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एक्सप्लेनर: जलविद्युत परियोजना के कर्मी सुरंग में 9 दिन कैसे रहे जिंदा, नेपाल में बचाव अभियान में क्या बदला?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 05 Sep 2026 11:25 AM IST

सार

नेपाल के त्रिशूली 3ए प्रोजेक्ट टनल में 9 दिन फंसे रहने के बाद दो कर्मचारी जिंदा कैसे बचे? जानिए 'गोल्डीलॉक्स जोन', पाइप से ऑक्सीजन और इस पूरे बचाव अभियान की रणनीति।
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नेपाल में बनी सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने की नई रणनीति। - फोटो : अमर उजाला
नेपाल में हिमालय की ऊंची पहाड़ियों से आए एक सैलाब का असर बीते नौ दिन से लगातार यहां रहने वालों के लिए एक बुरा सपना बना हुआ है। दरअसल, नेपाल में सबसे ज्यादा तबाही सैलाब को साथ लाने वाली भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के आसपास के क्षेत्रों और इन नदियों पर बनी ऊर्जा परियोजनाओं को झेलनी पड़ी। इन्हीं क्षेत्रों में सबसे ज्यादा लोगों की मौत हुई और अधिकतम लापता हुए। खासकर छह हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर काम करने वाले करीब 900 लोगों की खोजबीन अब तक जारी है। इस बीच शुक्रवार सुबह एक अच्छी खबर आई। राहत-बचाव कार्य में लगी टीमों ने त्रिशूली नदी पर चल रही एक परियोजना में काम कर रहे दो लोगों को नौ दिन बाद मलबे से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। 

सामने आया है कि जिन दो लोगों को त्रिशूली 3ए प्रोजेक्ट के अंडरग्राउंड केंद्र के ऊपर जमे मलबे से बाहर निकाला गया है, वे दोनों ही नेपाली नागरिक हैं। इन्हें उपचार के लिए काठमांडू ले जाया गया है। दोनों ने ही बताया कि जब बाढ़ का प्रकोप जलविद्युत परियोजना पर पड़ा, तब उनके साथ कई और लोग मलबे में दब गए। हालांकि, बाकी लोगों की खोज अभी जारी है। 
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नेपाल में बनी सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने की नई रणनीति। - फोटो : अमर उजाला
नेपाल में हिमालय की ऊंची पहाड़ियों से आए एक सैलाब का असर बीते नौ दिन से लगातार यहां रहने वालों के लिए एक बुरा सपना बना हुआ है। दरअसल, नेपाल में सबसे ज्यादा तबाही सैलाब को साथ लाने वाली भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के आसपास के क्षेत्रों और इन नदियों पर बनी ऊर्जा परियोजनाओं को झेलनी पड़ी। इन्हीं क्षेत्रों में सबसे ज्यादा लोगों की मौत हुई और अधिकतम लापता हुए। खासकर छह हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स पर काम करने वाले करीब 900 लोगों की खोजबीन अब तक जारी है। इस बीच शुक्रवार सुबह एक अच्छी खबर आई। राहत-बचाव कार्य में लगी टीमों ने त्रिशूली नदी पर चल रही एक परियोजना में काम कर रहे दो लोगों को नौ दिन बाद मलबे से सुरक्षित बाहर निकाल लिया। 

सामने आया है कि जिन दो लोगों को त्रिशूली 3ए प्रोजेक्ट के अंडरग्राउंड केंद्र के ऊपर जमे मलबे से बाहर निकाला गया है, वे दोनों ही नेपाली नागरिक हैं। इन्हें उपचार के लिए काठमांडू ले जाया गया है। दोनों ने ही बताया कि जब बाढ़ का प्रकोप जलविद्युत परियोजना पर पड़ा, तब उनके साथ कई और लोग मलबे में दब गए। हालांकि, बाकी लोगों की खोज अभी जारी है। 

बाढ़ से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुई हाइड्रोपावर परियोजनाओं में काम कर रहे दो लोगों के नौ दिन बाद सही-सलामत निकलने के बाद यह जानना अहम है कि आखिर यह दो लोग इस भीषण बाढ़ की चपेट में आने के बावजूद नौ दिन तक जिंदा कैसे रहे? जलविद्युत परियोजनाओं में काम कर रहे लोगों को निकालने के लिए राहत-बचाव कर्मी किस तरह अभियान चला रहे हैं? आगे इन परियोजनाओं में फंसे लोगों को निकालने के लिए क्या तैयारी की जा रही है? आइये जानते हैं...


पहले जानें- मलबे से ढके अंडरग्राउंड केंद्र में कैसे जिंदा रहे बचाए गए लोग?

फिलहाल यह साफ नहीं है कि जिस त्रिशूली 3ए प्रोजेक्ट में राहत-बचाव कार्य के दौरान दो लोग निकाले गए, वहां और कितने लोग फंसे हो सकते हैं या कितने जिंदा होंगे। हालांकि, जो दो लोग बचे हैं, उनके खुद के बयानों और रेस्क्यू टीम की कोशिशों से चार अहम तथ्य निकलकर सामने आए। सबसे पहले जो बात सामने आई, वह यह कि सुरंग के मलबे में दबे एक व्यक्ति संजय साह बाढ़ के खतरे के बीच 40-45 लोगों को बचाने में सफल हुए थे और इसी दौरान सुरंग में फंस गए। 

गोल्डीलॉक्स जोन में फंसकर बची जिंदगी 
दोनों कर्मचारी टनल के भीतर एक सुरक्षित हिस्से में फंसे थे, जिसे भूवैज्ञानिकों ने गोल्डीलॉक्स जोन यानी इंसानों के जीवित बचने के 'सबसे अनुकूल' जगह कहा है। यह मुख्य रूप से सुरंग का वह इलाका था, जहां से अंदर और बाहर ले जाने वाली केबल मौजूद थीं। यह केबल भूमिगत पावरहाउस से ट्रांसमिशन ग्रिड तक जाती हैं। इस मजबूत ढांचे की वजह से वे टनल में आई बाढ़, मिट्टी और मलबे के सीधे बहाव की चपेट में आने से बच गए।

बाहर से ऑक्सीजन पहुंचाई गई 
टनल का मुख्य द्वार पूरी तरह से मलबे से बंद हो जाने के बावजूद बचाव कर्मियों ने सुरंग के अंदर बनी संभावित खाली जगहों में पाइपों के जरिए ऑक्सीजन भेजने का प्रयास किया था, ताकि वहां हवा की कमी न हो।

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प्रार्थना और मानसिक हौसला
मैकेनिकल फोरमैन संजय साह के मुताबिक, सुरंग के अंदर घने अंधकार में नौ दिनों तक पूरी दुनिया से कटे रहने के दौरान उन्होंने हौसला नहीं टूटने दिया। वे लगातार मंत्रों का जाप और प्रार्थना करते रहे, जिससे उन्हें मानसिक रूप से जीवित रहने का हौसला मिला।

कठिन भूख-प्यास का सामना किया 
सुरंग के अंदर दोनों के पास ही भोजन या पानी की कोई व्यवस्था नहीं थी। बचाव के बाद जब कबीर महर्जन को सैन्य अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया, तो उन्होंने गंभीर स्थिति में होश में आने पर सबसे पहले बताया कि उन्हें बहुत तेज प्यास लगी है। वे बेहद कठिन परिस्थितियों में केवल अपनी शारीरिक सहनशक्ति के बल पर शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) का मुकाबला करते हुए जीवित बचे रहे।

राहत-बचाव टीमों को कैसे पता चला दो लोगों के जिंदा होने की बात, बचाया कैसे?

बाढ़ के मलबे से बंद केबल टनल में रास्ता बनाने के बाद, बचाव कर्मियों ने टनल की छत के ऊपरी हिस्से में एक छोटा सा छेद बनाया, ताकि उसके जरिए रेंगकर अंदर जाया जा सके। इस रास्ते से जब बचाव कर्मियों ने टनल के भीतर फंसे लोगों को आवाज दी, तो उन्हें अंदर से नेपाली भाषा में किसी के जवाब देने की बहुत ही धीमी और हल्की आवाज सुनाई दी। इसी आवाज के जरिए बचाव दल को उनके जीवित होने का पहला सुराग मिला।

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नेपाल में बचाए गए नौ दिन तक सुरंग में फंसे दो कर्मी। - फोटो : अमर उजाला

फंसे लोगों को निकालने के लिए बचाव टीम क्या कर रहीं?

नेपाल की तेज प्रवाह वाली भोटेकोशी नदी और त्रिशूली नदी पर तबाह हुईं जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों और मलबे में फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल, नेपाल पुलिस और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की बचाव टीमें मिलकर काम कर रही हैं। 

1. मोबाइल सिग्नल ट्रैक करने की कोशिश

नेपाल में राहत-बचाव कार्य की इनसाइड स्टोरी। - फोटो : अमर उजाला
2. गोल्डीलॉक्स जोन की पहचान
बाढ़ के प्रचंड वेग के कारण सतह पर जलविद्युत स्टेशनों का कोई नामोनिशान नहीं बचा था। इसके समाधान के लिए विशेषज्ञ इंजीनियरिंग चित्रों और सैटेलाइट इमेजरी की मदद से जमीन के नीचे के उन संभावित सुरक्षित स्थानों की पहचान कर रहे हैं, जिन्हें गोल्डीलॉक्स जोन कहा जाता है। ये वे स्थान हैं जहां बाढ़ के सीधे मलबे से सुरक्षा मिलने और हवा की उपलब्धता होने की सबसे ज्यादा संभावना होती है।

3. उन्नत खोज तकनीक का प्रयोग
बाढ़ के बाद मलबे से सुरंग के बंद हुए दरवाजों और जमी हुई गाद के नीचे लोगों का पता लगाने के लिए बचाव दल थर्मल डिटेक्टर, दूर तक जाने वाले रिमोट कंट्रोल्ड कैमरों, रिमोट संचालित वाहनों और ड्रोन्स का भी इस्तेमाल कर रहा है।

4. हाथों से खोदाई और चट्टानों को उड़ाने के लिए विस्फोट

नेपाल में रेस्क्यू ऑपरेशन। - फोटो : अमर उजाला
5. जल निकासी के प्रयास और ऑक्सीजन पाइप डाले गए
  • सुरंगों में भरा पानी बचाव कर्मियों या अंदर फंसे लोगों को न डुबो दे, इसके लिए बचाव दल ने पहले एक बड़ी जल निकासी नहर खोदी, ताकि टनल का पानी निकाला जा सके।
  • टनल में जाने वाले दरवाजे के पूरी तरह से बंद होने की वजह से अंदर हवा की कमी को पूरा करने के लिए, मलबे से बंद हिस्सों में पाइपों के जरिए ऑक्सीजन पंप की जा रही है।

6. हवाई सहायता का इस्तेमाल
पहाड़ी और बेहद दुर्गम इलाका होने की वजह से, जहां सड़कें और पुल बह चुके हैं, वहां हेलीकॉप्टरों की मदद से निरंतर बचाव दल को भेजा जा रहा है और टनल से जीवित निकाले गए लोगों को तुरंत काठमांडू के सैन्य अस्पताल पहुंचाया जा रहा है। इतना ही नहीं घायलों से लेकर मृतकों को सुरक्षित जगह पहुंचाने के लिए ड्रोन्स की भी मदद ली जा रही है।

इन परियोजनाओं में फंसे लोगों को निकालने के लिए क्या तैयारी की जा रही है?

त्रिशूली 3ए से अब तक दो लोगों को बचाया जा चुका है और यहां फंसे अन्य लोगों की तलाश जारी है। हालांकि, सुरक्षाबलों का कहना है कि इसकी उम्मीद काफी कम ही है कि कोई सुरंग के ऊपरी हिस्से में अब कोई बचा होगा। दरअसल, जिंदा बचे दो लोगों के अलावा यहां से एक लाश भी निकाली गई है और अब किसी आवाज को भी नहीं सुना जा सका है। बचाव दल की एक टीम सुरंग के हर हिस्से की जांच कर चुकी है और जिंदा लोगों का सुराग नहीं मिला है। 

हालांकि, त्रिशूली 3ए के साथ-साथ बचाव दलों की निगाह अब दूसरी जलविद्युत परियोजनाओं, जैसे- चिलिमे, रसुवागढ़ी, अपर त्रिशूली 1, आदि पर है, जहां भीषण मलबे और बाढ़ के कारण सैकड़ों कर्मचारी सुरंगों के अंदर दबे हैं। इन फंसे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए स्थानीय प्रशासन, नेपाली सेना और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की ओर से रणनीतियां तैयार की गई हैं।

1. नई रणनीतियां बनाने के लिए जुटेंगे विशेषज्ञ
त्रिशूली 3ए परियोजना में दो श्रमिकों को जीवित बचाए जाने में मदद करने वाले भूवैज्ञानिक अर्नोल्ड डिक्स अब खुद ऑस्ट्रेलिया से काठमांडू पहुंच रहे हैं। उनका मकसद इस सफल रेस्क्यू से मिली सीख और अनुभवों का इस्तेमाल चिलिमे और रसुवागढ़ी जैसी अन्य प्रभावित जलविद्युत परियोजनाओं में फंसे लोगों को खोजने के लिए नई रणनीतियां विकसित करना होगा। उनके साथ कुछ और एक्सपर्ट्स की टीम नेपाल पहुंच रही है।

2. सैटेलाइट्स की मदद से सुरंगों के सुरक्षित हिस्सों की तलाश
बचाव टीमें अब सैटेलाइट इमेज, पुराने चार्ट और इंजीनियरिंग मानचित्रों का गहन विश्लेषण कर दूसरी सुरंगों में भी बचाव अभियान चला रही हैं। इसके जरिए त्रिशूली 3ए की तरह ही उन जगहों को चिह्नित करना है, जो सुरंग के अंदर मजबूत कंक्रीट संरचनाओं के बीच भी हवा पहुंचने के मुहानों के तौर पर मौजूद हो सकती हैं। इन जगहों पर कुछ लोगों के जीवित बचने की संभावना अब भी है।

3. ऑक्सीजन की आपूर्ति हर सुरंग में बढ़ाने की कवायद
सुरंगों के दरवाजों के पूरी तरह मलबे से बंद होने की वजह से बचाव दल संभावित खाली जगहों में पाइपों के जरिए ऑक्सीजन गैस पंप कर रहे हैं, ताकि अंदर बचे लोगों को सांस लेने में कठिनाई न हो। त्रिशूली 3ए के बाद अब यह तकनीक दूसरी सुरंगों के लिए लागू की जा रही है। 

4. बचाव कर्मियों की रेंगकर जिंदा लोगों तक पहुंचने की तैयारी
मलबे में दबी सुरंगों का मार्ग साफ करने के लिए बड़े पत्थरों को विस्फोटकों से उड़ाया जा रहा है। वहीं, सुरंगों के खतरे वाले हिस्सों में जमी हुई गाद को हटाने के लिए बचावकर्मी रेंगकर आगे बढ़ने और हाथों से कीचड़ साफ करने वाली सफल तकनीक अपनाने की योजना बना रहे हैं।
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