंच चुकी हैं, जो पिछले वर्षों की तुलना में 36% से 50% से अधिक की बढ़ोतरी दर्शाती है।

3. प्रमुख फसलों के उत्पादन में भारी गिरावट
  • होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी की वजह से यूरिया, अमोनिया और सल्फर की वैश्विक किल्लत पैदा हो गई है। उर्वरकों के महंगे होने से अगर किसान इनका इस्तेमाल कम करते हैं, तो चावल, गेहूं, मक्का और सोयाबीन जैसी मुख्य फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी- वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के मुताबिक, यह कुछ मामलों में 24 फीसदी तक पहुंच सकती है।

कितनी प्रभावित हुई है ऊर्जा-खाद्य आपूर्ति। - फोटो : अमर उजाला
  • रूस और यूक्रेन के बंदरगाहों पर जारी हमलों के कारण वैश्विक बाजार में जुलाई से मार्च के बीच 2.8 करोड़ टन से अधिक अनाज की कमी हो सकती है, जो कुल वैश्विक अनाज व्यापार का लगभग 5.5% है। 
  • भारत में अल नीनो के कारण मानसूनी बारिश की कमी से चावल के उत्पादन में वर्ष 2009-2010 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट की आशंका है। इसके साथ ही जलाशयों में कम पानी और मिट्टी की नमी घटने के कारण रबी (शीतकालीन) फसलों की बुवाई और पैदावार पर भी सीधा जोखिम मंडरा रहा है।

4. 2027 का चरम संकट और जानमाल का नुकसान
क्लाइमेट इंपैक्ट लैब (सीआईएल) की रिपोर्ट के मुताबिक, सुपर अल नीनो और वैश्विक तापमान में ऐतिहासिक वृद्धि के चलते फरवरी 2027 तक दुनिया भर में 4,51,000 अतिरिक्त मौतें होने की आशंका है। इसमें केवल भारत में ही 15,800 अतिरिक्त मौतें होने की आशंका जताई गई है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के संयुक्त प्रभाव के कारण साल 2027 इतिहास का सबसे गर्म वर्ष बन सकता है, जिससे सूखा और फसल खराब होने जैसी चरम स्थितियां और भीषण हो जाएंगी।

भारत पर इसका असर कितना और कैसा?

वैश्विक खाद्यान्न संकट, उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय किल्लत और सुपर अल नीनो का भारत पर बहुआयामी और गंभीर असर देखने को मिल रहा है। इसका प्रभाव मुख्य रूप से कृषि, खाद्य मुद्रास्फीति, उर्वरक आपूर्ति, जल संकट और जनस्वास्थ्य पर पड़ा है।

कृषि और फसल उत्पादन पर असर
'सुपर अल नीनो' की वजह से दक्षिण-पश्चिम मानसून में राष्ट्रीय स्तर पर 12% तक की गिरावट दर्ज की गई है। देश के लगभग 38% हिस्से में 20% या उससे अधिक की वर्षा कमी रही है, जिसके चलते महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख कृषि राज्यों ने सूखा घोषित कर दिया है।

खरीफ और रबी फसलों पर खतरा
  • खरीफ सीजन में मानसून में अनियमितता के कारण चावल, गन्ना, कपास और मक्का की बुवाई पिछड़ गई है। चावल की पैदावार में वर्ष 2009-10 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। 
  • रबी सीजन के लिए जलाशयों में पानी का स्तर घटने और मिट्टी में नमी की कमी के कारण गेहूं, चना और सरसों जैसी शीतकालीन फसलों की बुवाई और पैदावार पर संकट मंडरा रहा है। अगर वसंत या गर्मी से पहले तापमान फिर बढ़ जाता है तो गेहूं की फसल को भारी नुकसान पहुंच सकता है।

उर्वरक आपूर्ति पर जोखिम
भारत अपनी आवश्यकता का 40% से अधिक यूरिया और फॉस्फेट पश्चिम एशिया से आयात करता है। होर्मुज की नाकाबंदी के बाद सरकार ने अमेरिका, नाइजीरिया और ओमान जैसे अन्य देशों से स्पॉट मार्केट से महंगी दरों पर एलएनजी और यूरिया खरीदकर घरेलू आपूर्ति को बनाए रखा और सब्सिडी बढ़ाकर किसानों पर बोझ नहीं पड़ने दिया। हालांकि, यह स्थिति कितने लंबे समय तक जारी रहेगी, यह सरकार पर पड़ रहे वित्तीय बोझ और इसके असर को देखने के बाद ही स्पष्ट होगा। 

यूरिया की स्थिति नियंत्रण में होने के बावजूद डीएपी और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों का संकट बना हुआ है। कच्चे माल जैसे सल्फर (1,100 डॉलर प्रति टन) और फॉस्फोरिक एसिड के वैश्विक दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे देश में डीएपी और कॉम्प्लेक्स खादों का घरेलू उत्पादन और आयात दोनों प्रभावित हुए हैं।

खाद्य महंगाई और अर्थव्यवस्था 
  • फसलों के प्रभावित होने से खुदरा खाद्य मुद्रास्फीति बढ़कर 5.95% तक पहुंच गई है। खुदरा बाजारों में चावल, चीनी, सूरजमुखी तेल और प्याज की कीमतों में भारी बढ़ोतरी देखी गई है। प्याज के दामों में 101% तक की वृद्धि देखी जा चुकी है।
  • घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार को गैर-बासमती चावल और गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध और कड़े नियम लागू करने पड़े हैं। हालांकि, इससे भारत का निर्यात बाजार बुरी तरह प्रभावित हुआ है और विदेशी मुद्रा की आवक कम हुई है।
  • खाद्यान्न और ऊर्जा की बढ़ती लागत की वजह से कुल मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को ब्याज दरों में कटौती रोकने या उन्हें बढ़ाने पर विचार करना पड़ सकता है। इससे आर्थिक वृद्धि की गति धीमी हो सकती है और भारतीय रुपया पर दबाव बढ़ सकता है।

अल-नीनो से गर्मी-जल संकट, मौतों का खतरा 

अल-नीनो का भारत पर असर। - फोटो : अमर उजाला
जलाशयों में जल स्तर घटने से देश के कई हिस्सों में पीने के पानी की किल्लत और जलविद्युत उत्पादन में कमी की समस्या पैदा होने का खतरा।

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