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मुंबई पुलिस: 'परमबीर सिंह' ने खुद को मुसीबत में फंसा लिया, तब दबंगई दिखाने से चूक गए पुलिस कमिश्नर!
Tue, 23 Mar 2021 06:02 PM IST
Harendra Chaudhary
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Tue, 23 Mar 2021 06:02 PM IST
'महाराष्ट्र के करोड़ों रुपये के सिंचाई घोटाले में जब तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजीत पवार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा तो मामले की जांच एंटी करप्शन ब्यूरो ने की थी। उस वक्त परमबीर सिंह ही ब्यूरो के चीफ थे।'
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परमबीर सिंह
- फोटो : ANI (File)
विस्तार
मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह की दबंगई से हर कोई परिचित है। इस बार उन्होंने राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख पर भ्रष्टाचार का आरोप जड़ तो दिया, मगर जब देशमुख ने पलटवार किया तो परमबीर सिंह, मामले की सीबीआई जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। बीएसएफ और सीआरपीएफ जैसे केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में शीर्ष पदों पर काम कर चुके पूर्व डीजीपी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया, परमबीर सिंह ने इस केस में खुद को मुसीबत में फंसा लिया है। उन्होंने दूसरे मामलों में भरपूर दबंगई दिखाई, मगर यहां वे गच्चा खा गए।
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मौजूदा केस में वे दबंगई दिखाने से पूरी तरह चूक गए। जब पूर्व पुलिस आयुक्त के पास ठोस सबूत थे तो उन्हें तभी आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी। इसमें भले ही एनकाउंटर स्पेशलिस्ट सचिन वाजे हो या गृह मंत्री अनिल देशमुख। जो खुद सीपी रैंक का अफसर रहा हो और वही सीबीआई जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय में चला जाए, ये कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा तो हो सकता है, मगर इसे जिम्मेदार अधिकारी के लिए अपने पद का अनुसरण करना नहीं कहेंगे।
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पूर्व डीजीपी कहते हैं, परमबीर सिंह का पत्र फर्जी नहीं था। कुल मिलाकर इस मामले में उनके पास कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त सबूत थे। सूचनाएं भी विश्वसनीय रही हैं। पूर्व पुलिस आयुक्त ने अपने पद के मुताबिक काम नहीं किया। किस अधिकारी को कहां पर लगाना है, ये सरकार का अधिकार है। अगर परमबीर सिंह को मुंबई पुलिस आयुक्त पद से हटा दिया गया तो वह बड़ी बात नहीं थी।
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अब जो सबूत मीडिया में छन-छन कर सामने आ रहे हैं, उनके बल पर वे आरोपियों के खिलाफ तय कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई कर सकते थे। वह उनके पद के अनुरुप भी था। सीबीआई जांच की मांग करना पुलिस आयुक्त का काम नहीं है। केंद्र, राज्य सरकार और अदालत, किसी मामले की जांच सीबीआई को सौंप सकते हैं।
अगर ये मान भी लिया जाए तो वे किसी प्रभाव के बल पर सर्वोच्च अदालत में इस केस को मजबूती के साथ रखें, लेकिन वह पुलिस आयुक्त रैंक के अफसर के लिए ठीक नहीं कहा जाएगा। उनके पास उपयुक्त कार्रवाई के तमाम ठोस कारण मौजूद थे, लेकिन तब उन्होंने जरूरी कदम नहीं उठाया। अगर अब कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश नहीं दिया तब क्या होगा? दबंग अफसर रहे परमबीर सिंह ने खुद को फंसा लिया है।
इस केस में सचिव वाजे कोई छोटा-मोटा एपीआई नहीं था। उस पर हत्या जैसे गंभीर आरोप लगे, वह सस्पेंड भी हुआ और बाद में बहाल हो गया। उसे फिर से नौकरी पर लाने वाले कौन लोग थे, जाहिर सी बात है कि टॉप नौकरशाही और राजनेताओं के हस्तक्षेप के बिना यह संभव नहीं है।
दूसरी तरफ परमबीर सिंह तो खुद भी 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट' रहे हैं। ये अलग बात है कि उन पर भी कई मामलों में सवाल उठ चुके हैं। महाराष्ट्र के करोड़ों रुपये के सिंचाई घोटाले में जब तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजीत पवार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा तो मामले की जांच एंटी करप्शन ब्यूरो ने की थी। उस वक्त परमबीर सिंह ही ब्यूरो के चीफ थे।
तब अजीत पवार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। वजह, एंटी करप्शन ब्यूरो ने अपनी रिपोर्ट में उन्हें क्लीन चिट दे दी थी। खास बात है कि इससे पहले उसी एंटी करप्शन ब्यूरो ने ही उन्हें भ्रष्टाचार का आरोपी बनाया था। ये केस राज्य में चर्चा का विषय बन गया था। एलगार परिषद की जांच मामले में परमबीर सिंह ने जब प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, तो उन्हें मुंबई हाईकोर्ट की नाराजगी झेलनी पड़ी। उन्होंने मीडिया के समक्ष सबूत क्यों रखें, कोर्ट इस बात को लेकर खासा नाराज था। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के मामले में भी उन पर आरोप लगे थे। आतंकियों और गैंगस्टर से जुड़े केसों की जांच में भी परमबीर सिंह की भूमिका पर सवाल खड़े होते रहे हैं।