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चिंता की बात: 'मुफ्त' की कीमत, नीति और नैतिकता के लिए भी चुनौती
Sat, 21 Feb 2026 07:03 AM IST
लव गौर
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: लव गौर
Updated Sat, 21 Feb 2026 07:03 AM IST
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चुनाव से पहले राज्यों द्वारा घोषित की जा रही 'मुफ्त' योजनाओं पर सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणी ने एक बार फिर लोकलुभावन राजनीति और उसकी आर्थिक कीमत पर बहस छेड़ दी है। अदालत ने सवाल उठाया है कि ऐसी घोषणाएं क्या वास्तव में सामाजिक न्याय को मजबूत कर रही हैं या देश को कर्ज और निर्भरता की संस्कृति की ओर धकेल रही हैं।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों द्वारा चुनाव से पहले बांटी जाने वाली मुफ्त की रेवड़ियों (लोकलुभावन वादे और योजनाएं) को लेकर जो तीखी टिप्पणियां की हैं, वे देश के लोकतांत्रिक और सामाजिक-राजनीतिक चरित्र के मद्देनजर गहरी चिंता का विषय हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि चुनावी राजनीति में मुफ्त योजनाओं की घोषणाओं की होड़ ने जिस प्रवृत्ति को जन्म दिया है, वह अब नीति और नैतिकता, दोनों के लिए चुनौती बनती जा रही है।ऐसी घोषणाओं के पीछे तर्क यही होता है कि वे सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मजबूत करती हैं। निस्संदेह, संविधान भारत को एक कल्याणकारी राज्य के रूप में परिकल्पित करता है और कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए लक्षित सहायता आवश्यक भी है। लेकिन, सवाल यह है कि क्या हर चुनाव के पहले अंधाधुंध मुफ्त वितरण उसी दिशा में उठाया गया कदम है, या यह महज राजनीतिक लाभ का साधन बनकर रह चुका है। तमिलनाडु की मुफ्त बिजली योजना पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इससे ही जुड़ा एक दूसरा सवाल उठाया है कि आखिर हम पूरे देश में किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं?
शीर्ष अदालत का यह कहना भी बिल्कुल उचित है कि तमिलनाडु सरकार की घोषणा सरकारी खजाने पर बोझ तो डालेगी ही, इससे बिजली वितरण कंपनियों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ेगा। ऐसा ही एक दूसरा उदाहरण पिछले हफ्ते का है, जब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने एक योजना के तहत आने वाली 1.31 करोड़ महिलाओं में से प्रत्येक के खाते में पांच हजार रुपये हस्तांतरित किए। उनकी इस घोषणा से एक ही झटके में राज्य सरकार पर 6,550 करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ बढ़ गया है। ऐसा तब है, जब उनकी सरकार केंद्र पर तमिलनाडु के खिलाफ फंड जारी करने में भेदभाव करने का आरोप लगा रही है।
न्यायालय की चिंता का मूल यही है कि जब राज्य सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े पैमाने पर मुफ्त योजनाओं की घोषणा करते हैं, तो इसका बोझ अंतत: करदाताओं और भावी पीढ़ियों पर पड़ता है। राजकोषीय घाटा बढ़ता है और विकास योजनाएं प्रभावित होती हैं। यह भी विचारणीय है कि क्या मुफ्त योजनाएं वाकई सशक्तीकरण का माध्यम बन रही हैं? भारतीय राजनीतिक तंत्र में मुफ्त योजनाओं की संस्कृति इतनी गहराई से समाई हुई है कि इनका कोई अंत नहीं दिखता। बात सिर्फ तमिलनाडु की नहीं, शीर्ष अदालत के सवाल सभी राज्यों व राजनीतिक दलों के लिए आईना हैं और सभी को इस दिशा में गंभीरता से सोचना भी होगा।