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जी नहीं, नैतिकता नहीं चाहिए

Thu, 23 May 2013 09:19 PM IST
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
मुरली मनोहर श्रीवास्तव Updated Thu, 23 May 2013 09:19 PM IST
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no need of morals

इस युग में आप कुछ भी बेच सकते हैं। क्विकर और ई बे है न! आपने ट्राई किया क्या?

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खैर छोड़िए, विकास के तमाम दावों के बाद भी अब तक मैं देश की अधिकांश जनता को हाइटेक नहीं मानता। जो लोग निन्यान्बे रुपये के इकोनॉमी पैक वाला इंटरनेट लेकर खुद को देश के विकास की मुख्यधारा से जुड़ा हुआ समझते हैं, उनके भ्रम में जीते रहने पर मुझे पूरी संवेदना है।

मामला बेचने का चल रहा था। दरअसल जब चीजें पर्दे के पीछे होती हैं, तो वे राज कहलाती हैं और जब पर्दा उठ जाता है, तो राज राज न रहकर आम हो जाता है। ऐसा ही मामला सेल का है। पहले जब मैं किसी शॉपिंग मॉल में सेल देखता, तो चौंक पड़ता था। भाई साहब, जो कोल्ड ड्रिंक्स मार्केट में साठ की है, वह मॉल में साठ की दो है।
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पर धीरे-धीरे मेरी आंखों से पर्दा हटा। पता चला कि सेल वाला आइटम एक्स्पायरी के करीब है। सेल में नब्बे पर्सेंट ऑफ वाली शर्ट ओवरसाइज है और जो ब्रांडेड आइटम फुटपथिया रेट पर बिक रहा है, वह रिपेयर मांगता है।
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वैसे भी एक्स्पायरी के करीब चल रहे सामान पर सेल सबसे ज्यादा होती है। हम भारतीय जानते हैं कि एक्सपायरी डेट लिख देने भर से चीजें एक्स्पायर नहीं हुआ करतीं। डेट कुछ भी हो, अगर टेस्ट ठीक है, तो कोई भी सामान एक्स्पायर नहीं होता। मैं तो इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि जो चीज एक्स्पायरी के करीब हो, उस पर बंपर सेल लग जाती है।

यही हाल अभी नैतिकता का है। यह हमारे देश के हर फील्ड में बंपर सेल पर उपलब्ध है। ऑफिस हो या खेल का मैदान या कहीं जुगाड़-पानी बिठाकर काम कराने की जरूरत, नैतिक लोग बेकार हैं। सो इनकी मार्केट वैल्यू बड़ी डाउन है। नैतिकता पर बंपर सेल का आलम यह है कि यह हर तरफ धक्के खा रही है। पचहत्तर पर्सेंट ऑफ पर भी कोई नैतिकता को लेने को तैयार नहीं है।

एक ऑफिस में एक बेहद ईमानदार अधिकारी हैं, लेकिन वर्षों से मिसफिट। किसी से कहो कि भाई इन्हें ले लो, तो वह कहता है मेरे विभाग से ऐसे दो मुफ्त ले जाओ। यानी नैतिकता मुफ्त में दो मिलें, तो भी महंगी है। अब मैं नैतिकता की दुहाई देने वालों से कहूंगा, भाई साहब, आपके ज्यादा दिन नहीं बचे हैं।


टीवी पर चिल्लाने और नैतिकता पर प्रवचन देने से यह बचने वाली नहीं है। यदि नैतिकता को सेल से बचना ही चाहते हो, तो इससे रोटी पैदा करने का फॉर्मूला ढूंढो। तब नैतिकता को बचाने के लिए भाषण की जरूरत नहीं पड़ेगी।

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