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बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया की खोज: हिमाचल में मिली रसभरी की नई प्रजाति, किसानों की आय का विकल्प बनेगा फल

Mon, 03 Aug 2026 06:45 AM IST
दुष्यंत शर्मा सुरेश शांडिल्य, शिमला

सार

यह नया पौधा हिमाचल ही नहीं देश भर के किसानों व बागवानों के लिए भी आय का एक उपयोगी विकल्प हो सकता है। इस नई प्रजाति को फिजैलिस हिमाचलेंसिस नाम दिया गया है।
 
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सोलन में मिली नई प्रजाति। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मैदानी राज्यों में पाई जाने वाली खट्टी-मीठी रसभरी की एक नई प्रजाति की हिमाचल प्रदेश में खोज हुई है। इसे बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने सोलन में नौणी विश्वविद्यालय के पास खोजा है। यह प्रजाति सड़क किनारे घास वाले क्षेत्र में लगभग 1,327 मीटर की ऊंचाई पर पाई गई। करीब 50 वर्गमीटर क्षेत्र में इसके 35 से 50 पौधे पाए। यह नया पौधा हिमाचल ही नहीं देश भर के किसानों व बागवानों के लिए भी आय का एक उपयोगी विकल्प हो सकता है। इस नई प्रजाति को फिजैलिस हिमाचलेंसिस नाम दिया गया है।

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इसका खुलासा शोधपत्र ए न्यू स्पीशिज ऑफ फिजैलिस फ्रॉम हिमाचल प्रदेश इंडिया में हुआ है। यह अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका डिस्कवर प्लांट्स में 16 जुलाई 2026 को प्रकाशित हुआ है। शोधपत्र के लेखक केंद्रीय क्षेत्रीय केंद्र बॉटनिनिकल सर्वे ऑफ इंडिया के विनय रंजन, हाई अल्टीट्यूड्स वेस्टर्न हिमालयन रीजनल सेंटर बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया सोलन के कुलदीप सिंह डोगरा, कुमार अंबरीश व रितेश कुमार सिंह हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार यह नई प्रजाति वर्ष 2022 में डॉ. वाईएस परमार विश्वविद्यालय परिसर में वनस्पति सर्वेक्षण के दौरान पहली बार देखी गई थी। इसके बाद वर्ष 2023 और 2024 में इसकी आबादी और विशेषताओं का अध्ययन किया गया। पौधे के नमूनों की देश के विभिन्न हर्बेरियम (संरक्षित पौधों के नमूनों और उनसे जुड़ी जानकारी का एक व्यवस्थित संग्रह) में उपलब्ध प्रजातियों तथा वैज्ञानिक साहित्य से तुलना की गई। विस्तृत जांच में पाया गया कि यह प्रजाति पहले वर्णित किसी भी फिजैलिस प्रजाति से मेल नहीं खाती। 
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गमले में भी उगा सकते हैं रसभरी रसभरी को घर की छत, बालकनी, आंगन में गमले या ग्रो बैग में भी उगाया जा सकता है। इसके लिए कम से कम 10 से 20 लीटर क्षमता का गमला उपयुक्त माना जाता है। रसभरी को पोषक तत्वों से भरपूर भी माना जाता है। इसके पके फलों में विटामिन-सी, एंटीऑक्सीडेंट, कैरोटिनॉयड और अन्य जैव सक्रिय तत्व पाए जाते हैं। पारंपरिक चिकित्सा में रसभरी की कुछ प्रजातियों का उपयोग सूजन, दर्द, बुखार और पाचन संबंधी समस्याओं में किया जाता रहा है। 

हिमाचल प्रदेश में इस पौधे की नई प्रजाति का मिलना एक उपलब्धि हो सकता है। राज्य के बागवानों के लिए यह खोज उपयोगी बन सकती है। बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट को देखा जाएगा। इस पौधों को बागवानों तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास होंगे।  
- डॉ. सतीश शर्मा, निदेशक, बागवानी विभाग, हिमाचल प्रदेश

15 सेंटीमीटर ऊंचा है पौधा अच्छा है फल का स्वाद
इस पौधे के पीले फूल और खाने योग्य फल इसकी खास पहचान है। इसके पौधे में छोटे-छोटे फल उगते हैं। ये ग्राउंड चेरी की तरह नजर आते हैं। इस पौधे की ऊंचाई लगभग 10 से 15 सेंटीमीटर होती है। इसमें सरसों जैसे पीले रंग के फूल खिलते हैं, जिनके मध्य भाग का रंग काला होता है। इसके फल गोलाकार, गूदेदार और पकने पर पीले हो जाते हैं। शोध में इन फलों को खाने योग्य बताया गया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि नई प्रजाति के फल स्वाद में अच्छे पाए गए हैं।

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