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बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर लगेगा बैन?: याचिका पर हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार का किया जिक्र, पूरा मामला

Thu, 20 Aug 2026 06:04 PM IST
Rahul Kumar Tiwari पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: Rahul Kumar Tiwari Updated Thu, 20 Aug 2026 06:04 PM IST
सार
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दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को प्रतिबंधित या नियंत्रित करने के मुद्दे को केंद्र सरकार के नीतिगत दायरे का विषय बताया। याचिका में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध और 13-16 वर्ष के लिए नियमन की मांग की गई थी।
 

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Delhi High Court refuses to hear plea seeking ban on children use of social media
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : AI

विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाना या उसे नियंत्रित करना केंद्र सरकार की नीति बनाने के दायरे में आता है। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से इस पहलू पर विचार करने को कहा।
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न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत पी. एस. अरोड़ा की पीठ ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने केंद्र सरकार से इसे एक अभ्यावेदन के तौर पर विचार करने को कहा। हालांकि, पीठ ने अधिकारियों को इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कोई समयसीमा तय करने से इनकार कर दिया।
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पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, 'आपके विचारों पर प्रतिवादियों द्वारा विचार किया जाएगा। हितधारकों से परामर्श किया जाना है। उनके विचार लिए जाने हैं और उसके बाद यह नीति के दायरे में आता है। अदालत के लिए यह निर्देश देना उचित नहीं है कि आपको इस पर प्रतिबंध लगाना चाहिए या उस पर प्रतिबंध लगाना चाहिए। उन्हें इस पर विचार करने दें और फिर आदेश पारित करें।'
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याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करने के लिए कानून या दिशा-निर्देश बनाने पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की थी। याचिका में 13 से 16 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया सामग्री को 'नियंत्रित' करने के लिए एक रूपरेखा तैयार करने की भी मांग की गई थी।

केंद्र सरकार की वकील निधि रमन ने कहा कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल को प्रतिबंधित या नियंत्रित करने का मुद्दा नीति से जुड़ा है, जिस पर केंद्र को विचार करना होगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए नए कानून की जरूरत भी पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसी नीति के व्यापक प्रभाव होंगे और इसके लिए हितधारकों से परामर्श करना जरूरी होगा। केंद्र की ओर से पेश वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता की याचिका को अधिकारियों के समक्ष अभ्यावेदन के तौर पर माना जा सकता है और उचित आदेश पारित किया जा सकता है।
 

अदालत ने जब पूछा कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश के बाद कोई कार्रवाई की गई है या नहीं, तो वकील ने बताया कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट बनाया जा चुका है, जो बच्चों की ऑनलाइन निजता की भी सुरक्षा करता है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटेरियल (CSAM) की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई और अदालत से सरकार को इस अभ्यावेदन पर समयबद्ध तरीके से फैसला लेने का निर्देश देने का आग्रह किया।

इस पर पीठ ने कहा, 'हम उन्हें बाध्य नहीं करना चाहते। ये सभी नीतिगत मामले हैं।' अदालत ने कहा कि प्रतिबंध अंतिम राहत है और इस बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के मध्यस्थ सीएसएएम के खिलाफ कदम उठा रहे हैं।

मेटा प्लेटफॉर्म्स पर CSAM को लेकर कोर्ट में सुनवाई
मेटा प्लेटफॉर्म्स की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने अदालत को भरोसा दिलाया कि कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर सीएसएएम को नियंत्रित करने के लिए कदम उठा रही है। उन्होंने बताया कि पिछले साल फेसबुक पर सीएसएएम वाली छह लाख से अधिक पोस्ट हटाई गईं, जबकि इंस्टाग्राम से भी ऐसी दो लाख से अधिक पोस्ट हटाई गईं।

वरिष्ठ वकील ने बताया कि दोनों प्लेटफॉर्म पर सीएसएएम की प्रोएक्टिव डिटेक्शन रेट 99 प्रतिशत थी। उन्होंने कहा, 'हटाए गए खातों की संख्या बहुत अधिक है। साथ ही, कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों को ऐसा करने से पूरी तरह नहीं रोका जा सकता। तकनीक विकसित हो रही है और पहचान करना आसान हो रहा है, लेकिन होता यह है कि तमाम प्रयासों के बावजूद कुछ सामग्री लीक हो जाती है और मीडिया में आ जाती है।
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