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हरे पेड़ों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता
Fri, 29 May 2026 07:31 AM IST
Devesh Tripathi
प्रो. तारिक मंसूर
प्रो. तारिक मंसूर
Published by: Devesh Tripathi
Updated Fri, 29 May 2026 07:31 AM IST
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अब बात उठी कि क्या मैं अपनी ही गजलों पर पूछे गए सवाल का जवाब लिखकर एमए करूंगा। फिर, अलग से प्रश्नपत्र तैयार कराकर मेरी परीक्षा ली गई और मैंने टॉप किया। वहीं से मैंने पीएचडी भी की। पढ़ाई के दौरान ही मैं मुशायरों में शिरकत करने लगा था। मुशायरों के दौरान मुझे लोगों का खूब प्यार और सम्मान मिला।
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बशीर बद्र
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
सन 1935 में मेरा जन्म अयोध्या के एक मुस्लिम परिवार में हुआ। बचपन में मेरा नाम सैय्यद मोहम्मद बशीर बद्र था। जब मैं सात साल का था, तभी मैंने अपना पहला ‘शेर’ लिखा था। लिखने के बाद भला कौन नहीं चाहेगा कि उसका लिखा छपे भी। इसलिए, मेरी गहरी इच्छा थी कि मेरे शेर भी किसी पत्रिका में प्रकाशित हों। सबसे पहले मेरे शेर लखनऊ की ‘निगार’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए थे।जब मैं करीब सोलह साल का था, तभी मेरे अब्बा बीमार पड़ गए। नतीजतन, मुझे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी और परिवार चलाने के लिए कमाना शुरू करना पड़ा। हालांकि, पढ़ाई पूरी करने की लगन दिल में थी, सो 1967 में मैंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एमए में दाखिला लिया, पर किस्मत देखिए कि एमए के कोर्स में मेरी ही गजल पाठ्यक्रम में शामिल थी।
अब बात उठी कि क्या मैं अपनी ही गजलों पर पूछे गए सवाल का जवाब लिखकर एमए करूंगा। फिर, अलग से प्रश्नपत्र तैयार कराकर मेरी परीक्षा ली गई और मैंने टॉप किया। वहीं से मैंने पीएचडी भी की। पढ़ाई के दौरान ही मैं मुशायरों में शिरकत करने लगा था। मुशायरों के दौरान मुझे लोगों का खूब प्यार और सम्मान मिला।
मुझे पद्मश्री और उसी साल साहित्य अकादमी सम्मान मिला। पर, जीवन में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं, जब अनहोनी को कोई रोक नहीं सकता। ऐसे ही पलों के लिए मैंने यह गजल लिखी होगी-उदासी का ये पत्थर आंसुओं से नम नहीं होता, हजारों जुगनुओं से भी अंधेरा कम नहीं होता। कभी बरसात में शादाब बेलें सूख जाती हैं, हरे पेड़ों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता।
मेरठ में फैले सांप्रदायिक दंगे में मेरा घर व शायरी वाली डायरी जल गई। कुछ ही दिनों बाद मेरी पत्नी चल बसीं। मुझे गहरा सदमा लगा और मेरा लिखना छूट गया। फिर मैं भोपाल चला गया, जहां मेरी मुलाकात डॉ. राहत से हुई, जो निराशा के उस दौर में मेरे लिए एक सहारा और हमदर्द बनीं। उन्होंने मुझे फिर से लिखने के लिए प्रेरित किया। गहरे दुख और निराशा में तब मैंने एक गजल लिखी-लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में/तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
(बशीर बद्र के एक साक्षात्कार का अंश...)