Urdu Poetry: रह गए लाखों कलेजा थाम कर, आँख जिस जानिब तुम्हारी उठ गई

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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रह गए लाखों कलेजा थाम कर
आँख जिस जानिब तुम्हारी उठ गई
- दाग़ देहलवी 

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रफ़ाक़तों का मिरी उस को ध्यान कितना था
ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया
- परवीन शाकिर

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हज़ार रास्ते बदले हज़ार स्वाँग रचे
मगर है रक़्स में सर पर इक आसमान वही
- असलम इमादी

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उमीद-ओ-बीम के मेहवर से हट के देखते हैं
ज़रा सी देर को दुनिया से कट के देखते हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

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Urdu Poetry: जो कि पेशानी पे लिक्खी है वो पेश आनी है

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