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सुप्रीम कोर्ट: मौत की सजा पाए शख्स की फांसी पर अदालत ने लगाई रोक, फैसले के पीछे क्या है वजह? जानें पूरा मामला
Tue, 22 Sep 2026 06:41 PM IST
देवेश त्रिपाठी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Tue, 22 Sep 2026 06:41 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने तीन नाबालिग बच्चियों से करीब एक साल तक बार बार यौन अपराध के मामले में मौत की सजा पाए व्यक्ति की फांसी पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने मामले से जुड़े मूल दस्तावेज मंगाने के साथ तमिलनाडु सरकार से प्रोबेशन अधिकारियों की रिपोर्ट मांगी है। आइए जानते हैं सुप्रीम कोर्ट ने और क्या निर्देश दिए हैं...
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने तीन नाबालिग बच्चियों से बार-बार यौन शोषण के मामले में मौत की सजा पाए एक व्यक्ति की फांसी पर रोक लगा दी है। पीड़ित बच्चियों की उम्र छह से आठ साल के बीच थी।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उस व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिका में उसने इस साल जून में मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ द्वारा उसकी सजा और दोषसिद्धि बरकरार रखने के फैसले को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा था?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि तीन नाबालिग बच्चियों के साथ करीब एक साल तक बार-बार गंभीर यौन हमला किया गया। बच्चियों की उम्र क्रमशः छह, सात और आठ साल थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि दोषी किसी भी तरह की नरमी का हकदार नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट ने 21 सितंबर के अपने आदेश में कहा, "मौजूदा अपील की सुनवाई और अंतिम निपटारे तक मौत की सजा पर अमल पर रोक रहेगी।" पीठ ने मामले का मूल रिकॉर्ड ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से मंगाने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने जारी किए क्या निर्देश?
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह 16 सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता से संबंधित सभी प्रोबेशन अधिकारियों की रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करे। पीठ ने पलायमकोट्टई केंद्रीय जेल के अधीक्षक को भी निर्देश दिया कि वह जेल में रहने के दौरान दोषी द्वारा किए गए काम, उसके आचरण और व्यवहार के संबंध में रिपोर्ट पेश करें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्रमुख याचिकाकर्ता के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए एक उपयुक्त टीम गठित करें। पीठ ने इस मूल्यांकन की रिपोर्ट भी 16 सप्ताह के भीतर पेश करने का निर्देश दिया।
20 सप्ताह बाद फिर होगी मामले की सुनवाई
अदालत ने कहा, "नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से संबद्ध स्क्वायर सर्किल क्लिनिक के वीएस वरुणनवेलु को फिलहाल केंद्रीय जेल में बंद याचिकाकर्ता से मिलने की अनुमति दी जाती है। वह सजा से संबंधित जानकारी जुटाने के लिए उससे कई व्यक्तिगत साक्षात्कार कर सकते हैं और याचिकाकर्ता की ओर से सजा में राहत से जुड़े तथ्यों की जांच रिपोर्ट पेश कर सकते हैं।"
पीठ ने मामले को 20 सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। इस साल मार्च में ट्रायल कोर्ट ने व्यक्ति को मामले में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली उसकी अपील खारिज कर दी थी।
क्या है पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी तीनों नाबालिग पीड़िताओं का पड़ोसी था। बच्चियों के माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे। आरोप था कि वह बच्चियों का यौन शोषण करता था। अभियोजन के अनुसार, ये घटनाएं करीब एक साल तक होती रहीं। घटना सामने आने के बाद फरवरी 2023 में पॉक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपी को 27 फरवरी 2023 को गिरफ्तार किया गया था।
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से पेश वकील ने दलील दी थी कि पीड़िताओं के बयान अस्वाभाविक और विरोधाभासों से भरे थे। उन्होंने यह भी दावा किया था कि बच्चियों को सिखाए जाने के कारण उन्होंने अलग-अलग चरणों में अपने बयान में बदलाव किया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, "जिस आरोपी ने तीन बच्चों की आत्मा और गरिमा को नष्ट किया है, वह समाज में रहने के योग्य नहीं है और उसके द्वारा किए गए जघन्य अपराध के लिए उसे अपना जीवन गंवाना ही होगा।" हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि दोषी किसी भी तरह की नरमी का हकदार नहीं है और मौत की सजा से कम कोई भी सजा इस सामाजिक अपेक्षा को पूरा नहीं करेगी कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च है।
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न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उस व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। याचिका में उसने इस साल जून में मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ द्वारा उसकी सजा और दोषसिद्धि बरकरार रखने के फैसले को चुनौती दी थी।
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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा था?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि तीन नाबालिग बच्चियों के साथ करीब एक साल तक बार-बार गंभीर यौन हमला किया गया। बच्चियों की उम्र क्रमशः छह, सात और आठ साल थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि दोषी किसी भी तरह की नरमी का हकदार नहीं है।
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सुप्रीम कोर्ट ने 21 सितंबर के अपने आदेश में कहा, "मौजूदा अपील की सुनवाई और अंतिम निपटारे तक मौत की सजा पर अमल पर रोक रहेगी।" पीठ ने मामले का मूल रिकॉर्ड ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से मंगाने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने जारी किए क्या निर्देश?
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया कि वह 16 सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता से संबंधित सभी प्रोबेशन अधिकारियों की रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करे। पीठ ने पलायमकोट्टई केंद्रीय जेल के अधीक्षक को भी निर्देश दिया कि वह जेल में रहने के दौरान दोषी द्वारा किए गए काम, उसके आचरण और व्यवहार के संबंध में रिपोर्ट पेश करें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्रमुख याचिकाकर्ता के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के लिए एक उपयुक्त टीम गठित करें। पीठ ने इस मूल्यांकन की रिपोर्ट भी 16 सप्ताह के भीतर पेश करने का निर्देश दिया।
20 सप्ताह बाद फिर होगी मामले की सुनवाई
अदालत ने कहा, "नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ से संबद्ध स्क्वायर सर्किल क्लिनिक के वीएस वरुणनवेलु को फिलहाल केंद्रीय जेल में बंद याचिकाकर्ता से मिलने की अनुमति दी जाती है। वह सजा से संबंधित जानकारी जुटाने के लिए उससे कई व्यक्तिगत साक्षात्कार कर सकते हैं और याचिकाकर्ता की ओर से सजा में राहत से जुड़े तथ्यों की जांच रिपोर्ट पेश कर सकते हैं।"
पीठ ने मामले को 20 सप्ताह बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। इस साल मार्च में ट्रायल कोर्ट ने व्यक्ति को मामले में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली उसकी अपील खारिज कर दी थी।
क्या है पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी तीनों नाबालिग पीड़िताओं का पड़ोसी था। बच्चियों के माता-पिता दिहाड़ी मजदूर थे। आरोप था कि वह बच्चियों का यौन शोषण करता था। अभियोजन के अनुसार, ये घटनाएं करीब एक साल तक होती रहीं। घटना सामने आने के बाद फरवरी 2023 में पॉक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोपी को 27 फरवरी 2023 को गिरफ्तार किया गया था।
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से पेश वकील ने दलील दी थी कि पीड़िताओं के बयान अस्वाभाविक और विरोधाभासों से भरे थे। उन्होंने यह भी दावा किया था कि बच्चियों को सिखाए जाने के कारण उन्होंने अलग-अलग चरणों में अपने बयान में बदलाव किया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, "जिस आरोपी ने तीन बच्चों की आत्मा और गरिमा को नष्ट किया है, वह समाज में रहने के योग्य नहीं है और उसके द्वारा किए गए जघन्य अपराध के लिए उसे अपना जीवन गंवाना ही होगा।" हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि दोषी किसी भी तरह की नरमी का हकदार नहीं है और मौत की सजा से कम कोई भी सजा इस सामाजिक अपेक्षा को पूरा नहीं करेगी कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च है।