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कैंसर का हवाला देकर मेडिक्लेम रोका: अब बीमा कंपनी को देने होंगे 5 लाख, पंजाब राज्य उपभोक्ता आयोग ने दिए आदेश
Wed, 21 Oct 2026 10:14 PM IST
शाहिल शर्मा
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Wed, 21 Oct 2026 10:14 PM IST
आयोग ने कहा कि कंपनी वर्ष 2017 में स्तन कैंसर के इलाज के दावे के समर्थन में पर्याप्त चिकित्सकीय रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी।
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पंजाब राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने केयर हेल्थ इंश्योरेंस लिमिटेड को झटका देते हुए मेडिक्लेम का भुगतान नहीं करने के मामले में कंपनी की अपील खारिज कर दी है। आयोग ने अमृतसर जिला उपभोक्ता आयोग के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें शिकायतकर्ता अशोक शर्मा को पांच लाख रुपये, सात प्रतिशत सालाना ब्याज, 20 हजार रुपये मुआवजा और 10 हजार रुपये मुकदमा खर्च देने का निर्देश दिया गया था।
आयोग की अध्यक्ष जस्टिस दया चौधरी, सिमरजोत कौर और विश्वकांत गर्ग की पीठ ने यह फैसला सुनाया। अशोक शर्मा की पत्नी वीना शर्मा को इलाज के लिए नई दिल्ली के पुष्पावती सिंघानिया अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में उन्हें कैंसर और मूत्राशय में बीमारी फैलने का पता चला। इलाज पर 5.33 लाख रुपये से अधिक खर्च हुआ। बीमा कंपनी ने दावा खारिज करते हुए तर्क दिया कि पॉलिसी लेते समय स्तन कैंसर की पुरानी बीमारी की जानकारी नहीं दी गई थी।
आयोग ने कहा कि कंपनी वर्ष 2017 में स्तन कैंसर के इलाज के दावे के समर्थन में पर्याप्त चिकित्सकीय रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी। साथ ही, पॉलिसी की शर्तों के अनुसार, पहले से मौजूद बीमारी तभी मानी जा सकती थी, जब उसका निदान या उपचार पॉलिसी शुरू होने से पहले के 48 महीनों के भीतर हुआ हो। कथित बीमारी वर्ष 2017 की थी, जबकि पॉलिसी नवंबर 2022 में प्रभावी हुई। आयोग ने यह भी माना कि दोनों बीमारियों के बीच चिकित्सकीय संबंध साबित नहीं हुआ।
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आयोग ने कहा कि बीमारी छिपाने का आरोप साबित नहीं हुआ, इसलिए बीमा दावा खारिज करना उचित नहीं था। इसी आधार पर पॉलिसी का नवीनीकरण रोकने के कंपनी के फैसले को भी गलत ठहराया गया। इस संबंध में दायर दूसरी अपील भी खारिज कर दी गई।
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आयोग की अध्यक्ष जस्टिस दया चौधरी, सिमरजोत कौर और विश्वकांत गर्ग की पीठ ने यह फैसला सुनाया। अशोक शर्मा की पत्नी वीना शर्मा को इलाज के लिए नई दिल्ली के पुष्पावती सिंघानिया अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में उन्हें कैंसर और मूत्राशय में बीमारी फैलने का पता चला। इलाज पर 5.33 लाख रुपये से अधिक खर्च हुआ। बीमा कंपनी ने दावा खारिज करते हुए तर्क दिया कि पॉलिसी लेते समय स्तन कैंसर की पुरानी बीमारी की जानकारी नहीं दी गई थी।
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आयोग ने कहा कि कंपनी वर्ष 2017 में स्तन कैंसर के इलाज के दावे के समर्थन में पर्याप्त चिकित्सकीय रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी। साथ ही, पॉलिसी की शर्तों के अनुसार, पहले से मौजूद बीमारी तभी मानी जा सकती थी, जब उसका निदान या उपचार पॉलिसी शुरू होने से पहले के 48 महीनों के भीतर हुआ हो। कथित बीमारी वर्ष 2017 की थी, जबकि पॉलिसी नवंबर 2022 में प्रभावी हुई। आयोग ने यह भी माना कि दोनों बीमारियों के बीच चिकित्सकीय संबंध साबित नहीं हुआ।
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आयोग ने कहा कि बीमारी छिपाने का आरोप साबित नहीं हुआ, इसलिए बीमा दावा खारिज करना उचित नहीं था। इसी आधार पर पॉलिसी का नवीनीकरण रोकने के कंपनी के फैसले को भी गलत ठहराया गया। इस संबंध में दायर दूसरी अपील भी खारिज कर दी गई।