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वैज्ञानिकों का कमाल: बिना खास चश्मे के लौट सकती है आंखों की रोशनी, बैटरी बदलने की झंझट से मिलेगी मुक्ति

Thu, 22 Oct 2026 10:19 AM IST
Dhirendra Singh सलोनी पांडे, संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
सलोनी पांडे, संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Thu, 22 Oct 2026 10:19 AM IST
सार
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आगरा के दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक पर दो शोध किए हैं, जिनमें प्रकाश-संवेदी प्रोटीनों की मदद से दृष्टि बहाल करने और हृदय की अनियमित विद्युत गतिविधियों को नियंत्रित करने की संभावनाएं सामने आई हैं।
 

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Scientists Explore Restoring Vision and Controlling Heart Rhythm Using Light-Sensitive Proteins
वैज्ञानिकों का कमाल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

काई और फूलों में पाए जाने वाले खास प्रोटीन भविष्य में आंखों की रोशनी लौटाने और दिल की अनियमित धड़कनों को नियंत्रित करने में मददगार साबित हो सकते हैं। दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट (डीईआई) के वैज्ञानिकों और शोधार्थियों ने प्रकाश की मदद से कोशिकाओं की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली आधुनिक तकनीक पर दो अलग-अलग शोध किए हैं। पहले शोध में बिना चश्मे के सामान्य व कम रोशनी में देखने की क्षमता बहाल करने की संभावना तलाशी गई है जबकि दूसरे शोध में प्रकाश के जरिये हृदय की कोशिकाओं की विद्युत गतिविधियों को नियंत्रित करने का कंप्यूटर पर सफल अध्ययन किया गया है।
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प्रकाश से कोशिकाओं को नियंत्रित करने की जिस ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक के लिए कार्ल डिसेरोथ, पीटर हेगमैन और जॉर्ज नागेल को वर्ष 2026 का चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला है, डीईआई के वैज्ञानिकों ने उसी पर आगे का अनुसंधान किया है। भौतिकी और कंप्यूटर विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो. सुखदेव रॉय ने बताया कि वर्ष 2021 में एक अंधे मरीज की दृष्टि बहाल करने के लिए इस तकनीक का उपयोग करने का पहला सफल मानव परीक्षण हुआ था, जिसमें विशेष चश्मे का इस्तेमाल किया गया था।
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उसी शोध को आगे बढ़ाते हुए प्रो. रॉय के निर्देशन में पीएचडी शोधकर्ता हिमांशु बंसल, गुर प्यारी, नृपेश दीक्षित और संत सरन ने यह कर दिखाया है। उन्होंने शोध में यह साबित किया है कि सीएचआर माइन और डब्ल्यूएसीएचआर प्रोटीनों का उपयोग करके बिना किसी विशेष चश्मे के सामान्य परिवेशी प्रकाश में भी देखने की क्षमता बहाल की जा सकती है। यानी मरीज घनी छांव में और चांद के प्रकाश में भी बिना चश्मे के आसानी से देख सकेंगे। 
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सीएचआर माइन प्रोटीन
यह एक उच्च-क्षमता वाला लाल-शिफ्टेड चैनलरोडोप्सिन प्रोटीन है, जिसे प्राकृतिक स्रोतों से विकसित किया गया है। यह कम तीव्रता वाले लाल प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है। लाल प्रकाश शरीर के ऊतकों को आसानी से पार कर लेता है, जिससे रेटिना या मस्तिष्क जैसी भीतरी कोशिकाओं को बिना चीर-फाड़ के दृष्टि बहाल करने व सक्रिय करने में मदद मिलती है।

डब्ल्यूआईसीएचआर प्रोटीन
यह एक विशिष्ट प्रकाश-संवेदी प्रोटीन है जो कोशिकाओं की विद्युत गतिविधियों को नियंत्रित या शांत करने का कार्य करता है। यह प्रकाश मिलने पर कोशिकाओं की अनियमित हलचल को रोकता है। डीईआई के शोध के अनुसार, यह हृदय की मांसपेशियों की अनियमित धड़कनों को नियंत्रित करने में मददगार है, जिससे भविष्य में प्रकाश से संचालित पेसमेकर बनाए जा सकेंगे।


पेसमेकर की बैटरी बदले बिना नियंत्रित होगी दिल की धड़कन
शोध के दूसरे चरण में दिल की अनियमित धड़कनों (एरिथमिया) को नियंत्रित करने की संभावना तलाशी गई। डीईआई के वैज्ञानिकों ने दो प्रकाश-संवेदी प्रोटीनों की मदद से कंप्यूटर पर मानव हृदय की कोशिकाओं का मॉडल तैयार किया। अध्ययन में डब्ल्यूआईसीएचआर प्रोटीन ने कम तीव्रता के प्रकाश में भी कोशिकाओं की गड़बड़ विद्युत गतिविधि को नियंत्रित करने की क्षमता दिखाई। इससे भविष्य में ऐसी तकनीक विकसित होगी, जिससे प्रकाश से संचालित पेसमेकर बनाए जा सकेंगे और मरीजों को बार-बार बैटरी बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इस तरह के शोध की 2026 के नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने भी सराहना की है। यह शोध गत वर्ष जनवरी माह में प्रतिष्ठित साइंस जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित भी हुआ है।
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