फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kathua News: अस्पताल स्टाफ के सहारे नर्सिंग कॉलेज की पढ़ाई, तीन साल से नहीं है स्थायी फैकल्टी, न ही योग्य ट्यूटर्स

विज्ञापन
विज्ञापन
कठुआ। राजकीय मेडिकल कॉलेज के अंतर्गत संचालित बीएससी नर्सिंग कॉलेज तीन साल से जुगाड़ से चलाया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इतने लंबे समय के बाद भी न तो स्थायी फैकल्टी की नियुक्ति की गई है और न ही योग्य ट्यूटर्स की व्यवस्था है। इस कारण नर्सों को रोटेशन के आधार पर तैनात किया जा रहा है जिसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
विज्ञापन


तीन बैच के लगभग 180 विद्यार्थियों का भविष्य प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ रहा है। विद्यार्थियों का पाठ्यक्रम मेडिकल कॉलेज में तैनात नर्सिंग स्टाफ के सहारे पूरा करवाया जा रहा है। वर्तमान में मेडिकल कॉलेज प्रशासन द्वारा तीन स्टाफ नर्सों को रोटेशन के आधार पर तैनात किया गया है। प्रत्येक नर्स प्रतिदिन तीन-तीन लेक्चर ले रही हैं, साथ ही अस्पताल में जिम्मेदारी संभाल रही हैं। अतिरिक्त बोझ के कारण न तो मरीजों की देखभाल ठीक से हो रही है और न ही छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है। विद्यार्थियों का कहना है कि किसी भी डिग्री के लिए पढ़ाई और प्रैक्टिकल के बीच संतुलन होना चाहिए, लेकिन कॉलेज प्रशासन द्वारा जितना ध्यान प्रैक्टिकल पर दिया जाता है, उतना पढ़ाई में नहीं दिया जा रहा है।
इन दिक्कतों से जूझ रहे विद्यार्थी


वर्तमान में शहर के बीचों बीच महात्मा गांधी जच्चा-बच्चा अस्पताल की नवनिर्मित इमारत से नर्सिंग कॉलेज चल रहा है। यहां मात्र तीन व्याख्यान कक्ष है। प्रत्येक कक्ष में 60 विद्यार्थियों को पढ़ाया जा रहा है। नर्सिंग परिषद के नियमों के अनुसार 10 विद्यार्थियों के लिए एक शिक्षक होना चाहिए, मगर वर्तमान में 60 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक है, वह भी अस्थायी। यही नहीं, विद्यार्थी कक्षाएं लगाने के लिए शहर में आने को मजबूर हैं। जबकि प्रैक्टिकल के लिए प्रतिदिन पांच किलोमीटर दूर मेडिकल कॉलेज के सहायक अस्पताल में जाते हैं।
विज्ञापन


नर्सिंग कॉलेज के लिए ट्यूटर्स के पद स्वीकृत नहीं किए गए। मामला प्रशासनिक विभाग के समक्ष उठाया गया है। उम्मीद है कि जल्द पदों को भरने की स्वीकृति मिलेगी। ट्यूटर्स न होने से मेडिकल कॉलेज का स्टाफ नर्सिंग कॉलेज में तैनात किया जा रहा है। इससे न सिर्फ अस्पताल में मरीजों का इलाज प्रभावित हो रहा है, बल्कि विद्यार्थियों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पा रही है।
विज्ञापन




- सुरिंदर अत्री, प्रधानाचार्य, जीएमसी कठुआ।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें