फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   deo ki diary political satir on india politics and resignations

देव की डायरी: इस्तीफे की दृश्य और अदृश्य प्रदर्शनी

देव प्रकाश चौधरी देव प्रकाश चौधरी
Updated Fri, 24 Jul 2026 04:20 PM IST
सार
Register For Event

इस्तीफा मांगना मूर्त कला ( फिगरेटिव आर्ट)  है। इसमें कलाकार दिखाई देता है। उसका चेहरा दिखाई देता है। उसकी तर्जनी दिखाई देती है। उसका नैतिक आक्रोश दिखाई देता है, लेकिन इस्तीफा देना अमूर्त कला (एब्सट्रैक्ट आर्ट) है। यह आंखों से नहीं दिखाई देता। इसकी अनुभूति कराई जाती है। इसके बारे में बताया जाता है कि यह आने वाला है। इसके संबंध में सूत्र सक्रिय रहते हैं। विशेषज्ञ उसका आकार बताते हैं। जानकार उसके रंग की चर्चा करते हैं।

विज्ञापन
deo ki diary political satir on india politics and resignations
इस्तीफा काल - फोटो : Amarujala.com/AI

विस्तार

पहले आदमी से पूछा जाता था, "क्या करते हैं?" फिर पूछा जाने लगा, "कहां रहते हैं?" अब नया जमाना है। सबसे पहला सवाल होगा, "इस्तीफा दिया कि नहीं?" आदमी का चरित्र, संस्कार, अनुभव, सब बाद में देखे जाएंगे। पहले उसका इस्तीफा देखा जाएगा। जिसने एक बार दिया, वह नौसिखिया माना जाएगा। जिसने कई बार दिया, वह अनुभवी कहलाएगा। 

विज्ञापन


आने वाले समय में बायोडाटा भी बदलेगा। नाम, पता, शिक्षा के बाद एक नया खाना होगा-'अब तक दिए गए इस्तीफे।' उसके नीचे एक और कॉलम होगा, जिसमें किसी एक पर टिक लगाना होगा- स्वीकार हुए, लंबित, विचाराधीन और केवल चर्चा में रहे।
विज्ञापन


इतिहास भी नए सिरे से लिखा जाएगा। पहले लिखा जाता था कि अमुक व्यक्ति ने देश के लिए क्या किया? अब लिखा जाएगा कि उसने कितनी बार इस्तीफा दिया, कितनी बार देने की घोषणा की और कितनी बार देने की इच्छा व्यक्त की।
विज्ञापन
विज्ञापन


धीरे-धीरे वह दिन भी आएगा जब आदमी अपने नाम से नहीं, अपने इस्तीफे से पहचाना जाएगा। कुछ लोग इतने प्रसिद्ध होंगे कि उनका परिचय बस इतना होगा- "अरे, वही... जिनका इस्तीफा पिछले छह महीने से रास्ते में है।" ऐसे लोग लोकतंत्र के वरिष्ठ कलाकार माने जाएंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले वर्षों में ललित कला अकादमी को अपना पाठ्यक्रम बदलना पड़ेगा। मूर्तिकला, चित्रकला, छापाकला, लोककला के साथ एक नया विभाग खोलना ही होगा-इस्तीफा कला।

इस्तीफा कला

कला का विकास समाज के साथ होता है। जिस समाज में जितनी मांग होती है, वहां उतनी ही कला पैदा होती है। इस समय सबसे अधिक मांग जिस वस्तु की है, वह न पानी है, न हवा, न रोजगार। वह है इस्तीफा। इस्तीफा कला के दो विभाग होंगे। पहला- मूर्त। दूसरा-अमूर्त।
 
इस्तीफा मांगना मूर्त कला (फिगरेटिव आर्ट ) है। इसमें कलाकार दिखाई देता है। उसका चेहरा दिखाई देता है। उसकी तर्जनी दिखाई देती है। उसका नैतिक आक्रोश दिखाई देता है। यदि आस-पास कैमरे हों तो उसकी सबसे अच्छी प्रोफाइल भी दिखाई देती है।

कला में दृश्यता का बहुत महत्व है। इस कला का अभ्यास कठिन नहीं है। इसके लिए वर्षों की साधना की आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल इतना पर्याप्त है कि संसार की हर घटना में आपको एक ही समाधान दिखाई दे। फिर चाहे पुल टूटे, पुल बने, धूप निकले, बादल बरसें, रेल रुके या रेल चल पड़े। महान कलाकार हर दृश्य में अपनी कला का अवसर खोज लेता है।
 
अब बात अमूर्त कला यानी एब्सट्रैक्ट आर्ट की। इस्तीफा देना अमूर्त कला है। यह आंखों से नहीं दिखाई देता। इसकी अनुभूति कराई जाती है। इसके बारे में बताया जाता है कि यह आने वाला है। इसके संबंध में सूत्र सक्रिय रहते हैं। विशेषज्ञ उसका आकार बताते हैं। जानकार उसके रंग की चर्चा करते हैं। दर्शक उसकी प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन स्वयं कलाकृति, कला के उच्च सिद्धांतों का पालन करते हुए दृश्य में उपस्थित नहीं होती।

क्रिया नहीं भविष्यकाल है इस्तीफा

अगर गौर से देखें तो सरकारी शब्दकोश में ‘इस्तीफा’ कोई क्रिया नहीं है। वह काल है-भविष्य काल। उसका परिवार बहुत बड़ा है। ‘विचाराधीन’, ‘उचित समय’, ‘जल्द’, ‘शीघ्र’, ‘प्रक्रिया जारी है’, ये सब उसके रिश्तेदार हैं।

कल  मैंने अपने एक मित्र और प्रसिद्ध कला समीक्षक से पूछा, "क्या आपने कभी इस्तीफा देखा है?" उन्होंने मुझे ऐसे देखा, जैसे मैंने किसी चित्रकार से पूछा हो कि उसने कभी इंद्रधनुष का वजन पता किया है?

वह बोले, "आप कला को बहुत सतही ढंग से समझते हैं। आधुनिक कला दिखाई नहीं देती, महसूस की जाती है।"
 मैंने फिर पूछा, "तो क्या इस्तीफा भी आधुनिक कला है?"
उन्होंने जोर देकर कहा, "आधुनिक नहीं, उत्तर आधुनिक, पोस्टमॉडर्न !"
बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए मेरा मन मचलने लगा। मैंने पूछा, "कैसे?"
वह विशेषज्ञ की आवाज में बोले-"क्योंकि वहां कला-कृति से अधिक उसकी चर्चा महत्वपूर्ण होती है।"

मैं चुप हो गया। यह बात सच है कि अब इस्तीफा दिया कम जाता है, उसकी व्याख्या अधिक होती है। उसकी संभावना पर बहस होती है। उसकी अनुपस्थिति पर विमर्श होता है। उसके आने की तिथियां बनती हैं। फिर तिथियों पर पुनर्विचार होता है। ऐसी जटिल कला भारतीय परंपरा में पहले कभी नहीं रही। सोचते-सोचते मुझे लगने लगा कि  कला गैलरियां शीघ्र ही  कहीं ‘इस्तीफा : एक पुनरावलोकन’ नाम से प्रदर्शनी न लगा ले? मेरे दिमाग में प्रदर्शनी की रूपरेखा बनने लगी।

एक कक्ष में मूर्त कला होगी, जहां अनेक कलाकार एक दिशा में उंगली उठाए खड़े होंगेे। दर्शक कहेंगे,"कितनी जीवंत अभिव्यक्ति है!"
दूसरे कक्ष में अमूर्त कला होगी। पूरा हॉल खाली होगा। बीच में केवल एक कुर्सी। सामने एक खाली फ्रेम।
बगल में एक सफेद कागज। नीचे एक पट्टिका पर लिखा होगा-’इस्तीफा’। दर्शक देर तक उस खालीपन को देखते रहेंगे। कुछ लोग कहेंगे, "कुछ दिखाई नहीं दे रहा।"

कला समीक्षक मुस्कुराएगा- "यही तो कलाकार की सफलता है। जो दिखाई नहीं दे रहा, उसी पर पूरा देश बात कर रहा है।"

दर्शक बाहर निकलने ही वाले होंगे कि  गैलरी के अंतिम कक्ष पर नजर पड़ेगी। वहां भी एक कुर्सी रखी मिलेगी। कुर्सी पर कोई नहीं बैठा होगा। फिर भी वह अपनी जगह से हिल नहीं रही होगी। दर्शक समीक्षक से पूछेंगे, "इस कृति का नाम क्या है?"वह बताएंगे, "स्थायित्व।" लोग फिर पूछेंगे, "लेकिन कुर्सी पर कोई बैठा ही नहीं है।"

समीक्षक की हंसी नहीं रुक पाएगी, "यही तो इसकी विशेषता है। यहां आदमी नहीं बैठता, व्यवस्था बैठती है।"

लोग नीचे झुककर देखेंगे। कुर्सी के पायों के पास एक छोटी-सी शीशी रखी मिलेगी। उस पर लिखा होगा- फेविकोल। नीचे एक और पट्टिका लगी होगी-माध्यम : लकडी, लोहा और फेविकोल। दर्शक फिर पूछेंगे, "इसका मतलब?"कला समीक्षक इस बार गहरी सांस लेकर बोलेंगे, "लोकतंत्र में कुर्सियां केवल चुनाव से नहीं टिकतीं। कुछ कला से टिकती हैं, कुछ तर्क से, और कुछ... फेविकोल से।"

इस्तीफा- एक सांस्कृतिक आयोजन

सोचते-सोचते मुझे लगने लगा है कि इस्तीफा अब कागज नहीं रहा। यह एक सांस्कृतिक आयोजन है। कई लोग पूरी जिंदगी इस्तीफा मांगते हुए बूढ़े हो जाते हैं। कई लोग पूरी जिंदगी इस्तीफा न देते हुए अमर हो जाते हैं।

इधर मांगने वाले का गला बैठ जाता है, उधर न देने वाले का गला और खुल जाता है।

कई बार तो लगता है कि हमारे यहां लोकतंत्र का सबसे सुरक्षित पद वह है, जिससे हर घंटे इस्तीफा मांगा जाए और हर घंटे वह न दिया जाए। इससे दोनों पक्षों का रोजगार चलता रहता है। एक मांगता रहता है, दूसरा नहीं देता रहता है।  मांगने वाले कहते हैं, "नैतिकता का तकाजा है, पद छोड़ो!" और न देने वाले वाले सोचते हैं-"अरे, जब नैतिकता ही छोड़ दी, तो पद क्यों छोड़ें?" जनता इन सब के बीच में यह सोचकर खुश रहती है कि कुछ न कुछ चल तो रहा है।

सच कहें तो मुझे तो अब ‘इस्तीफे ’ पर दया आने लगी है। सुबह से शाम तक लोग उसे खोजते रहते हैं। कुछ लोग उसे बुलाते हैं, कुछ लोग उससे बचते हैं।  वह बेचारा एक ऐसा शब्द है, जिसे चैन से शब्दकोश में भी नहीं रहने दे रहे लोग। पिछले कुछ दिनों में मैंने इतनी बार इस्तीफा शब्द सुना है कि कल रात में वह सपने में भी आ गया। मैंने तपाक से पूछा, "तुम रहते कहां हो आजकल ?"

वह बोला, "पहले तो मैं जेब में रहता था। अब टीवी स्टूडियो में रहता हूं।"

नींद खुलने पर मुझे लगा कि अगर यही स्थिति रही तो  एक दिन इस्तीफा खुद एक प्रेस वार्ता करेगा। कहेगा, "भाइयो, मेरी भी कुछ इज्जत है। मुझे रोज-रोज मत घसीटो। जब सचमुच मेरी जरूरत होगी, मैं खुद चला आऊंगा। तब तक मुझे आराम करने दो।"

और मुझे पूरा विश्वास है, उस प्रेस वार्ता के तुरंत बाद खबर चलेगी- "सूत्रों के हवाले से खबर है कि ‘इस्तीफा’ अपने पद से ‘इस्तीफा’ देने वाला है।" यही हमारे समय की सबसे सुरक्षित ‘अधूरी’ खबर होगी, क्योंकि कला में अधूरापन भी महानता की निशानी माना जाता है। इतिहास गवाह है कि हमारे यहां कई इस्तीफे  इसलिए  महान माने गए कि आज तक पूरे ही नहीं हुए।


लोकतंत्र का सौंदर्य भी यही है। इसलिए मैं कहता हीं कि लोकतंत्र का सबसे सफल कलाकार भी वही है, जिसने जनता को दर्शक बना दिया और इस्तीफे को कला।


-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed