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ब्रिक्स का न्यू डेवलपमेंट बैंक: आईएमएफ व वर्ल्ड बैंक के मुकाबले कितना कारगर एनडीबी? जानिए भारत से क्या कनेक्शन

Sun, 13 Sep 2026 06:47 AM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Sun, 13 Sep 2026 06:47 AM IST
सार
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साल 2012 के नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में उठे 'ब्रिक्स बैंक' के विचार से लेकर न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) के 14 साल के सफर का विस्तृत विश्लेषण। भारत में 10 अरब डॉलर के पोर्टफोलियो, नमो भारत (आरआरटीएस), मेट्रो प्रोजेक्ट्स, और वर्ल्ड बैंक व आईएमएफ से तुलना पर पढ़ें यह विशेष रिपोर्ट।

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BRICS NDB Explainer: How a 2012 Delhi Idea Evolved into a 100B dollar Global Lender Shaping a Multipolar Order
Brics 2026 - फोटो : amarujala.com

विस्तार

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर स्थित ब्रेटन वुड्स सम्मेलन से जन्मी दो वित्तीय संस्थाओं- वर्ल्ड बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ)- ने दशकों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था और विकासशील देशों के बुनियादी ढांचे की फंडिंग पर एकछत्र राज किया। हालांकि, 21वीं सदी के दूसरे दशक में वैश्विक आर्थिक संतुलन तेजी से पश्चिम से पूर्व और ग्लोबल साउथ की ओर खिसकने लगा। 

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इसी ऐतिहासिक बदलाव के साथ साल 2012 में भारत की नई दिल्ली में आयोजित चौथे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने पहली बार विकास परियोजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए एक नए 'डेवलपमेंट बैंक' की संभावना पर औपचारिक चर्चा की थी। वह विचार आज न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी एनडीबी के रूप में मूर्त रूप ले चुका है। स्थापना के 14 वर्षों बाद, जब ब्रिक्स समूह अपनी 20वीं वर्षगांठ (स्थापना 2006) के करीब पहुंच रहा है, तब यह सवाल बेहद प्रासंगिक हो जाता है कि नई दिल्ली में बोया गया यह विचार आज दुनिया में कितना ताकतवर बन चुका है, इसने विकासशील देशों की बुनियादी जरूरतों को कितना बदला है और क्या यह वास्तव में यह पश्चिम के बहुपक्षीय बैंकों का एक ठोस विकल्प बन पाया है।

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साल 2012 से लेकर आज तक एनडीबी का 14 साल का सफर कैसा रहा?

न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) की स्थापना की कहानी केवल एक बैंक के बनने की नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय शासन में बहुध्रुवीयता लाने की एक दूरदर्शी पहल थी। साल 2012 के नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की ओर से रखे गए प्रस्ताव के बाद, पांचों संस्थापक देशों- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका- ने 2013 के डरबन सम्मेलन में इसकी व्यवहार्यता पर सहमति जताई। इसके बाद 2014 में ब्राजील के फोर्टालेजा में आयोजित छठे ब्रिक्स सम्मेलन में 'एनडीबी समझौते' पर औपचारिक हस्ताक्षर किए गए।

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वर्ष 2015 में इस बैंक ने कानूनी संस्था के रूप में कार्य करना शुरू किया और इसका मुख्यालय चीन के शंघाई में स्थापित किया गया। भारत के दिग्गज बैंकर केवी कामथ को एनडीबी का पहला अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जिन्होंने इसके शुरुआती संस्थागत ढांचे को आकार दिया।

एनडीबी का वित्तीय व ढांचा कैसा है?

  • अधिकृत पूंजी (ऑथराइज्ड कैपिटल): बैंक की शुरुआती अधिकृत पूंजी 100 अरब डॉलर तय की गई।
  • सदस्यता पूंजी (सब्सक्राइब्ड कैपिटल): इसकी शुरुआती चुकता व सब्सक्राइब की गई पूंजी 50 अरब डॉलर थी, जिसे पांचों संस्थापक सदस्यों में पूरी तरह से बराबर-बराबर (10 अरब डॉलर प्रत्येक) बांटा गया।
  • समान मताधिकार: विश्व बैंक और आईएमएफ के विपरीत, जहां अमेरिका और यूरोपीय देशों के पास कोटा प्रणाली के जरिए एकतरफा वीटो पावर और प्रभुत्व है, एनडीबी में प्रत्येक संस्थापक सदस्य देश का समान वोटिंग शेयर (20-20 प्रतिशत) है और किसी भी एक देश के पास वीटो अधिकार नहीं है।
  • वैश्विक विस्तार: वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि अपनी स्थापना से लेकर अब तक एनडीबी ने सदस्य देशों में स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, शहरी विकास और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 42.9 अरब डॉलर से अधिक की वित्तीय सहायता और 139 से अधिक वृहद परियोजनाओं को मंजूरी दी है।

BRICS NDB Explainer: How a 2012 Delhi Idea Evolved into a 100B dollar Global Lender Shaping a Multipolar Order
कहानी ब्रिक्स के एनडीबी की। - फोटो : amarujala.com

भारत में एनडीबी का 10 अरब डॉलर कहां-कहां लगा है और इसका जमीनी असर क्या है?

एनडीबी के वैश्विक पोर्टफोलियो में भारत सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक रहा है। एनडीबी के आधिकारिक आंकड़ों और हालिया रिपोर्टों के अनुसार, बैंक के कुल स्वीकृत ऋण पोर्टफोलियो का लगभग 27.5 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत को मिला है, जो किसी भी सदस्य देश में सबसे अधिक है। भारत में एनडीबी ने अब तक 28 से अधिक प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए लगभग 10 अरब डॉलर (USD 10 Billion) के कर्ज को मंजूरी दी है। इन वित्तीय संसाधनों का उपयोग भारत के शहरी, ग्रामीण, परिवहन और सामाजिक ढांचे को आधुनिक बनाने में किया गया है:

1. शहरी परिवहन व आधुनिक मेट्रो नेटवर्क

  • दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ आरआरटीएस (नमो भारत): दिल्ली-एनसीआर में भारत की पहली क्षेत्रीय रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (RRTS) परियोजना में एनडीबी ने बड़े पैमाने पर फंडिंग की है, जिससे रोजाना लाखों यात्रियों के लिए तीव्र और प्रदूषण-मुक्त आवाजाही संभव हो रही है।
  • मेट्रो रेल परियोजनाएं: चेन्नई मेट्रो चरण-2, इंदौर मेट्रो रेल परियोजना और मुंबई मेट्रो के बुनियादी ढांचे के विस्तार में एनडीबी के कर्ज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

2. सड़कें, पुल और ग्रामीण कनेक्टिविटी
भारत के विभिन्न राज्यों- विशेष रूप से मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों- में हजारों किलोमीटर लंबी ग्रामीण और राज्य स्तरीय सड़कों व पुलों के निर्माण के लिए एनडीबी ने वित्तीय मदद दी है, जिससे दूरदराज के क्षेत्र मुख्यधारा से जुड़ सके हैं।

3. स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण
भारत के महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय सौर मिशन और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के साथ-साथ जल आपूर्ति और सीवेज प्रबंधन (जैसे राजस्थान के अमृत शहरों में जल आपूर्ति परियोजनाएं) में एनडीबी की पूंजी लगी है। एनडीबी द्वारा वित्तपोषित परियोजनाओं से भारत में हजारों मेगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता स्थापित हुई है।

4. आपातकालीन सहायता और स्वास्थ्य ढांचा
वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान, एनडीबी ने 'फास्ट-ट्रैक इमरजेंसी असिस्टेंस प्रोग्राम' के तहत भारत को अरब डॉलर की त्वरित वित्तीय सहायता प्रदान की थी। इस राशि का उपयोग गरीब व वंचित वर्गों को सामाजिक सुरक्षा देने, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और लॉकडाउन के बाद आर्थिक रिकवरी को गति देने में किया गया।

हाल ही में अप्रैल 2025 में, मुंबई में एनडीबी और भारत के शीर्ष विकास वित्तीय संस्थान नेबफिड (NaBFID- नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट के बीच एक रणनीतिक समझौता (एमओयू) हुआ है। इस समझौते के तहत भारत में नए ग्रीन एनर्जी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्बन कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स के लिए मिलकर फंडिंग करने का रोडमैप तैयार किया गया है।

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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

क्या एनडीबी वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ जैसी पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं का विकल्प बन पाया है?

यह प्रश्न एनडीबी के अस्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण आयाम है। क्या शंघाई स्थित यह बैंक वास्तव में वाशिंगटन स्थित ब्रेटन वुड्स संस्थाओं (वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ) को चुनौती दे पा रहा है? गौर से देखें तो एनडीबी ने पूरी तरह से पश्चिमी संस्थाओं का स्थान नहीं लिया है, बल्कि इसने विकासशील देशों को एक समानांतर, अधिक सम्मानजनक और लचीला विकल्प प्रदान किया है।

एनडीबी की पूर्व अध्यक्ष और ब्राजील की पूर्व राष्ट्रपति दिलमा रूसेफ के अनुसार, एनडीबी का उद्देश्य ब्रेटन वुड्स प्रणाली को नष्ट करना या डॉलर को रातों-रात खत्म करना नहीं है, बल्कि एक बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय वित्तीय ढांचा तैयार करना है, जहां विकासशील देशों को किसी एक मुद्रा या संस्था के सामने घुटने न टेकने पड़ें।

'डी-डॉलरेशन' और लोकल करेंसी फाइनेंसिंग का क्या है पूरा गणित?

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में जब भी अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाता है, तब विकासशील देशों की मुद्राओं का मूल्य गिर जाता है और उनका डॉलर-मूल्यवर्ग वाला कर्ज अचानक बहुत महंगा हो जाता है। इसे दूर करने के लिए एनडीबी ने स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण को अपनी मुख्य रणनीति बनाया है।

रुपया बॉन्ड और भारतीय बाजार का रोडमैप

हाल ही में एनडीबी की अध्यक्ष दिलमा रूसेफ ने संकेत दिया है कि बैंक की नई सामान्य रणनीति (2027-2031) के तहत भारत के लिए अगले 5 वर्षों में 7.5 अरब डॉलर की फंडिंग का खाका तैयार किया जा रहा है। इसमें 5 अरब डॉलर का संप्रभु ऋण शामिल होगा, जबकि 2.5 अरब डॉलर के बराबर का 'रुपया बॉन्ड कार्यक्रम' शुरू किया जाएगा।

एनडीबी भारतीय घरेलू पूंजी बाजार से रुपये में धन जुटाएगा और भारतीय परियोजनाओं को रुपये में ही कर्ज देगा। इससे भारतीय उधारकर्ताओं पर विनिमय दर का जोखिम पूरी तरह खत्म हो जाएगा। इसी तरह, एनडीबी चीन में रेनमिनबी (पांडा बॉन्ड्स) और दक्षिण अफ्रीका में रैंड (बॉन्ड्स) जारी कर स्थानीय मुद्राओं में कर्ज बांट रहा है। एनडीबी का लक्ष्य है कि उसकी कुल लेंडिंग का कम से कम 30 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय मुद्राओं में हो।

BRICS NDB Explainer: How a 2012 Delhi Idea Evolved into a 100B dollar Global Lender Shaping a Multipolar Order
ब्रिक्स सम्मेलन 2026। - फोटो : अमर उजाला

भू-राजनीतिक तनावों के बीच एनडीबी के सामने क्या हैं चुनौतियां?

14 साल के इस सफल सफर के बावजूद, न्यू डेवलपमेंट बैंक के सामने भविष्य की कई जटिल भू-राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियां भी खड़ी हैं:

  1. रूस-यूक्रेन संघर्ष और प्रतिबंध: संस्थापक सदस्य रूस पर लगे पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों के कारण एनडीबी को अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड बाजारों से सस्ता धन जुटाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा। वैश्विक रेटिंग एजेंसियों (जैसे फिच और एसएंडपी) द्वारा रूस से जुड़े जोखिमों के कारण बैंक की क्रेडिट रेटिंग पर दबाव देखा गया, हालांकि बैंक ने अपनी एए+ रेटिंग को कायम रखा है।
  2. सदस्यता का विस्तार: एनडीबी ने ब्रिक्स के मूल 5 देशों से आगे बढ़कर नए सदस्यों को जोड़ना शुरू किया है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), मिस्र, बांग्लादेश, अल्जीरिया और उरुग्वे को बैंक के नए सदस्यों के रूप में शामिल किया गया है। नए देशों के जुड़ने से बैंक की पूंजी का आधार तो बढ़ा है, लेकिन विभिन्न देशों के परस्पर विरोधी राजनीतिक हितों को संतुलित करना एक चुनौती है।
  3. भारत-चीन के बीच संतुलन: एनडीबी का मुख्यालय शंघाई में है और चीन की आर्थिक शक्ति बहुत बड़ी है। ऐसे में बैंक के भीतर चीनी प्रभाव को नियंत्रित रखते हुए भारत, ब्राजील और अन्य सदस्यों के समान अधिकारों व हितों की रक्षा करना बैंक के गवर्नेंस मॉडल की सबसे बड़ी परीक्षा है।

साल 2012 के नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में जब भारत ने एक नए विकास बैंक का विचार रखा था, तब पश्चिमी मीडिया और अर्थशास्त्रियों ने इसे केवल एक राजनीतिक बयानबाजी करार दिया था। लेकिन 14 साल बाद, 100 डॉलर अरब की अधिकृत पूंजी, 42.9 अरब डॉलर से अधिक के स्वीकृत प्रोजेक्ट्स और भारत में 10 अरब डॉलर के जमीनी बुनियादी ढांचे के साथ एनडीबी ने खुद को ग्लोबल साउथ की रीढ़ साबित कर दिखाया है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में दिल्ली-मेरठ आरआरटीएस ट्रेन हो, प्रमुख शहरों में दौड़ती मेट्रो रेल हो, या ग्रामीण इलाकों में सड़कों और स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति हो- एनडीबी की पूंजी का सकारात्मक असर सीधे आम नागरिकों के जीवन पर पड़ता है। हालांकि, आईएमएफ या वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं के पूर्ण विकल्प के रूप में स्थापित होने के लिए एनडीबी को अपनी लोकल करेंसी लेंडिंग को और अधिक बढ़ाना होगा, निजी पूंजी को आकर्षित करना होगा और भू-राजनीतिक खिंचाव से मुक्त रहकर काम करना होगा। 2026 के इस दौर में, एनडीबी निस्संदेह एक अधिक न्यायसंगत और बहुध्रुवीय वैश्विक अर्थव्यवस्था का मजबूत प्रतीक बन चुका है।

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