इस्कंदर मिर्जा की अंतिम यात्रा
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क्योंकि इस्कंदर मिर्जा मूलरूप से फौजी थे और आगे चलकर नौकरशाह बने इसलिए उन्हें इन्हीं दोनों पर भरोसा भी था। उनका यह भरोसा आगे चलकर उनके लिए घातक भी साबित हुआ। दरअसल पाकिस्तानी फौज में एक बेहद नकारा किस्म का अफसर था, जिसका नाम अयूब खान था। वही अयूब खान जिसने खुद को फौजी तानाशाह घोषित किया था।
अयूब खान को फौज में कायर कहा जाता था। ऐसा इसलिए क्योंकि जब वो ब्रिटिश सेना में था, तब बर्मा भेजा गया था। वहां डरपोकपन और कायरता के चलते उसे निलंबित कर दिया गया था। मिर्जा को ये बातें मालूम थीं, फिर भी वो अयूब की काबिलियत पर काफी भरोसा करते थे।
वो अयूब को लगातार मजबूत बनाते रहे। हालांकि अयूब खान को मोहम्मद अली जिन्ना पसंद नहीं करते थे। खुद जिन्ना ने उनका कोर्ट मार्शल करने का आदेश दिया था। लेकिन इस्कंदर मिर्जा ने उसे बचा लिया था। बचते-बचते अयूब इतना ज्यादा ताकतवर हो गया कि जनवरी 1951 से अक्तूबर 1958 के बीच पाकिस्तान में सात प्रधानमंत्री आए और गए। लेकिन अयूब खान सेना प्रमुख की कुर्सी पर बना रहा।
अयूब खान को जनवरी 1955 में ही सेना प्रमुख के पद से रिटायर होना था, क्योंकि बतौर सेनाध्यक्ष उसे चार साल पूरे हो चुके थे। लेकिन इस्कंदर मिर्जा ने उसका कार्यकाल बढ़वाया। मिर्जा उस समय तक रक्षा सचिव थे और तत्कालीन प्रधानमंत्री मुहम्मद अली बोगरा से अयूब का कार्यकाल बढ़ाने को कहा। बोगरा नहीं माने तो मिर्जा ने अपने पद से इस्तीफा देने की बात कह दी थी। मजबूरन प्रधानमंत्री ने अयूब को सेवा विस्तार दिया लेकिन मिर्जा को सावधान भी किया। उन्होंने इस्कंदर से कहा था कि वो अयूब पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करके गलती कर रहे हैं और इसके लिए वो पछताएंगे।
सैन्य शासक का बीज
1953 में पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम ने प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया था। नजीमुद्दीन के बाद मुहम्मद अली बोगरा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने। इससे पहले वो अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत थे। उन्हें गवर्नर जनरल गुलाम ने पाकिस्तान बुलाया और प्रधानमंत्री बनाया था। कुछ महीनों के बाद बोगरा और गवर्नर जनरल गुलाम मुहम्मद के बीच मतभेद शुरू हो गए थे।
गवर्नर जनरल गुलाम मुहम्मद, बोगरा को प्रधानमंत्री पद से हटाना चाहते थे। लेकिन बोगरा पद से हटने को तैयार ही नहीं हो रहे थे। कुछ समय बाद 1956 में गुलाम मुहम्मद अपने इलाज के लिए इंग्लैंड गए और इस्कंदर मिर्जा को गवर्नर जनरल बनाया गया। मिर्जा ने पद पर आते ही बोगरा को प्रधानमंत्री के पद से हटा दिया और चौधरी मोहम्मद अली को प्रधानमंत्री बना दिया।
1956 में ही मिर्जा ने पाकिस्तान में गवर्नर जनरल के पद को खत्म कर दिया गया और राष्ट्रपति पद बनाकर खुद पहले राष्ट्रपति बने। मिर्जा और मुहम्मद अली के बीच भी रिश्ते ठीक नहीं रहे। अली को इस्तीफा देना पड़ा था। वो एक साल एक महीने तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे। मुहम्मद अली के बाद हुसैन शाहिद सुहरावर्दी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, लेकिन राष्ट्रपति के साथ मतभेद के वजह से ज्यादा दिन इस पद पर नहीं रह पाए। एक साल में ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था।
17 अक्तूबर 1957 को पाकिस्तान मुस्लिम लीग के इब्राहिम इस्माइल चुंदरिगर को प्रधानमंत्री बनाया गया। वो सिर्फ दो महीने ही इस पद पर रहे। 16 दिसंबर 1957 को फिरोज खान नून को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्हें भी करीब एक साल के बाद राष्ट्रपति मिर्जा ने पद से हटा दिया।
और फिर...
7 अक्तूबर 1958 राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने पाकिस्तान में सैनिक शासन लागू कर दिया। इसके साथ ही जनरल अयूब खान को पाकिस्तान सेना का कमांडर इन चीफ और मुख्य सैनिक शासक बनाया गया। 1956 में लागू हुआ संविधान भी रद्द कर दिया गया। यह तय हुआ कि मिर्जा राष्ट्रपति बने रहेंगे और अयूब सेना और बाकी व्यवस्थाएं संभालेंगे। मिर्जा ने सभी राजनैतिक दलों पर बैन लगा दिया था। फिर आई 27 अक्तूबर की तारीख, अयूब खान ने मिर्जा को गिरफ्तार किया और देश से निष्कासित करते हुए ब्रिटेन भेज दिया।
पाकिस्तान में इस्कंदर मिर्जा की जितनी जायदाद थी, वो सब अयूब ने अपने कब्जे में ले ली। लंदन में मिर्जा के दिन फकीरी में गुजरे। राष्ट्रपति के रूप में अपने शासन काल मे कई प्रधानमंत्रियों का इस्तीफा लेने वाले मिर्जा खुद देश से बाहर हो गए और 12 नवंबर 1969 को लंदन में उनकी मौत हो गई। मरने के बाद उनके मृत शरीर को पाकिस्तान ने दफनाने की इजाजत नहीं दी गई। तब मिर्जा के पुराने दोस्त और ईरान के शाह ने हवाई जहाज से उनकी लाश ईरान मंगवाई और वहां राजकीय सम्मान के साथ मिर्जा को दफनाया गया।