{"_id":"6acc77b182d75f7743043abb","slug":"mumbai-underworld-also-once-organise-garba-pandal-with-forcefull-donations-2026-10-12","type":"story","status":"publish","title_hn":"मुंबई: कभी अंडरवर्ल्ड के भी लगते थे गरबा पंडाल; चंदे के नाम पर व्यापारियों से की जाती थी मोटी उगाही","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
मुंबई: कभी अंडरवर्ल्ड के भी लगते थे गरबा पंडाल; चंदे के नाम पर व्यापारियों से की जाती थी मोटी उगाही
मुंबई में एक दौर ऐसा था, जब अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोग भी गरबा पंडाल लगाते थे। लेकिन इन पंडालों का मकसद सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि चंदे के नाम पर व्यापारियों और कंपनियों से मोटी रकम वसूलना भी था। 1993 मुंबई बम धमाकों की जांच टीम का हिस्सा रहे पूर्व एसीपी सुरेश वालीशेट्टी ने बताया कि यह सिलसिला करीब 2005 तक चला। अंडरवर्ल्ड गरबा पंडालों के जरिए उगाही कैसे करता था? पुलिस की कार्रवाई के बाद यह खेल क्यों बंद हुआ? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
विज्ञापन
कैसे गरबा पंडाल लगाते थे अंडरवर्ल्ड के लोग?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
रविवार से नवरात्र शुरू हो गए हैं। अगले कई दिनों तक देश के अन्य शहरों की तरह मुंबई में भी जगह-जगह रात में गरबा खेला जाएगा। मुंबई में एक दौर ऐसा भी रहा, जब अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोगों के गरबा पंडाल लगते थे। अब हालात बदल गए हैं। 1993 मुंबई ब्लास्ट की जांच टीम का हिस्सा रहे और संजय दत्त को गिरफ्तार करने वाले रिटायर एसीपी सुरेश वालीशेट्टी ने 'अमर उजाला' से बातचीत में बताया कि मुंबई में कभी अंडरवर्ल्ड के भी जगह-जगह गरबा पंडाल हुआ करते थे।
कैसे गरबा पंडाल लगाते थे अंडरवर्ल्ड के लोग?
सार्वजनिक स्थलों पर कोई भी पंडाल लगाने के लिए पुलिस की अनुमति जरूरी होती है। अंडरवर्ल्ड सरगनाओं को पता था कि उनके नाम पर पुलिस कभी अनुमति देगी नहीं, इसलिए सरगना अपने उन लोगों के जरिए पुलिस स्टेशन में अर्जी दिलवाते थे, जिनके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज न हो। सरगना के ऐसे आदमियों को अनुमति मिल भी जाती थी। लेकिन पुलिस को यह पता रहता था कि हकीकत में यह किस-किस सरगना का गरबा पंडाल है। पुलिस फिर कानून-व्यवस्था के मद्देनजर वहां सादी वर्दी में ज्यादा मॉनिटरिंग करती थी। बहुत से लोगों को गलतफहमी है कि वॉन्टेड आरोपी गरबा देखने के लिए वहां आते थे। हकीकत यह है कि खुद वॉन्टेड आरोपियों को पता रहता था कि उनके इलाके के किसी पंडाल में यदि वह जाएंगे, तो पकड़े जाएंगे।
जब छोटा राजन को लेकर फैली अफवाह
सुरेश वालीशेट्टी कहते हैं कि एक बार इस तरह की अफवाह फैली कि छोटा राजन भेष बदलकर तिलक नगर में एक पंडाल में आया है। सादी वर्दी में पुलिस वहां गई। बाद में पता चला कि छोटा राजन से जुड़ी वह जानकारी गलत थी। राजन उन दिनों विदेश में था। वह साल 2015 में इंडोनेशिया से डिपोर्ट होकर भारत लाया गया।
विज्ञापन
चंदे के नाम पर वसूली का खेल
रिटायर्ड एसीपी कहते हैं कि गरबा पंडाल लगाने के बहाने ज्यादातर सरगनाओं का मकसद चंदे के नाम पर मोटी वसूली करना होता था। सरगना के लोग सरगना के नाम पर जो भी रकम दुकानदारों से मांगते थे, उन्हें वह रकम देना पड़ता था। कई बार सरगना विज्ञापन के नाम पर बड़ी-बड़ी कंपनियों में भी जाते थे और वहां से मोटी रकम वसूलते थे। ऐसी कंपनियां के पंडाल के बाहर विज्ञापन भी लगे होते थे। उन दिनों अंडरवर्ल्ड और बॉलिवुड के रिश्ते सभी को पता थे। अंडरवर्ल्ड के लोग बॉलीवुड के लोगों से भी गरबा पंडाल लगाने के नाम पर रुपये लेते थे।
2005 तक चला यह सिलसिला
सुरेश वालीशेट्टी कहते हैं कि कौन सा गरबा पंडाल किस सरगना का है, यह उस पंडाल के आसपास लगने वाले सरगना के पोस्टरों से पता चल जाता था। अंडरवर्ल्ड सरगनाओं या उनके लोगों द्वारा गरबा पंडाल लगाने का यह सिलसिला करीब साल 2005 तक चला। लेकिन बाद में जब मुंबई में अंडरवर्ल्ड के लोग एनकाउंटर में मारे जाने लगे या मकोका व टाडा में गिरफ्तार होने लगे, तो सरगनाओं के करीबी लोगों ने भी पुलिस से पंडाल लगाने की अनुमति लेना बंद कर दिया, क्योंकि उनमें यह डर बैठ गया, कि पुलिस अंडरवर्ल्ड से लिंक में उन्हें यानी सरगना के आदमियों को भी जबरन उगाही के आरोप में गिरफ्तार कर सकती है। अब चूंकि सीसीटीवी युग है, पुलिस के लिए सरगनाओं के लोगों की गतिविधियों को मॉनिटर करना ज्यादा आसान है, इसलिए अंडरवर्ल्ड के लोग गरबा पंडाल के बहाने उगाही मांगने का और भी जोखिम नहीं लेते।
विज्ञापन
कैसे गरबा पंडाल लगाते थे अंडरवर्ल्ड के लोग?
सार्वजनिक स्थलों पर कोई भी पंडाल लगाने के लिए पुलिस की अनुमति जरूरी होती है। अंडरवर्ल्ड सरगनाओं को पता था कि उनके नाम पर पुलिस कभी अनुमति देगी नहीं, इसलिए सरगना अपने उन लोगों के जरिए पुलिस स्टेशन में अर्जी दिलवाते थे, जिनके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज न हो। सरगना के ऐसे आदमियों को अनुमति मिल भी जाती थी। लेकिन पुलिस को यह पता रहता था कि हकीकत में यह किस-किस सरगना का गरबा पंडाल है। पुलिस फिर कानून-व्यवस्था के मद्देनजर वहां सादी वर्दी में ज्यादा मॉनिटरिंग करती थी। बहुत से लोगों को गलतफहमी है कि वॉन्टेड आरोपी गरबा देखने के लिए वहां आते थे। हकीकत यह है कि खुद वॉन्टेड आरोपियों को पता रहता था कि उनके इलाके के किसी पंडाल में यदि वह जाएंगे, तो पकड़े जाएंगे।
विज्ञापन
जब छोटा राजन को लेकर फैली अफवाह
सुरेश वालीशेट्टी कहते हैं कि एक बार इस तरह की अफवाह फैली कि छोटा राजन भेष बदलकर तिलक नगर में एक पंडाल में आया है। सादी वर्दी में पुलिस वहां गई। बाद में पता चला कि छोटा राजन से जुड़ी वह जानकारी गलत थी। राजन उन दिनों विदेश में था। वह साल 2015 में इंडोनेशिया से डिपोर्ट होकर भारत लाया गया।
विज्ञापन
चंदे के नाम पर वसूली का खेल
रिटायर्ड एसीपी कहते हैं कि गरबा पंडाल लगाने के बहाने ज्यादातर सरगनाओं का मकसद चंदे के नाम पर मोटी वसूली करना होता था। सरगना के लोग सरगना के नाम पर जो भी रकम दुकानदारों से मांगते थे, उन्हें वह रकम देना पड़ता था। कई बार सरगना विज्ञापन के नाम पर बड़ी-बड़ी कंपनियों में भी जाते थे और वहां से मोटी रकम वसूलते थे। ऐसी कंपनियां के पंडाल के बाहर विज्ञापन भी लगे होते थे। उन दिनों अंडरवर्ल्ड और बॉलिवुड के रिश्ते सभी को पता थे। अंडरवर्ल्ड के लोग बॉलीवुड के लोगों से भी गरबा पंडाल लगाने के नाम पर रुपये लेते थे।
2005 तक चला यह सिलसिला
सुरेश वालीशेट्टी कहते हैं कि कौन सा गरबा पंडाल किस सरगना का है, यह उस पंडाल के आसपास लगने वाले सरगना के पोस्टरों से पता चल जाता था। अंडरवर्ल्ड सरगनाओं या उनके लोगों द्वारा गरबा पंडाल लगाने का यह सिलसिला करीब साल 2005 तक चला। लेकिन बाद में जब मुंबई में अंडरवर्ल्ड के लोग एनकाउंटर में मारे जाने लगे या मकोका व टाडा में गिरफ्तार होने लगे, तो सरगनाओं के करीबी लोगों ने भी पुलिस से पंडाल लगाने की अनुमति लेना बंद कर दिया, क्योंकि उनमें यह डर बैठ गया, कि पुलिस अंडरवर्ल्ड से लिंक में उन्हें यानी सरगना के आदमियों को भी जबरन उगाही के आरोप में गिरफ्तार कर सकती है। अब चूंकि सीसीटीवी युग है, पुलिस के लिए सरगनाओं के लोगों की गतिविधियों को मॉनिटर करना ज्यादा आसान है, इसलिए अंडरवर्ल्ड के लोग गरबा पंडाल के बहाने उगाही मांगने का और भी जोखिम नहीं लेते।