ऊपर से देखें तो यह चुनाव विकास नौकरी और सुशासन की कहानी लगता है मगर जमीन में पैर रखते ही एहसास होता है कि इस बार की राजनीति तीन धाराओं में बह रही है जाति की अदृश्य रेखा, युवा वर्ग की बेचैनी और महिलाओं की साइलेंट वफादारी इन तीनों के बीच एनडीए और महागठबंधन ने अपनी अपनी रणनीतियों की बिसात बिछा रखी है।
दूसरे चरण की रैलियां थमते ही बिहार की फिजा में एक अजीब सी शांति उतर आई है। हवा में वह चुनावी हुड़दंग नहीं है। शांति से हर मतदाता अपना अपना हिसाब लगा रहा है। सड़कों पर शोर भले कम हो पर अंदरूनी उथल पुथल कहीं ज्यादा तेज है। यह वही साइलेंट बिहार है जो मंचों पर बड़े बड़े मुद्दे सुनता है और गलियों में बिल्कुल अलग भाषा बोलता है।
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ऊपर से देखें तो यह चुनाव विकास नौकरी और सुशासन की कहानी लगता है मगर जमीन में पैर रखते ही एहसास होता है कि इस बार की राजनीति तीन धाराओं में बह रही है जाति की अदृश्य रेखा, युवा वर्ग की बेचैनी और महिलाओं की साइलेंट वफादारी इन तीनों के बीच एनडीए और महागठबंधन ने अपनी अपनी रणनीतियों की बिसात बिछा रखी है।
एनडीए : सुशासन का नारा और महिला कवच
पटना में पिछले दो हफ्तों से हेलिकॉप्टरों की आवाज लगातार गूंजती रही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह तक हर बड़े चेहरे ने बिहार की जमीन पर दस्तक दी। हर सभा हर रोड शो में संदेश एक ही नीतीश कुमार का नेतृत्व और सुशासन की वापसी यह पूरे गठबंधन की संगठित मशीनरी का प्रदर्शन था। अशक्त कहे जा रहे नीतीश कुमार के 163 से अधिक रैलिया करने का आंकड़ा अपने आप में बताता है कि एनडीए ने चुनावी मोर्चा किसी एक दल पर छोड़ा ही नहीं।
महिलाओं के बीच तस्वीर अलग है दलित बस्तियों से लेकर गांव की चौपालों तक महिलाए नीतीश के लिए एक सधी हुई वफादारी के साथ खड़ी दिखती हैं। शराबबंदी, पेंशन, साइकिल मनी, आंगनवाड़ी की योजनाएं इन सभी का असर उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में सीधे-सीधे महसूस होता है। यही एनडीए का महिला कवच है। वहीं जमीनी रिपोर्ट अलग कहानी कहती है। खासकर युवा मतदाता की नजरों में एक थकान एक सवाल सा दिखता रहा नौकरी कहां है एनडीए के बूथ प्रमुख अगड़ी और ईबीसी बस्तियों में जंगलराज का डर दोहराते दिखे।
महागठबंधन : 'माई' की मौन गोलबंदी और युवा बेचैनी
तेजस्वी यादव की सभाओं का रंग इस बार अलग दिखा। कम शोर ज्यादा अनुशासन मंच पर तेजस्वी बेरोजगारी महंगाई और सरकारी नौकरी की बात करते हैं। मंच के पीछे ब्लॉक स्तर के नेता मौन माई समीकरण मुस्लिम और यादव वोट को धीरे धीरे एकजुट करने में लगे रहते हैं। मुस्लिम बहुल इलाकों में इस बार बड़ी रैलिया नहीं बल्कि छोटे छोटे संपर्क अभियान हुए लक्ष्य स्पष्ट था ज्यादा शोर से ध्रुवीकरण बढ़ सकता है इसलिए साइलेंट गोलबंदी ही काम करेगी।
यादव बस्तियों में पुरानी पारिवारिक निष्ठा अभी भी कायम है जबकि गैर यादव बेरोजगार युवाओं में तेजस्वी की नई छवि ने जगह बनाई है यह बदलाव सबसे ज्यादा सीमांचल की गलियों में महसूस होता है जहां महागठबंधन की कतारों में मुस्लिम महिलाओं की शांत उपस्थिति और युवाओं की उत्सुकता एक साथ दिखी महागठबंधन के स्थानीय नेता यादव और मुस्लिम समुदाय को एकजुट रहिए की फुसफुसाहट सुनाते रहे।
चुनाव में तीसरी परत: पीके और ओवैसी की भूमिका
हालांकि यह चुनाव सिर्फ दो ध्रुवों की टक्कर नहीं है एक तीसरी परत भी मैदान में काम कर रही है। प्रशांत किशोर का जन सुराज ये राज्यव्यापी लहर तो नहीं बना पाए। इसके बावजूद कई सीटों पर अगड़ी जातियों और पढ़े लिखे युवाओं में उनका प्रभाव दिखा जिससे मुकाबला त्रिकोणीय बन गया। वहीं सीमांचल में एआईएमआईएम की भूमिका भी इसी तरह है शोर भले कम रहा पर बूथों पर उनका असर दिखा। यह असर महागठबंधन के मुस्लिम वोटबैंक की लाइन में हल्की सी दरार डाल सकता है।
सन्नाटे की राजनीति: मंच पर विकास गलियों में जाति
इन सबके बीच जिस चीज़ की मौजूदगी सबसे ज्यादा खटकती है वह है जाति किसी नेता ने मंच पर जाति की बात नहीं की किसी पोस्टर पर जातीय संदेश नहीं लिखा गया लेकिन कैंपेन की असली भाषा जाति में ही थी मंचों पर विकास पर गलियों में जाति की सच्चाई खुलेआम थी एनडीए के बूथ कैंप में अगड़ी जाति के बुजुर्ग प्रभारी और महागठबंधन के लोकल कैंपों में हमारा लड़का वाली भावना का प्रसार इसका सीधा प्रमाण है।
इस पूरे परिदृश्य में वह असल टकराव सामने आता है महिलाओं का भरोसा और युवाओं का गुस्सा महिलाए नीतीश कुमार के मॉडल को स्थिरता के रूप में देखती हैं जबकि युवा वर्ग बदलाव और नौकरी की उम्मीद तेजस्वी में ढूंढ रहा है इन दोनों के बीच जातीय गोलबंदी की अदृश्य दीवारें दोनों गठबंधनों के लिए अवसर भी पैदा करती हैं और खतरा भी। बिहार की इस साइलेंट लड़ाई का फैसला भी साइलेंट वोटिंग में ही छिपा है बाहर शोर कम है लेकिन भीतर जुबानें तेज हैं चुनाव प्रचार भले थम गया हो पर सन्नाटा ही इस बार सबसे ज़्यादा बोल रहा है।
नारों में छिपे जातीय और राजनीतिक संदेश
मंचों पर विकास और रोजगार के बड़े नारे लगाए गए, लेकिन जमीन पर कैंपेन ने जातीय संकेत और डर का संचार किया। इस साइलेंट चुनाव की असली कहानी को इन नारों से पढ़ सकतें हैं। "जंगलराज लौटेगा? नीतीश जी रहे तो चैन रहेगा नहीं त फिर वही पुरान दिन।" यह एनडीए के कार्यकर्ताओं द्वारा अगड़ी जातियों, ईबीसी और महिला वोटरों को दिया गया सीधा संदेश था। इसका छिपा हुआ अर्थ साफ था कि महागठबंधन की वापसी से सुरक्षा और सामाजिक अस्थिरता का डर पैदा करना, और जातीय वर्चस्व को रोकना। यह मुख्य रूप से सुरक्षा और स्थिरता पर आधारित डर का संचार था।
"तेजस्वी ही रोजगार तेजस्वी ही बदलाव।" महागठबंधन ने मंच से इस नारे के साथ लालू राज की पुरानी छवि से दूरी बनाई। यह युवा बेरोजगारों और गैर यादव युवाओं को लक्षित करता था, जिसका मकसद तेजस्वी की नई छवि को स्थापित करना और नौकरी के वादे के इर्द गिर्द युवा वर्ग को गोलबंद करना था। "हमारा लड़का।" "हमरा वोट फूटल नइखे।" यह नारा महागठबंधन के कार्यकर्ताओं ने गलियों में यादव और मुस्लिम समुदाय को दिया एक भावनात्मक संदेश था। इसका अर्थ था माई समीकरण को एकजुट रखना और यह सुनिश्चित करना कि किसी भी कीमत पर वोट विभाजित न हो।
"चुपचाप वोट।" महागठबंधन के समर्थकों ने मुस्लिम समुदाय को यह संदेश दिया। यह ध्रुवीकरण से बचने के लिए राजनीतिक चेतना को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित न करने की रणनीति थी, जिसका सीधा मतलब था मौन रहकर महागठबंधन को वोट देना।
"हमारी आवाज।" एआईएमआईएम के पोस्टरों ने सीमांचल में मुस्लिम समुदाय को यह संदेश दिया। इसका मकसद महागठबंधन के बावजूद मुस्लिमों की एक स्वतंत्र और सशक्त पहचान की राजनीतिक जरूरत को दर्शाना था।
"अपना कैंडिडेट चुनने का समय है।" प्रशांत किशोर (पीके) के कार्यकर्ताओं ने अगड़ी जाति के युवा और असंतुष्ट वोटर को यह संदेश दिया, जिसका आशय दोनों गठबंधनों से अलग एक नई राजनीतिक शक्ति के लिए वोट देने का आह्वान करना था।