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एफिल टॉवर बंद और स्कूल भी ठप: फ्रांस में सड़कों पर प्रदर्शन जारी; मैक्रों सरकार के खिलाफ क्यों भड़की जनता?

Thu, 05 Nov 2026 08:57 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, पेरिस।

सार

फ्रांस में महंगाई और वेतन वृद्धि की मांग को लेकर ट्रेड यूनियनों और छात्रों ने देशव्यापी हड़ताल कर दी है, जिससे जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। पेरिस समेत कई बड़े शहरों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तीखी झड़पें हुईं, जबकि सार्वजनिक परिवहन और स्कूल-कॉलेज बंद रहे। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार के खिलाफ यह जबरदस्त गुस्सा ऐसे समय में फूटा है जब देश में अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का माहौल गरमाया हुआ है।
 
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फ्रांस में प्रदर्शन। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पेरिस से लेकर मार्सिले तक, पूरे फ्रांस में इस वक्त हालात बेहद सुलगते हुए नजर आ रहे हैं। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार के खिलाफ देश के तमाम बड़े मजदूर संघ और छात्र सड़क पर उतर आए हैं। महंगाई, कम वेतन और आर्थिक अनिश्चितता से परेशान लोग खुलकर सरकार के खिलाफ हल्ला बोल रहे हैं। पेरिस और लियोन जैसे प्रमुख शहरों में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर मार्च कर रहे हैं।
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फ्रांस में छह लाख से अधिक लोग सड़कों पर उतरे
फ्रांस में वेतन बढ़ाने और स्कूलों के लिए अधिक धनराशि देने की मांग को लेकर गुरुवार को छह लाख से अधिक लोगों ने प्रदर्शन किया। देश के कई शहरों में हड़ताल और रैलियां आयोजित की गईं। फ्रांस के गृह मंत्रालय ने बताया कि प्रदर्शनों में शामिल लोगों की संख्या 6 लाख से अधिक रही। हालांकि, यह आंकड़ा शुरुआती है। पेरिस के अलावा लियोन और मार्सेई जैसे बड़े शहरों में भी बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों ने कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोतरी और शिक्षा व्यवस्था के लिए अधिक बजट उपलब्ध कराने की मांग की।

बवाल की वजह क्या?
इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल का सबसे बुरा असर देश की आम जिंदगी और सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ा है। फ्रांस के एक-तिहाई हाई स्कूल या तो पूरी तरह बंद हैं या छात्रों के कड़े विरोध प्रदर्शन और शिक्षकों की हड़ताल के कारण कामकाज ठप है। पेरिस का ऐतिहासिक एफिल टॉवर भी इस हड़ताल की वजह से पर्यटकों के लिए पूरी तरह बंद रहा। प्रदर्शनकारियों की भीड़ में कुछ उपद्रवियों के शामिल होने से लियोन, नेंट्स और टूलूज़ जैसे शहरों में पुलिस के साथ हिंसक झड़पें हुईं। सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए प्रशासन को बख्तरबंद गाड़ियों, ड्रोन्स और हेलीकॉप्टरों के साथ करीब 70,000 पुलिसकर्मियों को तैनात करना पड़ा है।
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मंदी के मुहाने पर खड़ा देश और आसमान छूती महंगाई
ट्रेड यूनियनों का साफ तौर पर कहना है कि फ्रांस इस वक्त आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ा है और कंपनियों में छंटनी के प्लान लगातार बढ़ते जा रहे हैं। देश में खाने-पीने की चीजें, ईंधन, गैस, बिजली और किराए के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन आम जनता के वेतन और पेंशन में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है। फ्रांस भारी कर्ज के बोझ तले दबा है और यूरोप के सबसे कमजोर आर्थिक प्रदर्शन वाले देशों में शुमार हो रहा है। रेलवे और अन्य सेक्टरों के कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि जब तक सरकार और अधिकारी उनकी मांगें नहीं मानते, तब तक देश में यह आंदोलन और हड़ताल का दौर जारी रहेगा।

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राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मियों के बीच गहराता संकट
यह पूरा विरोध प्रदर्शन ऐसे वक्त में हो रहा है जब देश में अगले साल मई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का सियासी पारा चढ़ चुका है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सांविधानिक रूप से लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ने के योग्य नहीं हैं, और धुर दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन इस रेस में सबसे आगे चल रही हैं। विपक्षी राजनीतिक पार्टियां इस सुलगते जनआक्रोश को भुनाने का पूरा प्रयास कर रही हैं। सितंबर महीने में पेरिस के एक हाई स्कूल से स्टाफ की कमी को लेकर शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन अब देशव्यापी शक्ल ले चुका है, जिसमें छात्र बेहतर शिक्षा फंडिंग और मजदूर बेहतर वेतन की मांग कर रहे हैं।

बुरी तरह चरमरा गईं आवश्यक सेवाएं 
शिक्षा मंत्रालय के अनुसार लगभग 16% शिक्षक हड़ताल पर रहे। करीब 1,000 हाई स्कूलों में कक्षाएं निलंबित रहीं और कई जगह छात्रों ने ब्लॉकेड (तालाबंदी) किया। nटूलूस के पास एक स्कूल में प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों द्वारा आग लगाने का मामला सामने आया, जिसके बाद स्कूल को आनन-फानन में खाली कराया गया। 
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फ्रांस के राजनीतिक इतिहास में सरकार और यूनियनों के बीच खींचतान कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार का गुस्सा काफी गहरा है। सरकार पिछले कुछ हफ्तों से बड़े पैमाने पर हो रहे असंतोष को थामने के लिए यूनियनों के साथ लगातार बातचीत की कोशिश कर रही थी, जिससे सड़कों पर जारी अशांति को सीमित किया जा सके। इसके बावजूद हालात काफी संवेदनशील बने हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार के ढुलमुल रवैये से जनता के भीतर जबरदस्त झुंझलाहट है, और राष्ट्रपति चुनाव के बाद सत्ता में आने वाले नए नेतृत्व के सामने भी इन विशाल आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को हल करने की बहुत बड़ी चुनौती होगी।
 
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