ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद: जख्मों के बीच उभरती शांति की नई सुबह, उम्मीदों के साथ पटरी पर लौटी जिंदगी
ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद एलओसी से सटे उड़ी सेक्टर के गांवों में हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं, जहां लोग अब फिर से खेती, कारोबार और बच्चों की पढ़ाई की ओर लौट रहे हैं। हालांकि गोलाबारी के पुराने जख्म और तबाही की यादें अब भी लोगों के दिलों में ताजा हैं लेकिन सीमांत इलाकों में शांति और सुरक्षा की उम्मीद मजबूत हुई है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पहलगाम में दुश्मन ने जख्म दिए। धर्म पूछ-पूछकर बेगुनाहों की जान ली। कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश खौल उठा। पिछले साल छह और सात मई की दरमियानी रात बता दिया कि एक चुटकी सिंदूर की कीमत क्या होती है। ऑपरेशन सिंदूर को आज एक साल पूरा हुआ। यह सिर्फ एक सैन्य अभियान नहीं था। साहस और पराक्रम की मिसाल भी है। यह राष्ट्र की दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक बना। कठिन हालात थे। चुनौतियां बड़ी थीं लेकिन हौसला उससे भी बड़ा था। इस अभियान ने बता दिया- भारत झुकता नहीं है। भारत रुकता नहीं है। शहीदों की कुर्बानी आज भी याद है। उनका साहस दिलों में जिंदा है। एक साल बाद भी गर्व वैसा ही है। ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरे हो गए। ग्राउंड जीरो से अमर उजाला के रिपोर्टर बता रहे हैं नियंत्रण रेखा और सीमा के हालात...
नई उम्मीदों के साथ पटरी पर लौटी जिंदगी
नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे उड़ी सेक्टर के गांवों में आज भी ऑपरेशन सिंदूर की यादें खामोशी में किसी रील की तरह रीप्ले होती रहती हैं। इसमें खौफ भी होता है तो राहत भी। बीते एक साल में हालात अपेक्षाकृत शांत हुए हैं, मगर लोगों के दिलों में स्थायी शांति की उम्मीद अब भी उतनी ही गहरी है।
सीमा के करीब बसे चुरुंडा, सिलिकोट, सलामाबाद, गिंगल, लगामा, तिलावारी, बालकोट, नाम्बला और हथलंगा जैसे गांवों में जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौटी है। खेतों में फिर हरियाली दिखने लगी है। बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। छोटे कारोबार दोबारा चल पड़े हैं। एक समय ऐसा था जब गोलाबारी ने सब कुछ थाम दिया था। घर, काम, सपने सब ठहर गए थे।
ऑपरेशन सिंदूर के एक साल में कितना बदलाव आया है, यह जानने के लिए हम निकले। रास्ते में हाइडिल पावर प्रोजेक्ट के पास बैठे मिले एक युवक की नजरें दूर पहाड़ियों पर टिकी हुई थीं। जैसे किसी कल्पना में वह खोया हुआ हो। ऑपरेशन सिंदूर की चर्चा छिड़ते ही तपाक से बोला, दुश्मन ने इसे भी निशाना बनाने की कोशिश की थी, लेकिन हमारी सेना ने इसे बचा लिया। कुछ और आगे बढ़ने पर एलओसी के एकदम किनारे रंग रोगन के साथ चमक रहा घर मानो बता रहा है कि यहां हम सब सुरक्षित हैं।
बीते संघर्ष के निशान अब भी मिटे नहीं हैं। यहां गोलाबारी में एक महिला की मौत हुई थी, जबकि दर्जनों लोग घायल हुए थे। चुरुंडा में करीब 25 और सिलिकोट में 35 घर क्षतिग्रस्त हुए थे। 8 मई 2025 को सलामाबाद में हुई मोर्टार गोलाबारी ने कई घरों को तबाह कर दिया। गिंगल और लगामा में भी भारी नुकसान हुआ। कुल मिलाकर 100 से ज्यादा घरों को गोलाबारी से नुकसान हुआ। एलओसी के किनारे बसा है चुरुंडा गांव। गांव में मिले लालदीन तो चर्चा छिड़ते ही सिहर उठते हैं। कहते हैं, वो पल याद आते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अब बस शांति चाहिए। यही हमारी सबसे बड़ी जरूरत है।
बंकर हमारी सुरक्षा के लिए जरूरी
स्थानीय लोगों की कुछ मांगें अब भी अधूरी हैं। सिलिकोट के बशारत अहमद और हथलंगा के फारूक अहमद कहते हैं कि कई गांवों में अब तक सामुदायिक बंकर नहीं बने हैं। यहां हालात कब बदल जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। शमीम अहमद सेना का जिक्र करते हुए भावुक हो उठते हैं। कहते हैं, सेना ने हमारी बहुत मदद की। शायद उनकी मदद न होती, तो हम आज जिंदा न होते। उड़ी के इन गांवों में आज शांति है, लेकिन यह शांति उम्मीद और सतर्कता के बीच सांस ले रही है। एक ऐसी उम्मीद, जो हमेशा के लिए कायम रहना चाहती है।
नरगिस को हमने गोलाबारी में मरते देखा...अब और नहीं
गरकोट गांव में मिले लियाकत अली जो कुछ देर पहले तक बातों में मशगूल थे, चर्चा छिड़ते ही उनकी आवाज धीमी हो जाती है। कहते हैं, हमने नरगिस बशीर को गोलाबारी में मरते देखा अब और नहीं देखना चाहते। हम गोलाबारी से बचने के लिए कार से जा रहे थे, उसी दौरान नरगिस गोलाबारी की चपेट में आ गई। घरों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, देख लीजिए घरों पर जो निशां दिख रहे वह खुद-ब-खुद बर्बादी को बयां कर देते हैं।
घर फिर बन गए, अपनों को खोने का गम आज भी बरकरार
पाकिस्तानी सेना ने पुंछ के रिहायशी इलाकों में भारी गोलाबारी की, जिसमें सैकड़ों मकान, दुकानें और सरकारी इमारतें क्षतिग्रस्त हो गईं। इस गोलाबारी में जुड़वां भाई-बहन समेत 16 लोगों की जान चली गई थी। समय के साथ लोगों ने अपने टूटे घरों की मरम्मत कर ली है। किसी ने सरकारी सहायता से, तो किसी ने अपने खर्च से। दीवारों और छतों के छेद भर दिए गए, दिलों में बने घाव अब भी वैसे ही ताजा हैं।
मोहल्ला डुंगस में क्राइस्ट स्कूल के पास की वह गली, जहां मासूम अयान और अरूबा इस हमले का शिकार हुए थे, आज फिर से सामान्य दिखती है। घरों पर रंग-रोगन हो चुका है, लेकिन स्थानीय लोगों की आंखों में सात मई की वह भयावह सुबह आज भी तैरती है। अयान के रिश्तेदार डॉ. सरफराज मीर बताते हैं कि अयान और अरूबा के माता-पिता तो इस घटना के बाद यहां कभी नहीं आए।
डॉ. सरफराज बताते हैं कि वे उस घटना के चश्मदीद हैं और आज भी उस मंजर को याद कर सिहर उठते हैं। इसी तरह अन्य प्रभावित परिवारों का दर्द भी कम नहीं हुआ है। सेवानिवृत्त सैनिक अमरजीत सिंह के परिजन का कहना है कि सरकार ने आर्थिक मदद देकर नुकसान की भरपाई जरूर की, लेकिन अपनों की कमी कभी पूरी नहीं हो सकती।
बच्चों के बलिदान पर गर्व...परिजन का कहना है कि उन्हें इस बात का संतोष है कि इस कार्रवाई के बाद नियंत्रण रेखा पर हालात शांत हुए हैं। वे अपने बच्चों के बलिदान पर गर्व भी जताते हैं, लेकिन यह भी कहते हैं कि दिलों में बना खालीपन कभी नहीं भरेगा।
सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा रणनीति बदलने की मांग
न हमलों को सेना ने विफल किया, अब सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा रणनीति बदलने की मांग कर रहे हैं यहां के लोग। पूर्व सरपंच चौधरी बचन लाल कहते हैं कि अब समय आ गया है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा रणनीति को बदला जाए। उन्होंने बंकरों की संख्या बढ़ाने, आधुनिक तकनीक से लैस सुरक्षा तंत्र विकसित करने और आपातकालीन सुविधाओं को मजबूत करने की मांग की है, ताकि भविष्य में इस तरह के खतरों से बेहतर तरीके से निपटा जा सके और क्षेत्र में स्थायी शांति बनी रहे।
पूर्व सरपंच स्वर्ण लाल भगत कहते हैं किसी को अंदाजा नहीं था कि हालात अचानक बदल जाएंगे। अब सेना की तैयारी इतनी मजबूत लगती है कि आपरेशन सिंदूर के बाद कोई भारत की तरफ देखने की हिम्मत नहीं करेगा।
सुबह जैसे ही यह खबर सामने आई कि भारतीय सेना ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर ड्रोन से हमले किए हैं, पूरे क्षेत्र में हलचल मच गई। वह बताते हैं कि पहले जहां पाकिस्तान की ओर से मोर्टार शेलिंग होती थी, वहीं अब ड्रोन हमलों ने खतरे का नया रूप सामने ला दिया है। ड्रोन कब और कहां गिर जाएं, इसका कोई अंदाजा नहीं होता। इससे लोगों में दहशत और बढ़ गई है।
सेना की चौकसी बढ़ाती है ग्रामीणों का भरोसा
कवाल बॉर्डर के आसपास के गांवों में महिलाएं आंगन में अनाज सुखाती नजर आती हैं और बच्चे खाली खेतों में खेलते दिखते हैं। जीवन अपनी रफ्तार पर है, लेकिन सतर्कता हर चेहरे पर साफ झलकती है। गांव के पूर्व सरपंच खजूर राज कुछ लोगों के साथ शाम ढलने पर घर के बाहर बैठे हैं। कहते हैं कि आज (मंगलवार) सुबह ही ऑपरेशन सिंदूर की याद आई। सेना ने क्या खूब शौर्य दिखाया था। वे आगे बताते हैं कि अब अगली फसल की तैयारी शुरू हो गई है। डर तो रहता है, लेकिन जब तक सेना हमारे साथ है, हम निडर होकर काम करते रहेंगे।
मावर्ती गांव गढ़खाल संघर्ष के निशानों और यादों के बीच यह गांव अब फिर से जीवन की राह पर आगे बढ़ रहा है। कुलदीप सिंह बताते हैं कि अब हालात बदल चुके हैं। गांव में बच्चे फिर से स्कूल जाने लगे हैं, खेतों में काम शुरू हो चुका है और जीवन सामान्य होने की ओर लौट रहा है। सरकार ने गढ़खाल को ‘वाइब्रेंट विलेज’ का दर्जा दिया है जिससे विकास की नई उम्मीदें जगी हैं। आने वाले समय में यहां आधुनिक बंकर, सीसीटीवी कैमरे और अन्य सुविधाएं मिलेंगी। ओम प्रकाश बताते हैं कि उस समय उन्हें सब कुछ छोड़कर सुरक्षित जगह जाना पड़ा, लेकिन अब अपनी जमीन पर लौटकर काम करना सबसे बड़ा सुकून है।
आज गढ़खाल में शांति जरूर है, लेकिन यह शांति हमेशा सतर्कता के साथ जुड़ी हुई है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण लोगों के मन में जहां सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रहती है, वहीं बाढ़ का खतरा भी उन्हें परेशान करता है।
लोग बोले- डटे हैं और डटे रहेंगे...
रोसा और हौसला यहां की मिट्टी में है। लोग बोले, डटे हैं, डटे रहेंगे। ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर सीमावर्ती गांव ज्योड़ियां की यही तस्वीर सामने आई है। मई के वो शुरुआती दिन की सुबह आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है, जब तड़के तीन बजे से लेकर सुबह तक रिहायशी इलाकों पर भारी गोलाबारी हुई थी। पंजतूत, गुजरेंवाला, लोअर और अप्पर नरायाणा समेत कई गांवों में गोले गिरे। जानी नुकसान तो बच गया, लेकिन कई मकान क्षतिग्रस्त हो गए। गांव पंजतूत पलांवाला के हंस राज बताते हैं कि उनके घर की छत चीरकर गोला कमरे में गिरा था। वे कहते हैं, घर फिर बन जाएगा, लेकिन वे दिन कभी नहीं भूल सकते।
एक साल बाद हालात सामान्य होने लगे हैं। खेतों में हरियाली लौट आई है और लोग फिर काम पर जुटे हैं, लेकिन हर आवाज पर चौंक जाना आज भी आदत में शामिल है। प्रशासन ने बंकर बनाए हैं, फिर भी ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं और अतिरिक्त सुरक्षा इंतजाम की मांग कर रहे हैं। डर अब भी है, लेकिन उससे बड़ा यहां के लोगों का हौसला है, जो हर हाल में डटे रहने का विश्वास देता है।
नहीं छोड़ी अपनी जमीन
रगवाल की भौगोलिक स्थिति चुनौतीपूर्ण है। दो ओर पाकिस्तान की सीमा और तीसरी ओर दरिया चिनाब होने के कारण सुरक्षित स्थानों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। इसके बावजूद ग्रामीणों ने हिम्मत नहीं हारी। यह कहना है नई बस्ती निवासी वचन लाल का। उस पल को याद करते हुए कहते हैं, मैं अपने बच्चों को सुरक्षित स्थान पर भेजने की सोच ही रहा था कि फायरिंग शुरू हो गई। हम जैसे ही बंकर में पहुंचे, जोरदार धमाका हुआ। बाद में देखा तो गोला हमारे घर पर गिरा था। स्थानीय निवासियों का कहना है कि मुश्किल हालात के बावजूद उन्होंने अपनी जमीन नहीं छोड़ी और भारतीय सेना के साथ खड़े रहे।
दोबारा हिमाकत नहीं कर सका पाकिस्तान
लायन था, दहशत थी पर ये सुकून है कि पाकिस्तान दोबारा वैसी हिमाकत नहीं कर सका। ऑपरेशन सिंदूर की चर्चा छिड़ते ही सीमावर्ती अरनिया सेक्टर के ज्यादातर लोग जो कुछ कहते हैं उसका सार यही होता है। बीते साल की गोलाबारी, अफरातफरी और पलायन की यादों के बीच अब लोग राहत की सांस ले रहे हैं और मानते हैं कि भारत की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान दोबारा वैसी हिमाकत नहीं कर सका।
गांव चंगिया के पूर्व सरपंच रघुवीर सिंह बताते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र छिड़ते ही मुस्कुरा देते हैं। कहते हैं, कुछ भी हो ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की ओर से अब तक कोई बड़ी हरकत नहीं हुई। यह बताता है कि भारत ने उसे कितनी चोट पहुंचाई। बीच रास्ते में कई लोगों से बातें हुईं। कई लोगों ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान प्रशासन की सतर्कता और समय रहते बनाई गई रणनीति से बड़ा नुकसान बच गया। गांव चानना, अरनिया कस्बे के वार्ड नंबर 13 और आसपास के खेतों में मोर्टार शेल जरूर गिरे, लेकिन किसी बड़े जानमाल के नुकसान से लोग बच गए। उस समय हालात ऐसे थे कि लोगों को अचानक अपने घर छोड़कर सरकारी कैंपों में शरण लेनी पड़ी थी।
गांव पिंडी कुदवाल के सरदार राजवंत सिंह कमियों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं बंकर, स्कूलों में अंडरग्राउंड कक्षाएं, बख्तरबंद वाहन और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं अब भी जरूरी हैं। अरनिया कस्बे के कैलाश चंद्र सैनी के मुताबिक अरनिया अस्पताल के अपग्रेडेशन और व्यापार को पुनर्जीवित करने के लिए सरकारी कदमों की जरूरत बताई। भारत भूषण शर्मा ने बताया कि पिछले एक साल में हालात काफी हद तक सामान्य हुए हैं। लोग अब बेखौफ होकर खेती-बाड़ी और कारोबार में जुटे हैं। स्कूल भी नियमित रूप से चल रहे हैं। उनका कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान को करारा जवाब मिला, जिसकी याद उसे लंबे समय तक रहेगी।