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अमेजन वर्षावनों का मौन युद्ध: जंगलों पर कब्जे की लड़ाई, खतरे में धरती का भविष्य

Fri, 24 Jul 2026 07:06 AM IST
Kumar Siddharth कुमार सिद्धार्थ
Updated Fri, 24 Jul 2026 07:06 AM IST
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सार
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अमेजन वर्षावनों में हो रहा अवैध व्यापार, खनन और कॉरपोरेट जगत का लालच मानव सभ्यता के भविष्य, पर्यावरण संतुलन और आदिवासी समुदायों की सुरक्षा पर बड़ा हमला है।
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अमेजन वर्षावन - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

इक्कीसवीं सदी का एक ऐसा युद्ध भी है, जो बिना औपचारिक घोषणा के लगातार जारी है। इसमें न सेनाएं आमने-सामने हैं, न सीमाओं पर गोलाबारी हो रही है और न ही किसी देश ने युद्ध का एलान किया है। फिर भी, इस संघर्ष में हर साल हजारों वर्ग किलोमीटर जंगल खत्म हो रहे हैं, नदियां प्रदूषित हो रही हैं, समुदाय विस्थापित हो रहे हैं और पर्यावरण की रक्षा करने वाले लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। यह युद्ध दक्षिण अमेरिका के अमेजन वर्षावनों में चल रहा है।


अमेजन दुनिया का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय वर्षावन है। वैश्विक स्तर पर ज्ञात जैव विविधता की लगभग 10 प्रतिशत प्रजातियां अमेजन में पाई जाती हैं। करीब 4.7 करोड़ लोग, जिनमें 350 से अधिक आदिवासी समुदाय शामिल हैं, जो इसी पारिस्थितिकी तंत्र पर अपनी आजीविका और संस्कृति के लिए निर्भर हैं। इसलिए, अमेजन का संकट किसी एक देश का नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता का संकट है। ब्राजील के पास्टोरल लैंड कमीशन के अनुसार, हाल के वर्षों में देश में दर्ज ग्रामीण भूमि-संघर्षों में आधे से अधिक मामले अमेजन क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। जंगलों में अवैध खनन, लकड़ी की तस्करी, मादक पदार्थों के नेटवर्क और धन शोधन जैसी गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ती जा रही हैं। नदियां अवैध व्यापार की सुगम राह बन जाती हैं। आदिवासी समुदाय, नदी किनारे रहने वाले परिवार, वन उत्पादों पर निर्भर समाज व पर्यावरण कार्यकर्ता वर्षों से इन क्षेत्रों की रक्षा करते आए हैं। पर, जब जंगल आर्थिक हितों का केंद्र बन जाता है, तो यही समुदाय सबसे पहले निशाने पर आते हैं। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि दुनियाभर में पर्यावरण और भूमि अधिकारों की रक्षा करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए सबसे जोखिम वाले क्षेत्रों में अमेजन शामिल है। वैश्विक बाजारों में पहुंचने वाला गोमांस, सोयाबीन, लकड़ी और खनिजों का एक हिस्सा उन इलाकों से आता है, जहां वनों की कटाई और भूमि संघर्ष जारी हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां इन उत्पादों का व्यापार करती हैं और अंतरराष्ट्रीय निवेश इस प्रक्रिया को गति देता है। यदि बाजार इसी तरह जंगलों के विनाश से लाभ कमाता रहेगा, तो संरक्षण के प्रयास अधूरे रहेंगे।


अमेजन की कहानी भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। अरावली पर्वतमाला में अवैध खनन, छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में कोयला परियोजनाओं संबंधी विवाद, पश्चिमी घाट में विकास और संरक्षण के बीच टकराव तथा हिमालयी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण-ये सभी बताते हैं कि प्राकृतिक संसाधनों पर संघर्ष केवल दक्षिण अमेरिका तक सीमित नहीं है। भारत ने वनाधिकार कानून, ग्राम सभा की भूमिका और जैव विविधता संरक्षण जैसी अनेक प्रगतिशील व्यवस्थाएं विकसित की हैं। पर, इनका प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब स्थानीय समुदायों को विकास प्रक्रिया का वास्तविक भागीदार बनाया जाएगा। आज दुनिया को ऐसे विकास मॉडल की जरूरत है, जिसमें आर्थिक समृद्धि और पारिस्थितिक संतुलन साथ-साथ चल सकें। अन्यथा, अमेजन में दिखाई दे रहा संकट भविष्य में एशिया, अफ्रीका और दुनिया के अन्य वन क्षेत्रों की भी वास्तविकता बन सकता है।

अमेजन का मौन युद्ध हमें याद दिलाता है कि सभ्यता का भविष्य केवल सीमाओं की सुरक्षा से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होगा कि हम अपने जंगलों, नदियों और उन समुदायों की कितनी रक्षा कर पाते हैं, जो सदियों से प्रकृति के सबसे विश्वसनीय संरक्षक रहे हैं।     
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