लखनऊ। प्रदेश में ऐतिहासिक धरोहरों और दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण की दिशा में सरकार की पहल को अमली जामा पहनाने की दिशा में काम शुरू हो गया है। यहां राजकीय अभिलेखागार में सोमवार से शुरू हुई पांच दिवसीय अभिलेख एवं पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला में इतिहास शोध के नए आयाम, डिजिटाइजेशन, अभिलेख संरक्षण और आर्काइव्स में कॅरिअर की संभावनाओं पर विशेषज्ञों ने शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया।
मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त सहायक निदेशक, राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली डॉ. राजमणि ने प्राथमिक शोधार्थियों को सोशल मीडिया व इंटरनेट की सूचनाओं को बिना सत्यापन शोध में शामिल न करने की सलाह भी दी। आर्काइव्स का क्षेत्र अब केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं है, निजी कंपनियां और विश्वविद्यालय भी अपने अभिलेखागार विकसित कर रहे हैं। निदेशक अभिलेखागार अमित कुमार अग्निहोत्री ने बताया कि 700 से अधिक पंजीकरण में से 200 प्रतिभागियों का चयन किया गया है। ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के तहत 75 जिलों में पांडुलिपियों का सर्वे व डिजिटाइजेशन होगा।
कार्यशाला में दी वीरता पुरस्कारों की जानकारी
कार्यशाला के द्वितीय सत्र में विशिष्ट अतिथि निदेशक, हिस्ट्री डिवीजन, रक्षा मंत्रालय डॉ. अमलेश कुमार मिश्र ने सैन्य अलंकरणों के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्रीय समर स्मारक में अंकित वीरों के योगदान की चर्चा की। वर्ष 1950 में परमवीर चक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र की शुरुआत हुई। अब तक 21 परमवीर चक्र, 214 महावीर चक्र और 1300 से अधिक वीर चक्र दिए जा चुके हैं। राष्ट्रीय समर स्मारक में करीब 27 हजार वीरों के नाम अंकित हैं। प्रतिभागियों ने शोध और कॅरिअर से जुड़े सवाल पूछे।
अभिलेख एवं पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला
अभिलेख एवं पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला
अभिलेख एवं पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला
अभिलेख एवं पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला
अभिलेख एवं पांडुलिपि अभिरुचि कार्यशाला