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Sajjan Kumar: दरियागंज के गांव से संसद तक रही सज्जन की धमक, बने दिल्ली के बड़े नेता; सिख दंगे से पहचान विवादित

Fri, 21 Aug 2026 06:32 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 21 Aug 2026 06:32 AM IST
सार
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युवावस्था में जुझारू तेवर, संजय गांधी से नजदीकी, सड़क पर लगातार सक्रिय रहने की शैली और संगठन में मजबूत पकड़ ने उन्हें दिल्ली कांग्रेस के बड़े नेताओं की कतार में पहुंचाया। 

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Sajjan’s influence spanned from village to Parliament; the Sikh riots cast a shadow over his reputation.
सज्जन कुमार की फाइल फोटो - फोटो : पीटीआई

विस्तार

दिल्ली की राजनीति में सज्जन कुमार का नाम एक ऐसे नेता के तौर पर दर्ज है, जिसने बेहद साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर सत्ता के गलियारों तक अपनी जगह बनाई। युवावस्था में जुझारू तेवर, संजय गांधी से नजदीकी, सड़क पर लगातार सक्रिय रहने की शैली और संगठन में मजबूत पकड़ ने उन्हें दिल्ली कांग्रेस के बड़े नेताओं की कतार में पहुंचाया। 

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नगर निगम के पार्षद से लोकसभा सांसद तक का सफर तय करने वाले सज्जन कुमार की सियासी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़, हालांकि 1984 के सिख विरोधी दंगे बने। दंगों से जुड़े आरोपों और वर्षों चली न्यायिक प्रक्रिया ने आखिरकार उनके राजनीतिक करियर को पूरी तरह खत्म कर दिया।
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दरियागंज के जटवाड़ा कला गांव में पले-बढ़े सज्जन कुमार की इमरजेंसी से पहले संजय गांधी से करोल बाग इलाके में मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात ने उनको राजनीति में प्रवेश देने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि वह उस समय दिल्ली के कई कांग्रेसी नेताओं के संपर्क में थे। 
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संजय गांधी से संबंध आगे चलकर सज्जन कुमार के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी ताकत बना। इमरजेंसी खत्म होने के बाद 1977 में दिल्ली नगर निगम के चुनाव हुए। देश में जनता पार्टी की जबरदस्त लहर थी और कांग्रेस के लिए चुनाव बेहद मुश्किल माना जा रहा था। इसके बावजूद संजय गांधी के भरोसे पर कांग्रेस ने सज्जन कुमार को नांगलोई वार्ड से टिकट दिया।

इस चुनाव में उन्होंने सबसे अधिक मतों से जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक ताकत का परिचय दिया। इसके बाद वह दिल्ली कांग्रेस में तेजी से उभरते गए। जनता पार्टी सरकार के दौरान इंदिरा गांधी और संजय गांधी की विभिन्न मामलों में मुकदमों की सुनवाई के दौरान सज्जन कुमार अपने समर्थकों के साथ अदालतों के बाहर सक्रिय रहते थे। उनकी यह आक्रामक राजनीतिक शैली उनकी पहचान बन गई।

1984 के बाद पहली बार राजनीतिक संकट  
1984 ने उनकी राजनीति की दिशा बदल दी। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगों में सज्जन कुमार का नाम सामने आया। उन पर लगे आरोपों ने कांग्रेस के लिए भी राजनीतिक असहजता पैदा की। वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उनका टिकट काट दिया और 1989 में भी उन्हें टिकट नहीं मिला। इसके बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। वर्ष 1991 में कांग्रेस ने एक बार फिर उन्हें बाहरी दिल्ली से मैदान में उतारा और उन्होंने चुनाव जीतकर संसद में वापसी की और 1996 में भी उन्हें टिकट मिला, लेकिन इस बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

कांग्रेस ने वर्ष 1998 व 1999 में दंगों के कारण उनका टिकट काट दिया, मगर 2004 में एक बार फिर सज्जन कुमार पर भरोसा किया। बाहरी दिल्ली से चुनाव लड़कर उन्होंने भाजपा के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री रहे साहिब सिंह वर्मा को पराजित किया और लोकसभा में लौटे। लेकिन 2009 में 1984 के दंगों का मुद्दा फिर निर्णायक बन गया। सिख संगठनों के विरोध के बीच कांग्रेस को उनका टिकट वापस लेना पड़ा। उनकी जगह उनके भाई रमेश कुमार को दक्षिण दिल्ली से उम्मीदवार बनाया गया। इसके बाद सज्जन कुमार का सक्रिय चुनावी राजनीति में वापसी का रास्ता लगभग बंद हो गया।

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका, महासचिव जगदीप सिंह काहलों और धर्म प्रचार चेयरमैन जसप्रीत सिंह करमसर ने कहा कि 1984 के सिख दंगों के मामलों में दोषी ठहराए गए सज्जन कुमार को फांसी की सजा मिलनी चाहिए थी। 1984 के दौरान सज्जन कुमार ने हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया था और सिखों की हत्या में भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि ऐसे गंभीर अपराधों के लिए मिली उम्रकैद की सजा पीड़ित परिवारों के दर्द को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती। इन नेताओं ने कहा कि 1984 के मामलों में न्याय मिलने में चार दशक का समय लग गया। 

42 साल लंबी कानूनी लड़ाई का अंत,  न्यायालय में उलझी रही सज्जन की जिंदगी
पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार पर 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े कई मुकदमे दशकों तक चले। 2015 में केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई एसआईटी ने कई मामलों को दोबारा खोला, जिसमें सुनवाई शुरू हुई। 

बीते कुछ साल में दो मामलों में उन्हें उम्रकैद की सजा हुई, जबकि एक मामले में हाल ही में बरी कर दिया गया। बृहस्पतिवार (20 अगस्त 2026) को 80 वर्ष की आयु में तिहाड़ जेल से सफदरजंग अस्पताल लाए जाने के दौरान उनका निधन हो गया। वर्तमान में सज्जन कुमार उम्रकैद की सजा काट रहे थे। उच्च न्यायालय ने उम्रकैद की सजा सुनाई और इसे मानवता के खिलाफ अपराध बताया था। 


सुल्तानपुरी समेत कुछ अन्य मामलों में वे पहले बरी हो चुके थे। 2015 में केंद्र सरकार द्वारा गठित एसआईटी ने बंद पड़े कई मामलों की दोबारा जांच की, जिसके बाद कुछ नए मामले सामने आए। कुल मिलाकर 1984 दंगों में दिल्ली में हजारों मौतें हुईं, लेकिन दोषसिद्धि की संख्या बहुत कम रही। सज्जन कुमार 2018 से तिहाड़ जेल में बंद थे।  उनकी मौत के साथ 42 साल लंबी कानूनी प्रक्रिया का एक अध्याय समाप्त हो गया है। 

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