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चिंता: हिमाचल में औषधीय पौधों पर जलवायु संकट, 57% तक घट सकता है प्राकृतिक आवास
Mon, 24 Aug 2026 11:48 AM IST
Ankesh Dogra
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Mon, 24 Aug 2026 11:48 AM IST
हिमाचल की दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों पर जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ रहा है। एक अध्ययन के अनुसार अतीस, क्षीर काकोली और कुटकी का प्राकृतिक आवास भविष्य में 33 से 57 फीसदी तक कम हो सकता है। बारिश के बदलते पैटर्न, तापमान में वृद्धि, बर्फ के जल्दी पिघलने और अत्यधिक दोहन को इसका प्रमुख कारण बताया गया है। लाहौल-स्पीति, किन्नौर और कुल्लू के ऊंचाई वाले क्षेत्र भविष्य में इन प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण शरणस्थल बन सकते हैं।
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जलवायु परिवर्तन।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान के कारण दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों का अस्तित्व खतरे में है। एक नए अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन से हिमाचल प्रदेश में पाई जाने वाली तीन महत्वपूर्ण औषधीय प्रजातियों का प्राकृतिक आवास भविष्य में 33 से 57 फीसदी तक कम हो सकता है। जर्नल ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में इसी माह के अंक में प्रकाशित इस शोध में अतीस, क्षीर काकोली और कुटकी को शामिल किया गया है। शोधकर्ताओं ने वर्ष 2050 और 2070 के संभावित जलवायु परिदृश्यों के आधार पर इन प्रजातियों के भविष्य के आवास का आकलन किया है। अध्ययन में 24 पर्यावरणीय और भौगोलिक कारकों का विश्लेषण किया गया।
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बारिश की मौसमी विषमता और दैनिक तापमान का अंतर सबसे प्रभावशाली कारक पाए गए। वर्षा की मौसमी विषमता की भूमिका लगभग 34 से 45 फीसदी आंकी गई है। मानसून के समय में बदलाव, बर्फबारी और बर्फ के जल्दी पिघलने से मिट्टी में नमी का संतुलन बिगड़ रहा है। दिन और रात के तापमान के बीच बढ़ता अंतर भी एक बड़ी चुनौती है। इसकी भूमिका 22 से 28 फीसदी बताई गई है। यह स्थिति इन दुर्लभ वनस्पतियों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है।
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शोधकर्ता वैज्ञानिक सिमरन तोमर, मेर्जा हेलेना टोले, केएस कंवल और सुनील पुरी कासेल विश्वविद्यालय जर्मनी के जल, अपशिष्ट और पर्यावरण इंजीनियरिंग संस्थान, शूलिनी विश्वविद्यालय सोलन के हिमाचल प्रदेश के जैविक विज्ञान स्कूल और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान कोसी-कटारमल, अल्मोड़ा उत्तराखंड से हैं।
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प्रमुख पौधों पर पड़ा बड़ा असर
अतीस की जड़ें पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग होती हैं। कम उत्सर्जन वाले परिदृश्य में 2050 तक इसके आवास में अस्थायी वृद्धि संभव है, पर उच्च उत्सर्जन वाले परिदृश्य में 2070 तक इसकी स्थिति कमजोर हो सकती है। क्षीर काकोली सबसे संवेदनशील प्रजाति पाई गई है। मौसम और तापमान में बदलाव से इसके आवास में सबसे अधिक बिखराव और कमी आने की आशंका है। कुटकी यकृत संबंधी समस्याओं में इस्तेमाल होती है। जलवायु परिवर्तन के बावजूद यह कुछ समय तक ऊंचाई वाले अल्पाइन क्षेत्रों में बनी रह सकती है, पर इसके कुल उपयुक्त आवास में कमी आएगी।
शोधकर्ताओं ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के अलावा अत्यधिक संग्रह और दोहन भी इन पौधों के लिए संकट का कारण है। प्राकृतिक पुनर्जनन की धीमी प्रक्रिया और मानवीय हस्तक्षेप भी बड़ी चुनौतियां हैं। कई पौधों की जड़ें या भूमिगत हिस्से निकाले जाने से उनके दोबारा उगने की संभावना कम हो जाती है। अध्ययन के मॉडल दर्शाते हैं कि तापमान बढ़ने के साथ इन पौधों के अनुकूल क्षेत्र अधिक ऊंचाई की ओर खिसक सकते हैं। लाहौल-स्पीति, किन्नौर और कुल्लू के ऊंचाई वाले क्षेत्र भविष्य में इन प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण जलवायु शरणस्थल बन सकते हैं।
अतीस की जड़ें पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग होती हैं। कम उत्सर्जन वाले परिदृश्य में 2050 तक इसके आवास में अस्थायी वृद्धि संभव है, पर उच्च उत्सर्जन वाले परिदृश्य में 2070 तक इसकी स्थिति कमजोर हो सकती है। क्षीर काकोली सबसे संवेदनशील प्रजाति पाई गई है। मौसम और तापमान में बदलाव से इसके आवास में सबसे अधिक बिखराव और कमी आने की आशंका है। कुटकी यकृत संबंधी समस्याओं में इस्तेमाल होती है। जलवायु परिवर्तन के बावजूद यह कुछ समय तक ऊंचाई वाले अल्पाइन क्षेत्रों में बनी रह सकती है, पर इसके कुल उपयुक्त आवास में कमी आएगी।
शोधकर्ताओं ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के अलावा अत्यधिक संग्रह और दोहन भी इन पौधों के लिए संकट का कारण है। प्राकृतिक पुनर्जनन की धीमी प्रक्रिया और मानवीय हस्तक्षेप भी बड़ी चुनौतियां हैं। कई पौधों की जड़ें या भूमिगत हिस्से निकाले जाने से उनके दोबारा उगने की संभावना कम हो जाती है। अध्ययन के मॉडल दर्शाते हैं कि तापमान बढ़ने के साथ इन पौधों के अनुकूल क्षेत्र अधिक ऊंचाई की ओर खिसक सकते हैं। लाहौल-स्पीति, किन्नौर और कुल्लू के ऊंचाई वाले क्षेत्र भविष्य में इन प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण जलवायु शरणस्थल बन सकते हैं।