: अमर उजाला संवाद लखनऊ 2026 के पहले दिन जहां आध्यात्म, प्रेरणा और विकास की गूंज सुनाई दी, वहीं दूसरे दिन कार्यक्रम का माहौल स्वाद, संघर्ष और सफलता के रंगों से भर गया। मशहूर सेलिब्रिटी शेफ हरपाल सिंह सोखी ने मंच पर पहुंचकर अपने अनोखे अंदाज में जिंदगी के किस्सों को साझा किया।
कैसे आया नमक-शमक का विचार?
‘स्वाद और सफलता का तड़का’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने सबसे पहले अपनी जिंदगी से जुड़ा एक किस्सा शेयर किया। उन्होंने कहा कि नमक-शमक प्रबंधन का सबक बन गया है। जब तक हम दबाव में नहीं आते, अच्छे विचार नहीं निकल पाते। हमारे शो के एक निर्देशक थे। उन्होंने कहा कि लोग मरने के बाद हमें कैसे याद रखेंगे? हमने कहा कि जीते-जी लोग याद रख लें, यह काफी है।
शूटिंग बंद होने के बाद बेटी को बताया कि निर्देशक ने यह बात कही थी। बेटी सत्याग्रह पर एक किताब पढ़ रही थी। उससे एहसास हुआ कि नमक सत्याग्रह से जो आंदोलन शुरू हुआ, वह आजादी के प्रयासों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। सारे बड़े नेता तब बड़े काम करना चाहते थे। गांधीजी ने सबसे छोटी चीज यानी नमक को आंदोलन के लिए चुना। उसे फिर हमने खाने से जोड़ा। नमक सही मात्रा में हो, तो बाकी सारी जायकों को बेहतर कर देता है।
यहीं से विचार आया। नमक बहुत बढ़िया चीज है। पंजाबी हैं, तो नमक-शमक जुबान पर आ गया। यह यूरेका मोमेंट था। फिर इसे जिंगल के रूप में गाना शुरू किया। आज से 15 साल पहले यह वायरल हो गया। कम से कम सौ वर्षों के लिए यह किचन में खुशियां बिखेरते रहेगा।
मजेदार होनी चाहिए पढ़ाई
आगे उन्होंने कहा कि होटल मैनेजमेंट में बहुत सारे विषय होते हैं। तब साइंस के स्टूडेंट होने के नाते लगता था कि इतने सारे विषयों की क्या जरूरत है। आज बतौर उद्यमी लगता है कि कानून या अकाउंटिंग ठीक से पढ़ा होता, तो अपना हिसाब-किताब बेहतर ढंग से समझ लेता।
जब हम युवा होते हैं, तब बहुत सारी चीजें हमें समझ नहीं आती। शिक्षा व्यवस्था को हम उत्साहजनक नहीं बना पाते। उसे बोझिल बना देते हैं। इसलिए सारी दिक्कतें शुरू होती हैं। पढ़ाई जितनी मजेदार होगी, उतनी जेहन में याद रहेगी।
खाने में एक्सपेरिमेंट पर बोले ये
खाने में नवाचार पर उन्होंने कहा कि अलग-अलग चीजों का प्रयोग करना अपराध नहीं है। कौन सी चीज कहां चल जाए ये किसी को नहीं पता। अगर कोई कोम्बिनेशन हेल्थ के लिए बेहतर है और अच्छा लग रहा है तो वो बेस्ट माना जाता है। क्योंकि आज के समय में हर कोई कुछ नया ही खाना चाहता है।
जब राष्ट्रपति को बनाकर खिलाया था खाना
जब उनसे पूछा गया कि हाल ही में उन्होंने वियतनाम के राष्ट्रपति 'तो लाम' के लिए आयोजित राजकीय भोज के लिए खाना तैयार किया था तो उन्हें कैसा लगा था तो उन्होंने बताया कि इस राजकीय भोज के पहले मैंने प्रेसिडेंट को प्री टेस्टिंग कराई थी तो उन्होंने मुझे पहचान लिया था।
राष्ट्रपति ने मुझसे कहा कि आप तो नमक-शमक वाले हैं, आपको तो मैंने देखा है काफी। उन्होंने मुझे पहचाना था, ये मेरे लिए गर्व की बात है। उन्होंने मुझसे कहा था, अब आपके ऊपर अब देश के सम्मान की जिम्मेदारी है और हमने वो जिम्मेदारी बखूबी निभाई। मैनें इस दौरान एकदम भारत का खाना सर्व किया था, जिसकी काफी सराहना भी हुई थी। 50 मिनट में हमने 7-10 कोर्स का मेन्यू सर्व किया था।
क्या वेज और नॉनवेज खाना अलग बनता है?
जब उनसे पूछा गया कि बड़े रेस्टोरेंट में नॉनवेज और वेज खाना अलग बनता है क्या तो उन्होंने आगे बताया कि बड़े रेस्टोरेंट में खाने को अलग-अलग जगह पर नहीं बनाया जाता। हाइजीन का हम सभी बहुत ध्यान रखते हैं। जो रेस्टोरेंट नॉनवेज और वेज दोनों सर्व करते हैं, वहां सेपरेशन नहीं होता। वहां कोडिंग के हिसाब से खाना तैयार किया जाता है। जैसे कि लाल चॉपिंग बोर्ड नॉनवेज के लिए और हरा वेज के लिए। स्टोरेज का हम सभी बहुत ध्यान रखते हैं। बस ये होता है कि एक खाना बनने के बाद बर्तन को तुरंत धोया जाता है। उसके बाद ही उसमें दूसरा पकवान तैयार किया जाता है।
एलपीजी की किल्लत पर बोले शेफ
उन्होंने एलपीजी की किल्लत पर बोला कि इस दिक्कत में शेफ से पहले हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री को सबसे ज्यादा परेशानी होती है। वहां से हमें दिक्कतें शुरू होती है। मैं ये नहीं कहूंगा कि आज के समय में कोई दिक्कत नहीं है। भले ही सभी को सिलिंडर मिल रहा है लेकिन उसकी कीमत ज्यादा है। ऐसे में अगर आपकी जरूरत 10 सिलिंडर की है लेकिन आपको 3 मिल रहे हैं, तो आपको चीजें मैनेज करनी पड़ती है। ऐसे समय में कटौती करना पड़ता है। जैसे मैन्यू में चीजें कम हो जाती हैं, जिसका प्रभाव बिजनेस पर पड़ता है। जबकि विदेशों में सरकार आगे बढ़कर उन इंडस्ट्री को सर्पोट करती है, जिसमें किल्लत देखी जाती है।
आज के समय रेस्त्रां पुराने व्यंजनों की ओर लौट रहे
सोखी ने कहा कि चार-पांच साल पहले से हम बहुत फ्यूजन अपना रहे थे। हालांकि, आज रेस्त्रां जड़ों की ओर लौट रहे हैं। एक छोटा उद्यमी भी कुछ बना रहा है, तो उसे आगे लाने का प्रयास होता है। जैसे- बेला-चमेली का शरबत। बीकानेर में हमने इसे चखा था। इसे शाही महलों में मुखवास के रूप में परोसा जाता है। एक व्यक्ति वहां कुल्हड़ में यह शरबत बेचता था।
सारे रेस्त्रां के जरिए अब हम उस उद्यमी को प्रोत्साहित कर रहे हैं। खाना तो जज्बात है। खाना दिल से जुड़ा है। जैसे- लखनऊ खाने के लिए जाना जाता है। कबाब के साथ-साथ यहां मलाई-रबड़ी भी मशहूर है। हमारे देश में सौ ऐसे शहर होंगे, जो किसी न किसी खाने के लिए जाने जाते हैं।
जैसे कि यूपी में एक जिला, एक व्यंजन की शुरुआत हुई है। यह अच्छी पहल है। मैं हाल ही में कानपुर गया था, तब मुझे इस पहल के बारे में पता लगा। इसी तर्ज पर हमारे रेस्टोरेंट के मेन्यू में भी हर शहर के जायके का जिक्र है। हम वहां जाकर सीखते हैं और फिर उसी नाम से अपने मेन्यू में बेचते हैं। जैसे- दीनानाथ महाराज की टमाटर की चाट। हमने सभी पकवानों की असल पहचान का आगे रखा है, ताकि लोग उसे उसी नाम से पहचाने।