कठपुतली के जरिए पढ़ा रहीं मैथ्स। सरकारी स्कूल की शिक्षिका सुमन यादव का अनोखा प्रयास। गणित अक्सर कठिन और नीरस विषय माना जाता है। लेकिन जब वही जोड़-घटा, गुणा-भाग कठपुतली के मुख से निकलता है, तो बच्चा हंसते-हंसते सीख जाता है। कठपुतली एक मित्र बन जाती है, शिक्षक नहीं। डर खत्म होते ही सीखने की गति बढ़ जाती है। और इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैंने अपने गणित शिक्षण में कठपुतलियां को स्थान देना प्रारंभ किया। गिनती, स्थानीय मान, परिमाप जैसे अमूर्त सिद्धांत कठपुतली के खेल में मूर्त हो जाते है।कठपुतली के साथ संवाद में बच्चे केवल सुनते नहीं, जवाब देते है, सवाल पूछते हैं। कठपुतली के साथ खेलते हुए कभी वे दुकानदार बन जाते है, कभी किसान । हर भूमिका में गणित का नया प्रयोग जुड़ जाता है। बाजार का हिसाब, खेत का मापन, समय की गणना - सब कहानी में समा जाता है। मेरा उद्देश्य बच्चों को उत्तर याद कराना नहीं, सोचने की क्षमता विकसित करना है। कठपुतली बच्चों की कल्पना, भाषा और तर्क शक्ति तीनों को एक साथ विकसित करती है। जैसा कि कहा गया है - जो आंख देखती है, वह मन याद रखता है। जो हाथ करता है, वह मस्तिष्क समझता है। इसीलिए मैंने कठपुतलियों को कक्षा में लाया और गणित को खेल बना दिया।