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पंजाब-हरियाणा में मानसून कमजोर: 1911 से 2026 तक के आंकड़ों में सूखे की चिंता, खेती की लागत और भूजल पर खतरा
Tue, 27 Oct 2026 12:12 PM IST
Nivedita
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Tue, 27 Oct 2026 12:12 PM IST
पंजाब में जून से सितंबर तक हर महीने सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। जून में 46 प्रतिशत, जुलाई में 26 प्रतिशत, अगस्त में 35 प्रतिशत और सितंबर में 62 प्रतिशत की कमी रही। हरियाणा में जून में 45 प्रतिशत, जुलाई में 27 प्रतिशत, अगस्त में 6 प्रतिशत और सितंबर में 44 प्रतिशत कम बारिश हुई।
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पंजाब-हरियाणा में मानसून कमजोर
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
पंजाब और हरियाणा की खेती के लिए मानसून की बारिश हमेशा अहम रही है, लेकिन मौसम विभाग के 125 साल के बारिश के रिकॉर्ड में ऐसे कई साल दर्ज हैं, जब दोनों राज्यों में मानसून सामान्य से काफी कमजोर रहा। वर्ष 2026 में भी यही स्थिति देखने को मिली।
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भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के 1901 से 2026 तक के बारिश के आंकड़ों के आकलन के अनुसार, इस साल जून से सितंबर के मानसून सीजन में पंजाब में सामान्य से 38 प्रतिशत कम बारिश हुई, जबकि हरियाणा में बारिश की कमी 25 प्रतिशत रही। यानी दोनों राज्यों में मानसून की बारिश सामान्य स्तर तक नहीं पहुंच सकी।
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इस साल बारिश की कमी का असर पूरे मानसून सीजन में दिखाई दिया, लेकिन सितंबर में स्थिति ज्यादा चिंताजनक रही। पंजाब में सितंबर के दौरान सामान्य से 62 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई, जबकि हरियाणा में यह कमी 44 प्रतिशत रही। मानसून के अंतिम महीने में बारिश कम होने से खेतों में मिट्टी की नमी बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है। खासकर उन इलाकों में, जहां फसल की जरूरत पूरी करने के लिए नहरों के पानी या भूजल से सिंचाई करनी पड़ती है।
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महीनेवार आंकड़ों में दिखी बारिश की कमी
पंजाब में जून से सितंबर तक हर महीने सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। जून में 46 प्रतिशत, जुलाई में 26 प्रतिशत, अगस्त में 35 प्रतिशत और सितंबर में 62 प्रतिशत की कमी रही। हरियाणा में जून में 45 प्रतिशत, जुलाई में 27 प्रतिशत, अगस्त में 6 प्रतिशत और सितंबर में 44 प्रतिशत कम बारिश हुई। इससे स्पष्ट है कि दोनों राज्यों में मानसून के दौरान बारिश की कमी किसी एक महीने तक सीमित नहीं रही।
125 साल के रिकॉर्ड में पहले भी कई बार बिगड़े हालात
मौसम विभाग के आंकड़ों में पंजाब और हरियाणा में मानसून की गंभीर कमी वाले कई साल दर्ज हैं। पंजाब में 1911 के दौरान मानसूनी बारिश में 51 प्रतिशत और 2014 में 49.2 प्रतिशत की कमी दर्ज होने का उल्लेख है। हरियाणा में 1987 का साल बेहद खराब मानसून वाले वर्षों में शामिल रहा, जब बारिश सामान्य से 63.6 प्रतिशत कम थी। इसके अलावा 1918 में 56.9 प्रतिशत और 2014 में 56.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
बारिश की कमी से खेती पर संभावित असर
धान की फसल- बारिश कम होने पर सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है। पानी की कमी के समय पौधों की बढ़वार और दाने भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
गेहूं की फसल- मानसून की कमी से मिट्टी और भूजल पर दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर अगली रबी फसल के लिए उपलब्ध सिंचाई पर पड़ सकता है।
मिट्टी की नमी- पर्याप्त बारिश न होने पर मिट्टी सूख सकती है और फसल को पानी देने की जरूरत जल्दी पड़ सकती है।
खेती की लागत- ट्यूबवेल से ज्यादा सिंचाई करने पर बिजली, डीजल और पंपिंग का खर्च बढ़ सकता है।
भूजल- बारिश से जमीन में पानी का पुनर्भरण कम होने पर भूजल की स्थिति बिगड़ सकती है। वास्तविक असर स्थानीय जलस्तर और पानी के इस्तेमाल पर निर्भर करता है।
पैदावार- फसल के संवेदनशील चरण में पानी की कमी होने पर उपज घट सकती है। हालांकि, कितनी कमी होगी, यह फसल, किस्म, मिट्टी, सिंचाई और तापमान पर निर्भर करता है।
पंजाब में जून से सितंबर तक हर महीने सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। जून में 46 प्रतिशत, जुलाई में 26 प्रतिशत, अगस्त में 35 प्रतिशत और सितंबर में 62 प्रतिशत की कमी रही। हरियाणा में जून में 45 प्रतिशत, जुलाई में 27 प्रतिशत, अगस्त में 6 प्रतिशत और सितंबर में 44 प्रतिशत कम बारिश हुई। इससे स्पष्ट है कि दोनों राज्यों में मानसून के दौरान बारिश की कमी किसी एक महीने तक सीमित नहीं रही।
125 साल के रिकॉर्ड में पहले भी कई बार बिगड़े हालात
मौसम विभाग के आंकड़ों में पंजाब और हरियाणा में मानसून की गंभीर कमी वाले कई साल दर्ज हैं। पंजाब में 1911 के दौरान मानसूनी बारिश में 51 प्रतिशत और 2014 में 49.2 प्रतिशत की कमी दर्ज होने का उल्लेख है। हरियाणा में 1987 का साल बेहद खराब मानसून वाले वर्षों में शामिल रहा, जब बारिश सामान्य से 63.6 प्रतिशत कम थी। इसके अलावा 1918 में 56.9 प्रतिशत और 2014 में 56.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
बारिश की कमी से खेती पर संभावित असर
धान की फसल- बारिश कम होने पर सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है। पानी की कमी के समय पौधों की बढ़वार और दाने भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
गेहूं की फसल- मानसून की कमी से मिट्टी और भूजल पर दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर अगली रबी फसल के लिए उपलब्ध सिंचाई पर पड़ सकता है।
मिट्टी की नमी- पर्याप्त बारिश न होने पर मिट्टी सूख सकती है और फसल को पानी देने की जरूरत जल्दी पड़ सकती है।
खेती की लागत- ट्यूबवेल से ज्यादा सिंचाई करने पर बिजली, डीजल और पंपिंग का खर्च बढ़ सकता है।
भूजल- बारिश से जमीन में पानी का पुनर्भरण कम होने पर भूजल की स्थिति बिगड़ सकती है। वास्तविक असर स्थानीय जलस्तर और पानी के इस्तेमाल पर निर्भर करता है।
पैदावार- फसल के संवेदनशील चरण में पानी की कमी होने पर उपज घट सकती है। हालांकि, कितनी कमी होगी, यह फसल, किस्म, मिट्टी, सिंचाई और तापमान पर निर्भर करता है।
कमजोर मानसून से फसल की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा पर असर
बीज के अंकुरण से लेकर फल पकने तक, फसल के हर चरण में पानी की उपलब्धता की अलग-अलग भूमिका होती है। सूखा और गर्मी, दोनों ही फसल के लिए खतरनाक हैं। केवल पंजाब और हरियाणा ही नहीं, देश के अलग-अलग राज्यों में कमजोर मानसून चिंता का विषय है। इसका असर फसल के उत्पादन, गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा, आर्थिक स्थिति और फसल की प्रतिरोधक क्षमता तक पर पड़ सकता है।
प्रो. हर्ष अय्यर, कृषि वैज्ञानिक, बॉटनी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय
125 साल के रिकॉर्ड में बारिश के रुझान समझना जरूरी
मौसम विभाग के दीर्घकालीन आंकड़े बारिश के बदलते रुझान को समझने में मदद करते हैं। वर्ष 2026 के मानसून के पूर्वानुमान में ही पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के अधिकतर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई थी। अल नीनो जैसी वैश्विक जलवायु परिस्थितियां मानसून की गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, बारिश में कमी का आकलन करते समय लंबे समय के रिकॉर्ड के साथ हर साल के वास्तविक आंकड़ों और क्षेत्रीय अंतर को भी देखना जरूरी है। -डॉ. सुरेंद्र पाल, निदेशक, मौसम विज्ञान केंद्र, चंडीगढ़
बीज के अंकुरण से लेकर फल पकने तक, फसल के हर चरण में पानी की उपलब्धता की अलग-अलग भूमिका होती है। सूखा और गर्मी, दोनों ही फसल के लिए खतरनाक हैं। केवल पंजाब और हरियाणा ही नहीं, देश के अलग-अलग राज्यों में कमजोर मानसून चिंता का विषय है। इसका असर फसल के उत्पादन, गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा, आर्थिक स्थिति और फसल की प्रतिरोधक क्षमता तक पर पड़ सकता है।
प्रो. हर्ष अय्यर, कृषि वैज्ञानिक, बॉटनी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय
125 साल के रिकॉर्ड में बारिश के रुझान समझना जरूरी
मौसम विभाग के दीर्घकालीन आंकड़े बारिश के बदलते रुझान को समझने में मदद करते हैं। वर्ष 2026 के मानसून के पूर्वानुमान में ही पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के अधिकतर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई थी। अल नीनो जैसी वैश्विक जलवायु परिस्थितियां मानसून की गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, बारिश में कमी का आकलन करते समय लंबे समय के रिकॉर्ड के साथ हर साल के वास्तविक आंकड़ों और क्षेत्रीय अंतर को भी देखना जरूरी है। -डॉ. सुरेंद्र पाल, निदेशक, मौसम विज्ञान केंद्र, चंडीगढ़