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गोरखा मुद्दे पर ‘फाइनल डील’ की तैयारी: शाह की बैठक के बाद MHA ने बनाई कमेटी, दार्जिलिंग से दिल्ली तक हलचल तेज
Sat, 22 Aug 2026 03:26 PM IST
प्रशांत तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Sat, 22 Aug 2026 03:26 PM IST
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, गोरखा नेताओं और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच हुई एक अहम बैठक के बाद केंद्र सरकार ने गोरखा मुद्दे पर अंतिम समझौते का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति का गठन किया है। बैठक में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों ने अपनी चिंताओं, मांगों और उम्मीदों को सामने रखा।
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गृह मंत्री अमित शाह
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में गोरखा नेताओं, पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य हितधारकों की बैठक के बाद गोरखा मुद्दे के स्थायी राजनीतिक समाधान की दिशा में अहम पहल सामने आई है। भाजपा सांसद राजू बिस्टा के अनुसार, गृह मंत्रालय ने मध्यस्थ पंकज कुमार सिंह के नेतृत्व में एक समिति गठित की है, जो बैठक में बनी सहमति के आधार पर अंतिम समझौते का मसौदा तैयार करेगी। यह पहल 1988 के गोरखा समझौते की वर्षगांठ के दिन हुई बैठक के कारण भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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स्थायी समाधान के लिए समिति का गठन
शाह के उत्तर बंगाल दौरे के तीसरे और आखिरी दिन दार्जिलिंग की तलहटी में स्थित सुकना के एक होटल में यह अहम बैठक हुई। इसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी, पहाड़ी इलाकों की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के नेता और क्षेत्र से जुड़े अन्य हितधारक शामिल हुए।
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बिस्टा ने कहा कि मध्यस्थ पंकज कुमार सिंह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय के तहत एक समिति का गठन किया गया है। यह समिति आज हुए समझौते के मसौदे को अंतिम रूप देने का काम करेगी।
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पंकज कुमार सिंह को मिली अहम जिम्मेदारी
अक्टूबर 2025 में गृह मंत्रालय ने सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी और पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पंकज कुमार सिंह को इस मुद्दे के लिए आधिकारिक सरकारी मध्यस्थ नियुक्त किया था। उनकी भूमिका राजनीतिक बातचीत को आगे बढ़ाने और गोरखा समुदाय की लंबे समय से चली आ रही मांगों के समाधान की दिशा में काम करने पर केंद्रित है।
1988 के गोरखा समझौते की तारीख से जुड़ा ऐतिहासिक दिन
दार्जिलिंग के सांसद बिस्टा ने कहा कि शनिवार को हुई बैठक अपने आप में एक ऐतिहासिक दिन पर हुई, क्योंकि इसकी तारीख 1988 में हुए गोरखा समझौते पर हस्ताक्षर की तारीख से मेल खाती है। केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) के बीच हुए इस समझौते के बाद गोरखालैंड के अलग राज्य की मांग को लेकर चले हिंसक आंदोलन के बीच दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) का गठन किया गया था।
चार दशक से ज्यादा पुराने संघर्ष का मुद्दा
बिस्टा ने आरोप लगाया कि पहाड़ी समुदायों के संघर्ष का इतिहास चार दशकों से अधिक पुराना है। इस दौरान पिछली वामपंथी और टीएमसी सरकारों ने पहाड़ी लोगों की आकांक्षाओं को कुचलने का काम किया। हमारे लोगों के बलिदान में लगभग 2,000 लोगों की शहादत, 5,000 से अधिक लोगों का विस्थापन और महिलाओं के साथ अत्याचार तथा बलात्कार शामिल हैं।”
सभी पक्षों ने रखी अपनी बात
बिस्टा के मुताबिक, बैठक में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों ने अपनी चिंताओं, मांगों और उम्मीदों को सामने रखा। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने भी पहाड़ी लोगों के मुद्दों के समाधान को लेकर अपनी सरकार की सोच और योजनाओं के बारे में बात की। सांसद ने कहा कि सभी पक्षों की बात सुनने के बाद शाह ने बैठक का समापन करते हुए बताया कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे का स्थायी समाधान किस तरह निकाला जाएगा।”
संवैधानिक दायरे में समाधान की कोशिश
बैठक में दार्जिलिंग की पहाड़ियों से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दों का संविधान के दायरे में रहते हुए “स्थायी राजनीतिक समाधान” तलाशने के एजेंडे पर चर्चा हुई। यह बीजेपी की ओर से चुनाव से पहले पहाड़ी क्षेत्रों के मुद्दों के समाधान को लेकर किए गए वादे के अनुरूप भी माना जा रहा है।
बैठक में कई प्रमुख नेता रहे मौजूद
मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के अलावा बैठक में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) के प्रमुख बिमल गुरुंग और पार्टी के वरिष्ठ नेता रोशन गिरी, GNLF प्रमुख मान घिसिंग, राज्य सरकार के कई मंत्री, पहाड़ी इलाकों से बीजेपी के विधायक और पश्चिम बंगाल सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
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DGHC और GTA से आगे स्थायी समाधान की तलाश
पिछली राज्य सरकारों ने दार्जिलिंग पहाड़ियों के राजनीतिक मुद्दे का समाधान तलाशने के लिए दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) और गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) जैसी व्यवस्थाएं लागू की थीं। हालांकि, इन व्यवस्थाओं के बावजूद क्षेत्र में लंबे समय तक राजनीतिक स्थिरता, शांति और आर्थिक समृद्धि कायम नहीं हो सकी। ऐसे में केंद्र के स्तर पर गठित नई समिति से गोरखा मुद्दे के व्यापक और स्थायी राजनीतिक समाधान की उम्मीद बढ़ी है।