इंटरनेट की छोटे शहरों और गांवों तक बढ़ती पहुंच ने नए सितारों को जन्म दिया है। डिजिटल की दुनिया का ऐसा ही एक बड़ा सितारा है, जाकिर खान। यूट्यूब पर धूम मचाने के बाद जाकिर ने ओटीटी पर भी अपनी अलग पहचान बनाई है। इन दिनों वह प्राइम वीडियो की नई सीरीज वन माइक स्टैंड में देश के सबसे बड़े यूट्यूबर भुवन बाम को कॉमेडी सिखाते नजर आ रहे हैं। जाकिर से अमर उजाला की एक खास मुलाकात।
बॉलीवुड के मठाधीशों पर स्टैंड अप कॉमेडियन जाकिर खान का हमला, बोले- 'कलाकार किसी का गुलाम नहीं होता'
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तमाम मेगा बजट वाली फिल्मों को बनाने वाले अपनी फिल्म की बात लोगों तक पहुंचाने के लिए आप जैसे लोगों की मदद लेने लगे हैं। एवेंजर्स एंडगेम के लिए आपको मार्वल ने खासतौर से बुलाया था तो डिजिटल के सितारों की धमक कितनी बढ़ी है?
मोबाइल ने सितारों को उनके चाहनेवालों के काफी करीब ला दिया है। सितारे भी अपने चाहने वालों से शुरू से संपर्क रखना चाहते रहे हैं। इंटरनेट ने दोनों का काम आसान किया है। कई बार इन दोनों के बीच कोई पुल नहीं होता है तो हमारे जैसे कलाकार यही सेतु बनाने का काम करते हैं। कलाकार हो या पत्रकार हो, जब तक वह अपने दर्शक या पाठक से सीधा राब्ता नहीं बनाएगा, वह समझ नहीं पाएगा कि लोग उससे चाहते क्या हैं।
तो स्टैंड अप कॉमेडियन कैसे बने आप?
घर वाले चाहते थे कि मैं बड़ा सितार वादक बनूं। सितार सीखा भी है मैंने लेकिन मैंने पापा को एक दिन बोला कि ये बहुत मुश्किल है मुझसे हो नहीं रहा। पापा और मैं हमेशा दोस्त की तरह बात करते रहे। मेरा अपना अनुभव ये कहता है किसी भी क्षेत्र में कुछ नया करना चाहने की इच्छा रखने वालों को घरवालों का साथ मिलना बहुत जरूरी है। कलाकार का मुकाबला बाहरवालों से होता है। घरवाले साथ हों तो ये बहुत आसान हो जाता है। कॉमेडी मेरे भीतर जन्मजात रही होगी, दिल्ली आया तो रेडियो आदि में ये और निखरी और जब मुझे लगा कि मेरी मंजिल यही है तो मैं मुंबई आ गया।
सिनेमा को लेकर आप हमेशा काफी सजग रहते हैं। आप कहते भी हैं कि आपका मन नहीं है सिनेमा में जाने का, ऐसी चिढ़ क्यों?
मैं आपको समझाने की कोशिश करता हूं। सिनेमा भी एक कला है। ये किसी की जागीर नहीं है। यहां कुछ लोगों ने खुद को जागीरदार समझ लिया है और कलाकार किसी का गुलाम नहीं होता। शोहरत हासिल करने के लिए सिनेमा रहा होगा किसी जमाने में इकलौता जरिया। लेकिन, आज के युवाओं को जो गायक, जो डीजे, जो कॉमेडियन सबसे ज्यादा पसंद हैं, उनमें से किसी को सिनेमा के सहारे की जरूरत नहीं है। हां, सिनेमावाले जरूर इन सबकी मदद लेते रहते हैं अपनी फिल्मों को लोगों तक पहुंचाने के लिए। मैंने सिनेमा को मना नहीं किया है लेकिन मैं सिनेमा को लेकर बेकरार नहीं हूं।
तो स्टैंड अप कॉमेडी का आपका मूल मंत्र क्या है?
हकीम कभी अपनी दवाई का नुस्खा नहीं बताता, बता देगा तो फिर हर कोई हकीम नहीं बन जाएगा। फिर भी मैं आपको बताता हूं। लोगों को हंसाना या गुदगुदाना सबसे टेढ़ी खीर है। यहां भी एहसास और जज्बात सबसे ज्यादा काम आते हैं। आपको लोगों के दिलों तक राह बनानी है। मैं अपनी कहानियां अपने आसपास से चुनता हूं। दर्शकों से रिश्ता जोड़ता हूं और फिर बीच में बिना उस बात पर जोर डाले, ऐसी बात कह देता हूं जो उन्हें याद रह जाती है। ये मां-बेटे के रिश्ते की बात हो सकती है, बाप-बेटे की आपसी समझ की बात हो सकती है, या फिर कुछ और।
सम सामयिक विषयों पर कुणाल कामरा जैसे चुटकुले आप नहीं बनाते, इसकी कोई खास वजह?
मैं ना थोड़ा आलसी प्रवृत्ति का इंसान हूं। चुटकुले बनाना बहुत मेहनत का काम है। अब क्या है मैं किसी मौजूदा विषय पर लिखूं और दो दिन बाद ही वो विषय पुराना भी हो सकता है। हो सकता है तब कोई दूसरा मुद्दा लोगों के बीच ज्यादा बहस करा रहा तो मेरी मेहनत बेकार जाएगी। मैं बहुत तनावरहित जीवन जीता हूं। किसी तरह का कोई दबाव नहीं लेता। आजाद पंछी हूं। जिस डाल पर जितनी देर मन करेगा, बैठूंगा नहीं तो किसी दूसरे बाग में चला जाऊंगा।
जीवन में संघर्ष कर रहे या कुछ बन पाने की जद्दोजहद में लगे लोगों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
टिके रहो। मैं हमेशा अपने सारे चाहने वालों को एक ही बात कहता हूं, टिके रहो। अगर आपको समझ आ गया है कि जीवन में आपको क्या करना है, उस रास्ते पर आप चल भी दिए हैं। तो बस चलते जाना है, रुकना नहीं है। कोई भी रास्ता आसान नहीं होता। मंजिल सोची है, रास्ता मिल गया है तो वहां तक पहुंच जाना तय है। बस हिम्मत नहीं हारनी है।
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