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UP: कर्मचारी की मृत्यु पर वारिस ले सकेंगे मेडिकल खर्च, कोर्ट ने इलाज के दौरान मृत्यु पर भुगतान का दिया निर्देश

Sun, 29 Mar 2026 10:45 PM IST
Ishwar Ashish Bhartiya अमर उजाला नेटवर्क, बलरामपुर

सार

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि नियम-16 की यह व्यवस्था मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करती है। मृतक के कानूनी वारिसों को अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
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सरकारी कर्मचारी या पेंशनर की इलाज के दौरान मृत्यु होने या उसके दावा करने में असमर्थ होने पर उसके कानूनी वारिस भी मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने इस अहम फैसले के साथ संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया कि याची के दावे पर दो माह के भीतर पुनर्विचार कर निर्णय ले। दावा सही मिलने पर एक माह के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

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न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने यह फैसला चंद्रचूड़ सिंह की याचिका पर दिया याची के पिता सेवानिवृत्त डिप्टी रजिस्ट्रार थे। उनका लखनऊ के निजी अस्पतालों में इलाज हुआ था, जहां उनका निधन हो गया। याची ने इलाज में हुए खर्च की प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया था, लेकिन विभाग ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि नियमों के तहत केवल लाभार्थी ही दावा कर सकता है। राज्य सरकार ने दलील दी कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा उपस्थिति) नियम, 2011 के तहत दावा केवल लाभार्थी द्वारा ही किया जा सकता है और याची इस श्रेणी में नहीं आता। साथ ही, प्रस्तुत उत्तराधिकार प्रमाण पत्र में निर्धारित सीमित राशि का भी हवाला दिया गया।

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कोर्ट ने राज्य सरकार की दलील को किया खारिज, कहा- नियम-16 की व्यवस्था मनमानी, समानता के अधिकार का उल्लंघन
कोर्ट ने राज्य सरकार के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि नियम-16 की यह व्यवस्था मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करती है। अदालत ने कहा कि यदि किसी लाभार्थी की मृत्यु हो जाती है या वह दावा करने में अक्षम हो जाता है तो उसके कानूनी वारिसों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने रीडिंग डाउन के सिद्धांत को लागू करते हुए निर्देश दिया कि नियम-16 की व्याख्या इस प्रकार की जाए कि उसमें कानूनी वारिसों को भी शामिल माना जाए, विशेषकर तब जब कोई अन्य पात्र लाभार्थी मौजूद न हो। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि वारिस होने को लेकर कोई विवाद नहीं है तो केवल तकनीकी आधारों पर दावा खारिज करना उचित नहीं है।

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