देश में चीनी की कीमतों में लगातार तेजी ने आम आदमी की चिंता बढ़ा दी है। कुछ बाजारों में चीनी का खुदरा भाव 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है, जबकि देश में औसत खुदरा कीमत भी तेजी से बढ़ी है। बढ़ती कीमतों के बीच केंद्र सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के भारत लाने की अनुमति दी है। करीब एक दशक बाद भारत को चीनी आयात करने की जरूरत पड़ी है। ऐसे में सवाल है कि आखिर चीनी महंगी क्यों हो रही है? क्या देश में चीनी की कमी है, मौसम जिम्मेदार है या फिर एथेनॉल उत्पादन का भी इसमें कोई योगदान है?
दरअसल, चीनी की कीमतों में तेजी की सबसे बड़ी वजह घरेलू बाजार में उपलब्धता को लेकर बढ़ता दबाव है। 15 अप्रैल 2026 तक देश में करीब 273.90 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन हुआ था। इस दौरान 541 चीनी मिलें संचालित थीं और उन्होंने करीब 2,865 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई की। गन्ने से चीनी निकलने की औसत दर 9.56 प्रतिशत रही।
भारत में चीनी उत्पादन मुख्य रूप से महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक पर निर्भर है। 2025-26 सीजन में महाराष्ट्र ने करीब 89.80 लाख मीट्रिक टन, उत्तर प्रदेश ने 65.60 लाख मीट्रिक टन और कर्नाटक ने 41.70 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन किया। ये तीन राज्य मिलकर देश के कुल चीनी उत्पादन में करीब 87.48 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। इसलिए इन राज्यों में बारिश, गन्ने की पैदावार और मिलों का प्रदर्शन पूरे देश के चीनी बाजार पर असर डालता है।
इस बार मौसम भी चिंता बढ़ा रहा है। कमजोर मानसून की आशंका और अल नीनो के खतरे ने गन्ने की अगली फसल पर सवाल खड़े किए हैं। इसके अलावा गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों से भी नुकसान की बात सामने आई है। सरकार के मुताबिक, इस सीजन में चीनी उत्पादन करीब 306 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है, जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों का शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख मीट्रिक टन था।
अब बात एथेनॉल की। केंद्र सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने को लगातार बढ़ावा दे रही है। इसका मकसद पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना, वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना और किसानों की आय बढ़ाना है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि गन्ने से बनने वाले एथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन घरेलू बाजार में उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, केंद्र सरकार इस दावे को खारिज करती है। खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के मुताबिक, चीनी की मौजूदा महंगाई को एथेनॉल उत्पादन से जोड़ना सही नहीं है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, एथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी की हिस्सेदारी 2022-23 में 12 फीसदी थी, जो 2025-26 में घटकर करीब 9 फीसदी रह गई। साथ ही देश में कुल एथेनॉल उत्पादन का करीब 75 फीसदी हिस्सा अब गन्ने के बजाय अनाज, खासकर मक्के से आता है।
सरकार के मुताबिक कीमतों में तेजी के पीछे कम घरेलू उत्पादन, आगामी त्योहारी सीजन की मांग और जमाखोरी जैसे कारण हैं। रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की खपत बढ़ जाती है। ऐसे में अगर बाजार में उपलब्धता पर पहले से दबाव हो तो मांग बढ़ने के साथ कीमतों में और तेजी आ सकती है।
भारत कभी दुनिया के बड़े चीनी निर्यातकों में शामिल था। 2020-21 में भारत ने करीब 70 लाख मीट्रिक टन चीनी का निर्यात किया था, जबकि 2021-22 में यह रिकॉर्ड करीब 110 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया। लेकिन इसके बाद घरेलू उपलब्धता और कीमतों को देखते हुए सरकार ने निर्यात पर नियंत्रण बढ़ा दिया। 2022-23 में निर्यात करीब 63 लाख टन और 2023-24 में लगभग एक लाख टन तक सीमित हो गया।
चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने कई नीतियां लागू की हैं। चीनी और गन्ने को आवश्यक वस्तुओं के दायरे में रखा गया है। गन्ने की कीमत तय करने से लेकर चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत, उत्पादन, भंडारण और आयात-निर्यात तक सरकार के पास नियंत्रण के अधिकार हैं। 2025 में लागू नए चीनी नियंत्रण आदेश के तहत सरकार को उत्पादन, बिक्री, भंडारण, आयात-निर्यात और आवाजाही को नियंत्रित करने के व्यापक अधिकार मिले हैं।
जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक सीमा भी लागू की गई है। 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक चीनी डीलरों के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा तय की गई है। बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिए भी भंडारण की सीमा निर्धारित की गई है, ताकि बाजार में कृत्रिम कमी पैदा न हो।
इसके बावजूद कीमतों में तेजी नहीं रुकी तो सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के भारत लाने की अनुमति दी। सामान्य तौर पर चीनी आयात पर करीब 100 फीसदी शुल्क लगता है, लेकिन इस विशेष व्यवस्था के तहत तय मात्रा में कच्ची चीनी बिना शुल्क के लाई जा सकेगी। आयात की समयसीमा 31 अक्टूबर 2026 तक रखी गई है।
अब सबसे बड़ा सवाल है कि चीनी आएगी कहां से? भारत के चीनी आयात में ब्राजील की बड़ी भूमिका रही है। 2024 में भारत ने करीब 31.89 लाख टन कच्ची गन्ने की चीनी आयात की थी, जिसमें करीब 99.85 फीसदी हिस्सा ब्राजील से आया था। इस बार भी ब्राजील प्रमुख स्रोत हो सकता है। हालांकि, वहां से भारत तक चीनी पहुंचने में करीब दो महीने लग सकते हैं। इसलिए आयात का असर बाजार में तुरंत दिखाई देने के बजाय अक्टूबर के आसपास ज्यादा स्पष्ट हो सकता है।
अब बात आम आदमी की जेब की। उपभोक्ता मामलों के विभाग के मुताबिक 20 अगस्त को देश में चीनी का औसत खुदरा मूल्य करीब 55.70 रुपये प्रति किलो था। एक सप्ताह पहले यह 50.98 रुपये, एक महीने पहले 48.18 रुपये और एक साल पहले 46.30 रुपये प्रति किलो था। यानी एक साल में औसत कीमत करीब 9.40 रुपये प्रति किलो बढ़ चुकी है।
कुछ बाजारों में स्थिति इससे भी ज्यादा गंभीर है। अलीगढ़ में चीनी करीब 61 रुपये किलो, जबकि पंजाब में करीब 65 रुपये किलो तक पहुंचने की खबरें हैं। मुंबई और भोपाल समेत कुछ बाजारों में भी कीमत 58 से 63 रुपये किलो के बीच बताई जा रही है।
यानी इस समय चीनी बाजार के सामने चुनौती सिर्फ उत्पादन की नहीं, बल्कि मांग, उपलब्धता, मौसम, स्टॉक और नीतियों के बीच संतुलन बनाने की है। सरकार ने आयात का रास्ता खोल दिया है और जमाखोरी पर भी निगरानी बढ़ाई है। लेकिन आयातित चीनी बाजार में पहुंचने में समय लगेगा। ऐसे में त्योहारों के सीजन से पहले आम आदमी को कितनी राहत मिलेगी, यह आने वाले हफ्तों में चीनी की घरेलू आपूर्ति और कीमतों की दिशा तय करेगी।