हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: मेरिट में आए आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को जनरल में शिफ्ट करने का दिया आदेश
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार अपनी योग्यता के आधार पर सामान्य श्रेणी की कटऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है तो तो उस श्रेणी की सीट पर समायोजित किया जाना चाहिए। जानिए कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी भर्तियों में आरक्षण नियमों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार अपनी योग्यता के आधार पर सामान्य श्रेणी की कटऑफ से अधिक अंक प्राप्त करता है तो तो उस श्रेणी की सीट पर समायोजित किया जाना चाहिए। अदालत ने चयन आयोग को मेरिट सूची में शामिल एससी (बीपीएल) श्रेणी के दो उम्मीदवारों को सामान्य वर्ग में स्थानांतरित करने के आदेश दिए हैं। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने कहा कि मेरिट के आधार पर सामान्य श्रेणी की कटऑफ से अधिक अंक प्राप्त करने वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को सामान्य सीट का हकदार माना जाना चाहिए।
उम्मीदवारों को तुरंत सामान्य श्रेणी में समायोजित करने का आदेश
अदालत ने चयन आयोग को मेरिट सूची में क्रम संख्या 51 और 97 पर मौजूद दो एससी (बीपीएल) उम्मीदवारों को तुरंत सामान्य श्रेणी में समायोजित करने का आदेश दिया। इन दोनों उम्मीदवारों के सामान्य श्रेणी में समायोजित होने से एससी (बीपीएल) श्रेणी में खाली होने वाले पदों पर प्रतीक्षा सूची के अनुसार नियुक्ति का रास्ता साफ होगा। अदालत ने निर्देश दिया कि प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर मौजूद याचिकाकर्ता कृष्णा कुमारी को मेरिट के आधार पर नियुक्ति दी जाए। अदालत ने उनकी ओर से दायर याचिका का निपटारा करते हुए यह फैसला सुनाया।
यह है मामला
हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग ने 27 मई 2025 को टीजीटी आर्ट्स के 425 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मांगे थे। इनमें सामान्य श्रेणी के 151 और एससी श्रेणी के 17 पद शामिल थे। याचिकाकर्ता कृष्णा कुमारी ने एससी (बीपीएल) श्रेणी में परीक्षा दी थी। अंतिम परिणाम में 64 अंक प्राप्त करने के बाद वह इस श्रेणी की प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर थीं। मेरिट सूची में एससी (बीपीएल) श्रेणी के तीन उम्मीदवारों ने 75.24, 73.06 और 71.86 अंक हासिल किए थे। ये सभी अंक सामान्य श्रेणी की कटऑफ 67.61 से अधिक थे। इसके बावजूद आयोग ने इन उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी में समायोजित करने के बजाय एससी (बीपीएल) के आरक्षित पदों पर ही चयनित किया। इससे प्रतीक्षा सूची में पहले स्थान पर होने के बावजूद याचिकाकर्ता का चयन नहीं हो सका।
रोस्टर नियमों के उल्लंघन पर पदोन्नति रद्द: मृतक कर्मचारी के परिजनों को मिलेगा लाभ
वहीं प्रदेश हाईकोर्ट ने सेवा मामलों से जुड़े एक मामले में हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड की ओर से रोस्टर नियमों की अनदेखी को पदोन्नति को अवैध और असांविधानिक करार दिया है। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने फैसले में बिजली बोर्ड को निर्देश दिया है कि मूल याचिकाकर्ता को साल 2015 से काल्पनिक रूप से पदोन्नत मानकर उनके कानूनी वारिसों को सभी वित्तीय व सेवा लाभ जारी किए जाए। बिजली बोर्ड की इस कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक रोस्टर का कोई चक्र पूरा नहीं हो जाता, तब तक विभाग सीधे अगले चक्र पर छलांग नहीं लगा सकता। बिजली बोर्ड की ओर से चौथे चक्र को पूरा किए बिना पांचवें चक्र को लागू करना पूरी तरह से अवैध, मनमाना और भेदभावपूर्ण था। कोर्ट ने कहा कि यदि मॉडल रोस्टर नियमों का इस तरह उल्लंघन किया जाएगा, तो रोस्टर नीति बनाने का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। अदालत ने जूनियर कर्मचारी की पदोन्नति के आदेश को रद्द करते हुए बिजली बोर्ड को आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता नगेंद्र सिंह को 27 जुलाई 2015 से फोरमैन (विशेष) के पद पर प्रमोट माना जाए। उन्हें इस पदोन्नति के आधार पर वरिष्ठता, वेतन वृद्धि और अन्य सभी सेवा लाभ काल्पनिक रूप से दिए जाए।
14 नवंबर 1985 को नियुक्त किया गया था याचिकाकर्ता
गौरतलब है कि याचिकाकर्ता नगेंद्र सिंह को 14 नवंबर 1985 को हिमाचल प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड में ऑयल एंड क्लीनर के पद पर नियमित नियुक्त किया गया था। जनवरी 1989 में उन्हें इलेक्ट्रिशियन और अगस्त 2005 में फोरमैन के पद पर पदोन्नत किया गया। बोर्ड के नियमों के तहत फोरमैन के पद पर आठ साल की नियमित सेवा पूरी करने वाले कर्मचारी फोरमैन के पद पर पदोन्नति के पात्र थे। बोर्ड ने नियमों का उल्लंघन करते हुए चौथे चक्र को बीच में ही छोड़ दिया और सीधे पांचवें चक्र को लागू कर दिया। पांचवें चक्र में दूसरा पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था। इसका फायदा उठाते हुए बोर्ड ने वरिष्ठता सूची में 9वें नंबर पर मौजूद एक जूनियर कर्मचारी को 27 जुलाई 2015 को फोरमैन (विशेष) के पद पर प्रमोट कर दिया, जबकि दूसरे नंबर पर मौजूद नगेंद्र सिंह के वैध दावे को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।
अवैध कटान मामले में हाईकोर्ट का सख्त रुख, ठियोग में फाइव स्टार होटल के निर्माण पर रहेगी रोक
प्रदेश हाईकोर्ट ने वन भूमि पर अवैध कटान, खोदाई, पहाड़ों को काटने और पर्यावरण को हुए नुकसान के मामले में सख्त रुख बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने जिला शिमला के ठियोग स्थित रहीघाट में बनने वाले 130 कमरों के फाइव स्टार होटल के निर्माण कार्य पर लगी अंतरिम रोक को जारी रखने के आदेश दिए हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि होटल डेवलपर की ओर से अभी तक आवश्यक ‘कोलाबोरेशन एग्रीमेंट’ (सहयोग समझौता) पेश नहीं किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक मामले से जुड़े सभी तथ्यों की स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक मौके पर किसी भी तरह के निर्माण कार्य की अनुमति नहीं दी जा सकती। जनहित याचिका पर अगली सुनवाई 25 नवंबर को होगी। यह मामला वैकुंठ हॉस्पिटैलिटीज प्राइवेट लिमिटेड की ओर से ठियोग के रहीघाट में 35 बीघा बागवानी भूमि पर 130 कमरों के आलीशान फाइव स्टार होटल के निर्माण से जुड़ा है। आरोप है कि होटल तक रास्ता बनाने के लिए वन विभाग की भूमि (खसरा नंबर 201) पर लगभग 424 वर्ग मीटर क्षेत्र में अवैध रूप से सड़क का निर्माण किया गया।
इसके बाद वन विभाग ने दिसंबर 2025 में एफआईआर भी दर्ज कराई थी। लीगल सर्विसेज अथॉरिटी शिमला की स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार गूगल अर्थ इमेजरी और लाइव गूगल मैप में संबंधित वन भूमि (खसरा नंबर 201) पर हरे-भरे पेड़ दिखाई दे रहे थे। हालांकि, जब टीम ने मौके पर जाकर निरीक्षण किया, तो वहां एक भी पेड़ नहीं मिला। इसके बजाय बड़े पैमाने पर पहाड़ों की कटाई और अवैध खुदाई के निशान मिले। साथ ही, भूस्खलन के मलबे के नीचे देवदार के दो छोटे पौधे दबे हुए पाए गए। जुलाई 2026 में हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा था कि जब व्यावसायिक स्तर पर पर्यावरण और जंगलों के साथ खिलवाड़ हो रहा था, तब वन विभाग और नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग (टाउन एंड कंट्री प्लानिंग) मूकदर्शक बने रहे। कोर्ट ने नियमों की अनदेखी और लापरवाही के लिए दोनों विभागों पर 50-50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था।