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मोदी सिद्धांत: हरीश साल्वे बोले- भारत बना स्थिरता का केंद्र, विदेश नीति से अर्थव्यवस्था तक बढ़ा भरोसा
Thu, 17 Sep 2026 04:48 AM IST
राकेश कुमार
हरीश साल्वे, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता व भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल
हरीश साल्वे, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता व भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 17 Sep 2026 04:48 AM IST
दुनिया में युद्ध, महामारी और बदलती वैश्विक व्यवस्था के बीच भारत स्थिरता और आर्थिक विकास के केंद्र के रूप में उभर रहा है। राजनीतिक निरंतरता और स्पष्ट दिशा ने देश की स्थिति मजबूत की है। भारतीय ज्ञान और परंपराओं को आधुनिक जरूरतों से जोड़ने, गरीबों तक विकास पहुंचाने और युवाओं के लिए अवसर बढ़ाने पर जोर है। विदेश नीति में संतुलन और वैश्विक दक्षिण की आवाज को मंच देने से भारत का प्रभाव बढ़ा है।
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ईद-ए-मिलाद और ओणम पर पीएम मोदी का संदेश
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
सु्प्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे लिखते हैं कि विंस्टन चर्चिल ने एक बार विक्टोरिया के शासनकाल के अंतिम दशकों को महान व्यक्तियों और छोटी घटनाओं का दौर बताया था। इसके विपरीत, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1959-1960 के समय को ऐसा दौर बताया था, जब छोटे कद के लोग बड़ी घटनाओं और बड़े फैसलों का सामना कर रहे थे। 21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है। पिछले दो दशकों से अधिक के इस दौर को बड़ी-बड़ी घटनाओं के समय के रूप में देखा जा सकता है। विज्ञान और तकनीक में ऐसी तेज प्रगति हुई है, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल था। लेकिन इसके साथ ही समाज में गिरावट और नैतिक पतन भी देखने को मिला है, जो पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर नहीं देखा गया था।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया में लोगों के जीवन स्तर, संपत्ति और राजनीतिक नैतिकता में अभूतपूर्व सुधार हुआ। धीरे-धीरे दुनिया एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ी, जिसमें एक ही महाशक्ति का दबदबा था। लेकिन जब यह व्यवस्था नई वास्तविकता लगने लगी, तभी पिछले दशक की घटनाओं ने विश्व व्यवस्था को फिर बदल दिया। ये बदलाव लगातार भूकंप के झटकों की तरह दुनिया की उन मजबूत नींवों को हिला रहे हैं, जिन्हें पहले अटल माना जाता था।
महामारी, यूक्रेन में युद्ध और अब अमेरिका-ईरान युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को झकझोर दिया है। इससे आपूर्ति शृंखलाएं टूट गई हैं और पश्चिम एशिया में ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। वहीं, यूरोप नई राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों से तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहा है। दुनिया में निराशा फैलाने वालों की आशंकाओं को गलत साबित करते हुए, भारत इस उथल-पुथल भरे दौर में स्थिरता का एक मजबूत केंद्र और आर्थिक विकास का इंजन बनकर उभरा है। इसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि देश में राजनीतिक निरंतरता बनी रही और आगे बढ़ने की दिशा स्पष्ट रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक दशक से अधिक के नेतृत्व की पहली प्रमुख विशेषता है- स्थिरता, राजनीतिक निरंतरता और देश को आगे ले जाने की स्पष्ट दिशा। पश्चिमी लोकतंत्रों में इस विशेषता का अभाव साफ दिखाई देता है।
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ब्रिटेन में 12 साल में 6 पीएम
पिछले 12 वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालें। ब्रिटेन में छह प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। फ्रांस में नौ प्रधानमंत्री रह चुके हैं और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों दो साल से भी कम समय में अपने छठे प्रधानमंत्री की तलाश कर रहे हैं। जापान और इटली में पांच-पांच प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चार कार्यकाल पूरे हो चुके हैं और दो बार सत्ता एक पार्टी से दूसरी पार्टी के हाथों में गई है। वहां शासन के बुनियादी तथ्यों पर भी राजनीतिक दलों के बीच सहमति नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की बुनियाद स्थिरता और नीतियों पर आधारित शासन है। इसके पीछे यह अटूट विश्वास है कि भारत को अपनी मजबूत नींव पर आगे बढ़ना चाहिए। देश के भीतर एक मजबूत और स्थिर भारत ही विदेशों में अधिक आत्मविश्वास और स्वतंत्रता के साथ अपनी भूमिका निभा सकता है।
भारत ज्ञान का भंडार: आजादी के बाद दशकों तक यह विरासत दबी रही
भारत परंपराओं और ज्ञान का समृद्ध भंडार रखने वाला देश है। लेकिन आजादी के बाद के कई दशकों तक यह विरासत औपनिवेशिक शासन के अवशेषों के नीचे दबी रही। प्राचीन भारतीय ज्ञान को आज के समय के अनुरूप अपनाना अब एक नए विचार के रूप में तेजी से सामने आ रहा है। नैतिकता, सदाचार और वंचितों के प्रति संवेदनशीलता आज की संस्थाओं की बुनियाद बन रहे हैं। तकनीक की प्रगति का इस्तेमाल करके ऐसी समृद्धि लाना, जिसका लाभ समाज के सबसे गरीब लोगों तक पहुंचे, और हर जिज्ञासु कुछ नया करने की चाह रखने वाले युवा के लिए अवसर पैदा करना- देश निर्माण के इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य बन गया है। नई भारतीय पहचान के केंद्र में भारतीयता की मजबूत भावना है। इसमें गर्व है, लेकिन अहंकार नहीं। यह विश्वास है कि आज के सपने कल हकीकत बन सकते है।
दबाव में नहीं बदलेगी विदेश नीति, समझती है दुनिया
भारत ने इस्राइल के साथ करीबी रणनीतिक संबंध बनाए है, वहीं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और व्यापक अरब जगत के साथ भी रिश्ते मजबूत किए हैं। इसके साथ ही ईरान के साथ बातचीत के रास्ते भी खुले रखे हैं। इन तमाम विरोधाभासों के बीच भारत जिस तरह आगे बढ़ रहा है, उसका कारण यह है कि उसके मित्र और विरोधी, दोनों समझते हैं कि भारत की विदेश नीति बदलते हालात या मुश्किलों के दबाव में अपनी दिशा नहीं बदलेगी।
पिछड़े देशों को दिया मंच
भारत ने ‘वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट’ का आयोजन करके उन देशों की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया, जिन्हें पहले अक्सर नजरअंदाज किया जाता था। इसके अलावा, भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को जी-20 की स्थायी सदस्यता दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई।
भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती पर दुनिया का भरोसा: स्थिरता से विश्वसनीयता बढ़ती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि दूसरे देश और निवेशक उस पर भरोसा जताने के लिए तैयार होते हैं। दुनिया के निवेशकों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस स्थिरता का प्रमुख चेहरा हैं। सितंबर 2026 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 780 अरब डॉलर के पार पहुंचना केवल एक वित्तीय उपलब्धि नहीं है। यह भारत की अर्थव्यवस्था की बढ़ती ताकत पर वैश्विक समुदाय के भरोसे का संकेत है।
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दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया में लोगों के जीवन स्तर, संपत्ति और राजनीतिक नैतिकता में अभूतपूर्व सुधार हुआ। धीरे-धीरे दुनिया एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ी, जिसमें एक ही महाशक्ति का दबदबा था। लेकिन जब यह व्यवस्था नई वास्तविकता लगने लगी, तभी पिछले दशक की घटनाओं ने विश्व व्यवस्था को फिर बदल दिया। ये बदलाव लगातार भूकंप के झटकों की तरह दुनिया की उन मजबूत नींवों को हिला रहे हैं, जिन्हें पहले अटल माना जाता था।
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महामारी, यूक्रेन में युद्ध और अब अमेरिका-ईरान युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को झकझोर दिया है। इससे आपूर्ति शृंखलाएं टूट गई हैं और पश्चिम एशिया में ऊर्जा संकट पैदा हो गया है। वहीं, यूरोप नई राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों से तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहा है। दुनिया में निराशा फैलाने वालों की आशंकाओं को गलत साबित करते हुए, भारत इस उथल-पुथल भरे दौर में स्थिरता का एक मजबूत केंद्र और आर्थिक विकास का इंजन बनकर उभरा है। इसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि देश में राजनीतिक निरंतरता बनी रही और आगे बढ़ने की दिशा स्पष्ट रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक दशक से अधिक के नेतृत्व की पहली प्रमुख विशेषता है- स्थिरता, राजनीतिक निरंतरता और देश को आगे ले जाने की स्पष्ट दिशा। पश्चिमी लोकतंत्रों में इस विशेषता का अभाव साफ दिखाई देता है।
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ब्रिटेन में 12 साल में 6 पीएम
पिछले 12 वर्षों के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर डालें। ब्रिटेन में छह प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। फ्रांस में नौ प्रधानमंत्री रह चुके हैं और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों दो साल से भी कम समय में अपने छठे प्रधानमंत्री की तलाश कर रहे हैं। जापान और इटली में पांच-पांच प्रधानमंत्री बदल चुके हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चार कार्यकाल पूरे हो चुके हैं और दो बार सत्ता एक पार्टी से दूसरी पार्टी के हाथों में गई है। वहां शासन के बुनियादी तथ्यों पर भी राजनीतिक दलों के बीच सहमति नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की बुनियाद स्थिरता और नीतियों पर आधारित शासन है। इसके पीछे यह अटूट विश्वास है कि भारत को अपनी मजबूत नींव पर आगे बढ़ना चाहिए। देश के भीतर एक मजबूत और स्थिर भारत ही विदेशों में अधिक आत्मविश्वास और स्वतंत्रता के साथ अपनी भूमिका निभा सकता है।
भारत ज्ञान का भंडार: आजादी के बाद दशकों तक यह विरासत दबी रही
भारत परंपराओं और ज्ञान का समृद्ध भंडार रखने वाला देश है। लेकिन आजादी के बाद के कई दशकों तक यह विरासत औपनिवेशिक शासन के अवशेषों के नीचे दबी रही। प्राचीन भारतीय ज्ञान को आज के समय के अनुरूप अपनाना अब एक नए विचार के रूप में तेजी से सामने आ रहा है। नैतिकता, सदाचार और वंचितों के प्रति संवेदनशीलता आज की संस्थाओं की बुनियाद बन रहे हैं। तकनीक की प्रगति का इस्तेमाल करके ऐसी समृद्धि लाना, जिसका लाभ समाज के सबसे गरीब लोगों तक पहुंचे, और हर जिज्ञासु कुछ नया करने की चाह रखने वाले युवा के लिए अवसर पैदा करना- देश निर्माण के इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य बन गया है। नई भारतीय पहचान के केंद्र में भारतीयता की मजबूत भावना है। इसमें गर्व है, लेकिन अहंकार नहीं। यह विश्वास है कि आज के सपने कल हकीकत बन सकते है।
दबाव में नहीं बदलेगी विदेश नीति, समझती है दुनिया
भारत ने इस्राइल के साथ करीबी रणनीतिक संबंध बनाए है, वहीं सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और व्यापक अरब जगत के साथ भी रिश्ते मजबूत किए हैं। इसके साथ ही ईरान के साथ बातचीत के रास्ते भी खुले रखे हैं। इन तमाम विरोधाभासों के बीच भारत जिस तरह आगे बढ़ रहा है, उसका कारण यह है कि उसके मित्र और विरोधी, दोनों समझते हैं कि भारत की विदेश नीति बदलते हालात या मुश्किलों के दबाव में अपनी दिशा नहीं बदलेगी।
पिछड़े देशों को दिया मंच
भारत ने ‘वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट’ का आयोजन करके उन देशों की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया, जिन्हें पहले अक्सर नजरअंदाज किया जाता था। इसके अलावा, भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को जी-20 की स्थायी सदस्यता दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई गई।
भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती पर दुनिया का भरोसा: स्थिरता से विश्वसनीयता बढ़ती है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि दूसरे देश और निवेशक उस पर भरोसा जताने के लिए तैयार होते हैं। दुनिया के निवेशकों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस स्थिरता का प्रमुख चेहरा हैं। सितंबर 2026 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 780 अरब डॉलर के पार पहुंचना केवल एक वित्तीय उपलब्धि नहीं है। यह भारत की अर्थव्यवस्था की बढ़ती ताकत पर वैश्विक समुदाय के भरोसे का संकेत है।