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छह महीने के बिल्ले ने निगला 10 सेंटीमीटर लंबा पेन: डॉक्टरों ने एंडोस्कोपी से निकाला, ऐसे बची 'तामा' की जान
Sat, 19 Sep 2026 06:49 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Sat, 19 Sep 2026 06:49 PM IST
छह माह के बिल्ले ने 10 सेंटीमीटर लंबा पेन निगल लिया। डॉक्टरों ने एंडोस्कोपी के जरिए पेन बाहर निकालकर उसकी जान बचाई। अब बिल्ले की हालत स्थिर है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजधानी रायपुर के अवंती विहार स्थित चिकित्सालय में चिकित्सकों ने छह माह के एक नर बिल्ले के पेट से एंडोस्कोपी के माध्यम से 10 सेंटीमीटर लंबा पेन निकालकर उसे नया जीवन प्रदान किया। मात्र दो किलोग्राम वजन वाले इस छोटे बिल्ले ने खेलते समय पूरा पेन निगल लिया था। तीन दिन तक लिक्विड भोजन के सहारे जीवित रहने के बाद एंडोस्कोप की ग्रिप बनाकर पेन को मुंह के रास्ते सुरक्षित बाहर निकाला गया। चिकित्सकों के अनुसार इस समय बिल्ले की स्थिति स्थिर है और उसके जल्द पूरी तरह स्वस्थ होने की उम्मीद है।
बिल्ले के मालिक अभनपुर निवासी मयंक त्रिपाठी ने बताया कि यह लावारिस बिल्ला उन्हें सड़क किनारे मिला था। अपनी मां को खो चुके इस बिल्ले को वे अपने घर ले आए थे और इसका नाम 'तामा' रखा था। जापानी भाषा में तामा शब्द का अर्थ मोती भी होता है। मयंक के अनुसार, तामा उनके सामने ही खेल रहा था। इसी दौरान उसने अचानक आधा पेन अपने मुंह के अंदर डाल दिया। जब मयंक ने उसे निकालने का प्रयास किया, तो बिल्ले ने डर के कारण प्रतिक्रिया में पूरा पेन ही निगल लिया। इसके बाद वे इलाज कराने के लिए जगह-जगह भटकते रहे और अंततः अवंती विहार के चिकित्सालय पहुंचे।
एक्सरे से एंडोस्कोपी की प्रक्रिया
चिकित्सक डॉ. पद्म जैन ने बताया कि मात्र दो किलोग्राम वजन की बिल्ली द्वारा पूरा 10 सेंटीमीटर लंबा पेन निगल लेना चिकित्सकों के लिए भी अविश्वसनीय था। शुरुआत में जब एक्सरे किया गया, तो खाने की नली में केवल मैटेलिक ऑब्जेक्ट यानी धातु दिखाई दे रहा था। पहली नजर में लगा कि शायद यह पेन का केवल सामने वाला हिस्सा यानी ढक्कन है। इसलिए चिकित्सकों ने इसे एंडोस्कोपी के माध्यम से निकालने का निर्णय लिया। हालांकि, बिल्ली की उम्र और वजन को देखते हुए शल्य चिकित्सा (ऑपरेशन) की पूरी तैयारी को बैकअप के रूप में रखा गया था। यदि एंडोस्कोपी सफल नहीं होती तो ऑपरेशन किया जाता। इसके बाद एंडोस्कोप से ग्रिप बनाकर पेन को बाहर निकाला गया।
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कैंसर पीड़ितों के लिए दान की फीस
तीन दिन बाद जाकर बिल्ले को समस्या से राहत मिल सकी। इस दौरान उसके शरीर में श्वेत रक्त कोशिकाओं (डब्ल्यूबीसी) का स्तर बेहद कम हो चुका है। इसे सामान्य बनाए रखने के लिए उसे अस्पताल में नियमित इंजेक्शन दिया जा रहा है। एक विशेष बात यह भी रही कि जैन पर्व पर अस्पताल प्रबंधन ने इलाज की फीस की पूरी राशि खुद न रखकर कैंसर पीड़ितों के लिए काम करने वाली संस्था को दान कर दी। यह राशि मयंक ने सीधे उस संस्था को प्रदान की।
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बिल्ले के मालिक अभनपुर निवासी मयंक त्रिपाठी ने बताया कि यह लावारिस बिल्ला उन्हें सड़क किनारे मिला था। अपनी मां को खो चुके इस बिल्ले को वे अपने घर ले आए थे और इसका नाम 'तामा' रखा था। जापानी भाषा में तामा शब्द का अर्थ मोती भी होता है। मयंक के अनुसार, तामा उनके सामने ही खेल रहा था। इसी दौरान उसने अचानक आधा पेन अपने मुंह के अंदर डाल दिया। जब मयंक ने उसे निकालने का प्रयास किया, तो बिल्ले ने डर के कारण प्रतिक्रिया में पूरा पेन ही निगल लिया। इसके बाद वे इलाज कराने के लिए जगह-जगह भटकते रहे और अंततः अवंती विहार के चिकित्सालय पहुंचे।
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एक्सरे से एंडोस्कोपी की प्रक्रिया
चिकित्सक डॉ. पद्म जैन ने बताया कि मात्र दो किलोग्राम वजन की बिल्ली द्वारा पूरा 10 सेंटीमीटर लंबा पेन निगल लेना चिकित्सकों के लिए भी अविश्वसनीय था। शुरुआत में जब एक्सरे किया गया, तो खाने की नली में केवल मैटेलिक ऑब्जेक्ट यानी धातु दिखाई दे रहा था। पहली नजर में लगा कि शायद यह पेन का केवल सामने वाला हिस्सा यानी ढक्कन है। इसलिए चिकित्सकों ने इसे एंडोस्कोपी के माध्यम से निकालने का निर्णय लिया। हालांकि, बिल्ली की उम्र और वजन को देखते हुए शल्य चिकित्सा (ऑपरेशन) की पूरी तैयारी को बैकअप के रूप में रखा गया था। यदि एंडोस्कोपी सफल नहीं होती तो ऑपरेशन किया जाता। इसके बाद एंडोस्कोप से ग्रिप बनाकर पेन को बाहर निकाला गया।
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कैंसर पीड़ितों के लिए दान की फीस
तीन दिन बाद जाकर बिल्ले को समस्या से राहत मिल सकी। इस दौरान उसके शरीर में श्वेत रक्त कोशिकाओं (डब्ल्यूबीसी) का स्तर बेहद कम हो चुका है। इसे सामान्य बनाए रखने के लिए उसे अस्पताल में नियमित इंजेक्शन दिया जा रहा है। एक विशेष बात यह भी रही कि जैन पर्व पर अस्पताल प्रबंधन ने इलाज की फीस की पूरी राशि खुद न रखकर कैंसर पीड़ितों के लिए काम करने वाली संस्था को दान कर दी। यह राशि मयंक ने सीधे उस संस्था को प्रदान की।