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Delhi Pollution: दिल्ली में ग्रैप-4 के तहत सख्ती, लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या पीयूसी जांच वाकई कारगर है?

Tue, 23 Dec 2025 07:24 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Tue, 23 Dec 2025 07:24 PM IST
सार
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दिल्ली में हवा के गंभीर प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। इसलिए सरकार ने ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) के सख्त स्टेज-4 के तहत गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण पर सख्ती की है। लेकिन क्या अभी के प्रदूषण जांच वाकई असरदार है?

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Delhi Enforces GRAP-IV to Curb Vehicle Pollution, But Are PUC Emission Tests Truly Effective
Pollution Certificate - फोटो : AI

विस्तार

दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच सरकार ने ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) (ग्रैप) के स्टेज-IV के तहत वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर शिकंजा कस दिया है। सख्त निगरानी के चलते बीते दिनों में प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र यानी PUC (पीयूसी) को लेकर अभूतपूर्व हलचल देखने को मिली है। पर्यावरण मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा के अनुसार, GRAP-IV (ग्रैप-4) लागू होने के बाद अब तक 10,000 से ज्यादा वाहन उत्सर्जन जांच में फेल पाए गए हैं। जबकि दो लाख से अधिक वाहनों को पीयूसी प्रमाणपत्र जारी किए जा चुके हैं।
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'नो PUC, नो फ्यूल' नियम से बढ़ी जांच
सरकार द्वारा "नो पीयूसी, नो फ्यूल" नियम को सख्ती से लागू किए जाने के बाद पीयूसी जांच की संख्या में तेज उछाल आया है। इस नियम के तहत वैध पीयूसी प्रमाणपत्र के बिना पेट्रोल या डीजल नहीं दिया जा रहा है। मंत्री ने बताया कि इसी वजह से बड़ी संख्या में वाहन मालिक जांच केंद्रों पर पहुंचे हैं। बढ़ते दबाव को देखते हुए सरकार सभी पीयूसी केंद्रों को उच्च क्षमता वाली जांच मशीनों से अपग्रेड कर रही है। ताकि लंबी कतारों को कम किया जा सके और जांच की सटीकता बेहतर हो।

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Delhi Enforces GRAP-IV to Curb Vehicle Pollution, But Are PUC Emission Tests Truly Effective
Pollution Certificate - फोटो : AI
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए थर्ड-पार्टी जांच की तैयारी
उत्सर्जन जांच की विश्वसनीयता पर उठते सवालों के बीच सरकार एक थर्ड-पार्टी इंस्पेक्शन सिस्टम लाने की तैयारी कर रही है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि पीयूसी प्रमाणपत्र सही और पारदर्शी तरीके से जारी हों, न कि सिर्फ औपचारिकता के तौर पर।

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क्या मौजूदा PUC टेस्ट असल प्रदूषण दिखाते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा PUC जांच प्रणाली में कई खामियां हैं। फिलहाल अधिकतर परीक्षण 'आइडल टेस्टिंग' पर आधारित होते हैं, जिसमें इंजन के कम गति पर चलने के दौरान कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन जैसे प्रदूषकों को मापा जाता है। डीजल वाहनों में स्मोक डेंसिटी टेस्ट और पेट्रोल वाहनों में लैम्ब्डा टेस्ट किया जाता है। लेकिन ये परीक्षण वास्तविक ड्राइविंग स्थितियों को सही ढंग से नहीं दर्शाते, जहां तेज रफ्तार और एक्सेलेरेशन के दौरान प्रदूषण कहीं ज्यादा होता है।

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वास्तविक ड्राइविंग कंडीशन को शामिल करने की जरूरत
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के पर्यावरण विज्ञान विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि उत्सर्जन जांच केवल आइडल कंडीशन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनके अनुसार, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, PM2.5 और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड जैसे खतरनाक प्रदूषक तेज रफ्तार या एक्सेलेरेशन के दौरान अधिक निकलते हैं। लेकिन पीयूसी जांच में इन्हें शामिल नहीं किया जाता। उन्होंने यह भी कहा कि किसी वाहन को सड़क पर चलने की अनुमति देने या हटाने का फैसला केवल उसकी उम्र के आधार पर नहीं। बल्कि माइलेज, मेंटेनेंस हिस्ट्री और समग्र उत्सर्जन प्रदर्शन को देखकर होना चाहिए।

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Delhi Enforces GRAP-IV to Curb Vehicle Pollution, But Are PUC Emission Tests Truly Effective
Delhi Pollution - फोटो : अमर उजाला
BS-VI वाहनों के लिए भी स्पष्ट मानक नहीं
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि BS-VI वाहनों के लिए उत्सर्जन जांच के स्पष्ट और एकरूप मानक अभी तय नहीं हैं। अलग-अलग भारत स्टेज के लिए नियमों में असमानता है, जिससे जांच प्रक्रिया और भी कमजोर हो जाती है। 

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दिल्ली के प्रदूषण में वाहनों की बड़ी भूमिका
रिपोर्ट के मुताबिक, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि, दिल्ली में वाहनों से निकलने वाला प्रदूषण बड़े स्रोतों में से एक है और इसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ता है। खास बात यह है कि वाहन प्रदूषण सांस लेने की ऊंचाई पर होता है, जिससे PM2.5 जैसे कण और ज्यादा खतरनाक साबित होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल पीयूसी जांच से काम नहीं चलेगा। बल्कि रिमोट सेंसिंग जैसी आधुनिक निगरानी तकनीकों को अपनाने की जरूरत है।

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PUC केंद्रों पर पुरानी समस्याएं अब भी बरकरार
पीयूसी केंद्रों की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में रही है। पहले हुए ऑडिट में सामने आया था कि कई जगहों पर बिना सही जांच के ही प्रमाणपत्र जारी कर दिए जाते थे। कहीं मशीनें काम नहीं करती थीं तो कहीं सिर्फ प्रिंटर मौजूद थे। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक केंद्रों पर प्रशिक्षित स्टाफ, मानक उपकरण और सख्त निगरानी सुनिश्चित नहीं की जाती। तब तक पीयूसी प्रणाली दिल्ली की हवा को सच में साफ करने में सक्षम नहीं हो पाएगी।  



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