Meerut: पश्चिमी यूपी की अनदेखी पर भड़के अधिवक्ता, लद्दाख में हाई कोर्ट बेंच पर सवाल, बोले-यहां सबसे पहले बननी
लद्दाख में हाई कोर्ट बेंच दिए जाने के फैसले पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं में आक्रोश है। केंद्रीय संघर्ष समिति ने इसे क्षेत्र की अनदेखी बताते हुए पश्चिमी यूपी में जल्द हाई कोर्ट बेंच स्थापित करने की मांग की।
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मेरठ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की मांग को लेकर अधिवक्ताओं का आक्रोश एक बार फिर सामने आया है। लद्दाख में हाई कोर्ट बेंच दिए जाने के केंद्र सरकार के फैसले पर अधिवक्ताओं ने सवाल उठाते हुए इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता की अनदेखी बताया है। अधिवक्ताओं का कहना है कि मुकदमों की संख्या, जनसंख्या, क्षेत्रफल और भौगोलिक स्थिति को देखते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की जरूरत सबसे पहले पूरी की जानी चाहिए थी।
लद्दाख और कोल्हापुर के फैसले पर जताई नाराजगी
केंद्रीय संघर्ष समिति के अध्यक्ष अनुज शर्मा और महामंत्री परवेज आलम ने कहा कि पहले महाराष्ट्र के कोल्हापुर और अब लद्दाख में हाई कोर्ट बेंच दिए जाने का निर्णय पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए निराशाजनक है। उनका आरोप है कि क्षेत्र की जनता लंबे समय से हाई कोर्ट बेंच की मांग कर रही है, लेकिन उनकी मांग पर केंद्र सरकार की ओर से अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा।
हजारों किलोमीटर की यात्रा का उठाया मुद्दा
अधिवक्ताओं ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को न्याय के लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। उनके अनुसार, इस क्षेत्र में लंबे समय से शनिवार की हड़ताल भी चल रही है, फिर भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया। उन्होंने इसे क्षेत्र की जनता के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताया।
जल्द कठोर रणनीति बनाने की बात
अनुज शर्मा और परवेज आलम ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की स्थापना के लिए अब कठोर रणनीति तैयार की जाएगी। उन्होंने कहा कि क्षेत्र की जनता और अधिवक्ताओं की मांग को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अधिवक्ताओं ने केंद्र सरकार की नीति की आलोचना करते हुए जल्द फैसला लेने की मांग की।
मेरठ के सदर बाजार स्थित जगन्नाथ मंदिर के प्रशासनिक कार्यों को लेकर चल रहे विवाद में जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत ने पुजारियों की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज कर दी। अदालत के फैसले के बाद मंदिर के प्रशासनिक कार्यों में पुजारियों के हस्तक्षेप पर रोक की स्थिति स्पष्ट हो गई है। मंदिर प्रबंधन को लेकर विवाद के बीच अपर मजिस्ट्रेट सदर ने तहसीलदार को रिसीवर नियुक्त किया था।
पुजारियों ने खुद को बताया वंशानुगत सेवक
पुजारी गणेश दास शर्मा और विष्णु दत्त शर्मा ने जिला जज की अदालत में याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि उनके पूर्वज करीब 120 वर्षों से मंदिर में पूजा-पाठ का कार्य करते आ रहे हैं और वे भी इसी परंपरा के तहत सेवा कर रहे हैं। पुजारियों का आरोप था कि उन्हें मंदिर के प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करने दिया जा रहा है।
तहसीलदार को बनाया गया था रिसीवर
मंदिर के प्रबंधन को लेकर विवाद के बाद अपर मजिस्ट्रेट सदर ने तहसीलदार को रिसीवर नियुक्त किया था। पुजारियों ने इसी आदेश को चुनौती देते हुए न्यायालय का रुख किया था। जिला जज ने मामले की सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय में दायर एक रिट का भी उल्लेख किया।
क्रिमिनल रिवीजन याचिका हुई खारिज
जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने पुजारियों की क्रिमिनल रिवीजन याचिका को निरस्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि तहसीलदार को रिसीवर बनाए जाने के आदेश में पुजारियों को प्रशासनिक हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। फैसले के बाद पुजारियों की भूमिका पूजा-पाठ तक सीमित रहने की स्थिति बनी है।