{"_id":"6ada9a95f0626dd8790c0964","slug":"taiwan-women-reservation-parliament-42-percent-representation-gender-equality-2026-10-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"ताइवान की संसद में 42 फीसदी महिलाएं: 80 साल पुराने आरक्षण मॉडल ने बदली तस्वीर, एशिया में सबसे आगे","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
ताइवान की संसद में 42 फीसदी महिलाएं: 80 साल पुराने आरक्षण मॉडल ने बदली तस्वीर, एशिया में सबसे आगे
Fri, 23 Oct 2026 04:52 AM IST
देवेश त्रिपाठी
ली युआन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
ली युआन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Fri, 23 Oct 2026 04:52 AM IST
महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के मामले में ताइवान ने उल्लेखनीय उदाहरण पेश किया है। करीब आठ दशक पहले शुरू हुई आरक्षण व्यवस्था ने वहां महिलाओं के लिए राजनीति में प्रवेश के अवसर बढ़ाए। आज 113 सदस्यों वाली संसद में 47 महिलाएं हैं और उनका प्रतिनिधित्व लगभग 42 फीसदी है।
विज्ञापन
महिला आरक्षण से बराबरी तक का सफर
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/प्रिंट
विस्तार
भारत में संसद से लेकर विधानसभाओं तक महिलाओं के उचित प्रतिनिधित्व के लिए चल रही सियासत के बीच ताइवान दुनियाभर के लिए नजीर बनकर सामने आया है। जिस ताइवान को दुनिया अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर चिप के सबसे बड़े निर्माता के नजरिये से देखती है, उसी 2.3 करोड़ की आबादी वाले द्वीप ने लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी के लिए और लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिए दुनिया का सबसे लंबा अभियान चलाया है।
करीब 80 साल पहले शुरू की गई आरक्षण व्यवस्था का नतीजा यह निकला कि आज ताइवान की संसद में 42% सीटों पर महिलाएं काबिज हैं। यह पूरे एशिया में सबसे अधिक है और यूरोपीय देशों के बराबर है। यही नहीं, ताइवान 2016 में त्साइ इंग-वेन के रूप में अपनी पहली महिला राष्ट्रपति चुन चुका है और दो बार महिलाओं को उप-राष्ट्रपति भी बना चुका है। इस उपाय ने ऐसा रास्ता तैयार किया कि आज बड़ी संख्या में महिलाएं सामान्य चुनावी मुकाबलों में भी अपनी जगह बना रही हैं।
खास बात यह है कि ताइवान ने 2008 में एकल-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में लैंगिक कोटा समाप्त कर दिया। इसके बाद भी संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ता रहा। ताइवान का यह प्रयोग साबित करता है कि जब महिलाओं को कानूनी सुरक्षा (कोटा) के जरिए शुरुआती मंच दिया जाता है, तो समय के साथ वे अपनी काबिलियत के दम पर उस बैसाखी को बेअसर कर देती हैं और बराबरी के मैदान में अपनी योग्यता का परचम लहराती हैं।
विज्ञापन
1946 से बदलाव की नींव, 5-10% आरक्षण से शुरू हुआ सफर
जीत के लिए आरक्षित सीटों की जरूरत खत्म
नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी की प्रो. चांग-लिंग हुआंग कहती हैं, लोग तर्क देते हैं कि चुनाव का मकसद केवल सबसे बेहतर और सबसे सक्षम व्यक्ति को चुनना होना चाहिए। ताइवान का अनुभव बताता है कि लैंगिक आरक्षण ही वह माध्यम है, जो किसी समाज को वास्तव में सबसे बेहतर और सबसे सक्षम लोगों को चुनने का मौका देता है। 2002 में 31 जिलों में कोटे का इस्तेमाल करना पड़ा था, वहीं 2022 में केवल 4 जिलों में ही इसकी जरूरत पड़ी, यानी महिलाएं आसानी से पुरुषों को हरा रही हैं।
विभिन्न देशों की संसद में क्या है स्थिति?
विज्ञापन
करीब 80 साल पहले शुरू की गई आरक्षण व्यवस्था का नतीजा यह निकला कि आज ताइवान की संसद में 42% सीटों पर महिलाएं काबिज हैं। यह पूरे एशिया में सबसे अधिक है और यूरोपीय देशों के बराबर है। यही नहीं, ताइवान 2016 में त्साइ इंग-वेन के रूप में अपनी पहली महिला राष्ट्रपति चुन चुका है और दो बार महिलाओं को उप-राष्ट्रपति भी बना चुका है। इस उपाय ने ऐसा रास्ता तैयार किया कि आज बड़ी संख्या में महिलाएं सामान्य चुनावी मुकाबलों में भी अपनी जगह बना रही हैं।
विज्ञापन
खास बात यह है कि ताइवान ने 2008 में एकल-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में लैंगिक कोटा समाप्त कर दिया। इसके बाद भी संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ता रहा। ताइवान का यह प्रयोग साबित करता है कि जब महिलाओं को कानूनी सुरक्षा (कोटा) के जरिए शुरुआती मंच दिया जाता है, तो समय के साथ वे अपनी काबिलियत के दम पर उस बैसाखी को बेअसर कर देती हैं और बराबरी के मैदान में अपनी योग्यता का परचम लहराती हैं।
विज्ञापन
1946 से बदलाव की नींव, 5-10% आरक्षण से शुरू हुआ सफर
- ताइवान ने महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए आरक्षित सीटों और चुनावी कोटा का इस्तेमाल दूसरे कई देशों से पहले शुरू किया था। जरूरत पड़ने पर समय-समय पर इसमें बदलाव भी करता रहा।
- चीन गणराज्य ने 1946 के संविधान में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की थीं। 1949 में जब नेशनलिस्ट सरकार ताइवान स्थानांतरित हुई, तो तानाशाही दौर के बावजूद स्थानीय चुनावों में 5 से 10% कोटा लागू रखा गया।
- 2002 का क्रांतिकारी नियम : यदि किसी जिला परिषद सीट से 4 या उससे अधिक सदस्य चुने जाते हैं, तो कम से कम 1 सीट महिला उम्मीदवार को मिलेगी। इससे राजनीतिक दलों में महिला उम्मीदवारों को टिकट देने की होड़ मच गई।
- ताइवान की 113 सदस्यीय संसद में 47 महिलाएं हैं। वर्ष 1992 के आसपास संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी थी। इसके बाद इसमें लगातार वृद्धि हुई।
जीत के लिए आरक्षित सीटों की जरूरत खत्म
नेशनल ताइवान यूनिवर्सिटी की प्रो. चांग-लिंग हुआंग कहती हैं, लोग तर्क देते हैं कि चुनाव का मकसद केवल सबसे बेहतर और सबसे सक्षम व्यक्ति को चुनना होना चाहिए। ताइवान का अनुभव बताता है कि लैंगिक आरक्षण ही वह माध्यम है, जो किसी समाज को वास्तव में सबसे बेहतर और सबसे सक्षम लोगों को चुनने का मौका देता है। 2002 में 31 जिलों में कोटे का इस्तेमाल करना पड़ा था, वहीं 2022 में केवल 4 जिलों में ही इसकी जरूरत पड़ी, यानी महिलाएं आसानी से पुरुषों को हरा रही हैं।
विभिन्न देशों की संसद में क्या है स्थिति?
|
देश |
महिला प्रतिनिधित्व |
कोटा प्रणाली की स्थिति |
|---|---|---|
|
ताइवान |
42% |
1946 से लागू, एशिया में सर्वोच्च |
|
अमेरिका |
28% |
वैश्विक रैंकिंग में 84वें स्थान पर |
|
चीन |
25% |
शी जिनपिंग के तीसरे कार्यकाल में पोलित ब्यूरो में एक भी महिला नहीं |
|
जापान |
15% |
कभी सीटों का आरक्षण लागू नहीं किया |