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समझौता और संदेश: किशाऊ बांध पर छह राज्यों में बनी सहमति, उत्तर भारत के जल संकट से निपटने की उम्मीद

Thu, 17 Sep 2026 06:24 AM IST
अमर उजाला Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Thu, 17 Sep 2026 06:24 AM IST
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सार
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किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना से जल बंटवारे को लेकर छह राज्यों के बीच हुआ ऐतिहासिक समझौता उत्तर भारत में जल संकट को दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह देश के दूसरे हिस्सों में लंबित नदी जल विवादों को बातचीत और सहमति के जरिये सुलझाने की प्रेरणा बनेगा।
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किशाऊ बांध से छह राज्यों को फायदा - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना से पानी के बंटवारे को लेकर छह राज्यों के बीच हुआ ऐतिहासिक समझौता उत्तर भारत में जल संकट को हल करने और राज्यों के बीच दशकों पुराने जल विवाद को सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच बनी सहमति से न केवल नदी जल के समन्वित उपयोग की राह खुलेगी, बल्कि सिंचाई, पेयजल और ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में भी व्यापक लाभ की संभावना है। गौरतलब है कि लगभग 86 वर्षों से यह परियोजना फाइलों में अटकी धूल खा रही थी। इस परियोजना की लागत का 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष दस फीसदी खर्च संबंधित राज्य उठाएंगे, जिससे राज्यों पर वित्तीय बोझ कम पड़ेगा। किशाऊ परियोजना की मूल परिकल्पना के अनुसार, टोंस नदी पर बांध बनाकर करीब 97,076 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा और पेयजल तथा औद्योगिक उपयोग के लिए पानी उपलब्ध कराने की योजना है। इस परियोजना से हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को बिजली उत्पादन में भी लाभ मिलेगा। इसमें 660 मेगावाट स्थापित क्षमता और करीब 147.6 करोड़ यूनिट जलविद्युत के उत्पादन का भी प्रावधान है। परियोजना का महत्व केवल पानी व बिजली उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। टोंस यमुना की प्रमुख सहायक नदी है और परियोजना से जल के नियंत्रित प्रवाह के जरिये यमुना के पुनरुद्धार में भी मदद मिलेगी। छह राज्यों के बीच दशकों से लंबित नदी जल विवाद बातचीत और सहमति से आगे बढ़ना इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि देश में नदी जल बंटवारे से जुड़े विवाद अक्सर विकास परियोजनाओं को वर्षों तक प्रभावित करते रहे हैं। हालांकि, इतनी बड़ी परियोजना की सफलता केवल राज्यों के बीच समझौते पर निर्भर नहीं करेगी। इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को भी उतनी ही गंभीरता से देखना होगा। परियोजना से हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में कुल करीब 2,950 हेक्टेयर भूमि के जलमग्न होने तथा हजारों लोगों के पुनर्वास की आशंका है। जाहिर है, जल संकट से निपटने के लिए बड़े जलाशयों और बहुउद्देशीय परियोजनाओं की जरूरत हो सकती है, पर विकास की कीमत प्रभावित समुदायों तथा पर्यावरण को अनदेखा करके नहीं चुकाई जा सकती। ऐसे में, प्रभावित परिवारों के लिए उचित मुआवजा, सम्मानजनक पुनर्वास और आजीविका की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करना परियोजना की स्वीकार्यता के लिए अहम होगा। राज्यों के बीच बनी यह सहमति देश के दूसरे हिस्सों में लंबित नदी जल विवादों को सुलझाने की दिशा में यकीनन मिसाल हो सकती है, लेकिन यह स्थायी महत्व की उपलब्धि बने, इसके लिए परियोजना के सामाजिक व पर्यावरणीय दायित्वों को भी गंभीरता से लेना होगा।
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