फास्ट फैशन से दूरी: अमेरिका में खुद फ्लेक्स उगाकर कपड़े बना रहीं ईव ओग्डेन शब, क्यों चुना पुराना तरीका?
अमेरिका की ईव ओग्डेन शब ने फास्ट फैशन से दूरी बनाने का अनोखा तरीका अपनाया है। वह अपने घर के बगीचे में अलसी उगाती हैं और उसी से लिनन का कपड़ा बनाकर परिधान तैयार करती हैं। वह पूरी प्रक्रिया सोशल मीडिया पर साझा कर रही हैं। क्या उनका यह तरीका बढ़ते कपड़ा कचरे और पर्यावरण को नुकसान से बचने का रास्ता दिखा रहा है? पढ़िए रिपोर्ट
विस्तार
शब का कहना है कि वह चाहती थी कि लोग स्लो फैशन के बारे में जाने-समझें। प्राकृतिक तरीके से कपड़े तैयार करने का उनका यह प्रोजेक्ट अप्रैल 2025 में शुरू हुआ था। शब ने अपने 600 वर्ग फीट के सब्जी के बगीचे को फ्लेक्स या अलसी की खेती के लिए तैयार किया। पहली फसल के बाद, उन्होंने फिर बुआई की। पूरी प्रक्रिया वह अपने इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिए दुनिया के साथ साझा कर रही हैं। यह देखकर लोगों को पारंपरिक और पुराने तरीके याद आ जाते हैं जो आधुनिक मशीनी युग में लगभग गायब हो चुके हैं। शब कहती हैं कि बाजार के चमकदार कपड़े अब उन्हें आकर्षित नहीं करते। उन्हें अपने पुराने कपड़ों की कद्र करना और उन्हें रफू करके पहनना ज्यादा बेहतर लगता है।
दुर्भाग्य से हम सब आज ज्यादातर समय प्लास्टिक के थैले पहनकर घूम रहे हैं और हमें इसका अहसास तक नहीं है। क्या वास्तव में हमें ऐसे कपड़ों की जरूरत है जो पर्यावरण को तबाह कर रहे हैं? -ईव ओग्डेन शब
काफी जटिल है कपड़ा बनाने की प्रक्रिया
शब के लिए ये परिधान तैयार करना आसान काम नहीं है। फ्लेक्स को काटने के बाद पहले उसको सड़ने के लिए छोड़ा जाता है। फिर कूटकर उसका रेशा निकाला जाता है और सूत कातकर उसे साफ किया जाता है। आखिर में प्राकृतिक रंगों से धागे को रंगा जाता है। रंगाई के लिए उन्होंने बगीचे में इंडिगो प्लांट भी लगाए हैं। धागा पूरी तरह तैयार होने पर वह एक विशाल करघे पर लिनन के कपड़े की बुनाई करती हैं और फिर तैयार होती है उनकी खास ड्रेस।
ये भी पढ़ें: पश्चिम एशिया तनाव: अमेरिका के खिलाफ मुस्लिम एकता का आह्वान, खामेनेई ने किससे और क्यों की ऐसी अपील; हालात कैसे?
उपभोक्तावाद को करारा जवाब
शब का यह कदम आधुनिक उपभोक्तावाद को एक करारा जवाब है। फास्ट फैशन पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी आपदा बन चुका है। भारत जैसी जगहों की रीसाइक्लिंग फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों का स्वास्थ्य खराब हो रहा है। यही नहीं, तमाम पिछड़े देशों में कपड़ों के बड़े-बड़े कचरे के ढेर लग रहे हैं।