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चीन का सोलर तकनीक पर शिकंजा: 12 तकनीकों के निर्यात पर रोक का प्रस्ताव; भारत के सामने बढ़ेंगी चुनौतियां?

Mon, 19 Oct 2026 04:12 AM IST
निर्मल कांत अमर उजाला रिसर्च, बीजिंग।

सार

चीन ने सौर ऊर्जा से जुड़ी 12 अहम विनिर्माण तकनीकों को दूसरे देशों के साथ साझा करने पर रोक लगाने का प्रस्ताव दिया है। इससे भारत पर किस तरह असर पड़ सकता है। आखिर चीन के इस कदम से भारत की सौर योजनाओं के सामने कौन-सी चुनौतियां खड़ी होंगी? पढ़िए इस रिपोर्ट में। 
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सौर ऊर्जा से जुड़ी 12 तकनीकों को किसी के साथ साझा नहीं करेगा चीन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
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चीन ने राष्ट्रीय सुरक्षा और अपने रणनीतिक हितों की रक्षा का हवाला देते हुए 12 सौर ऊर्जा (सोलर) विनिर्माण तकनीकों को दुनिया के किसी भी देश के साथ साझा करने पर प्रतिबंध लगाने का एक व्यापक प्रस्ताव जारी किया है।
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चीनी वाणिज्य मंत्रालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने यह कदम वैश्विक सौर आपूर्ति श्रृंखला में चीन के तकनीकी दबदबे को बनाए रखने और संवेदनशील तकनीकों के अनियंत्रित प्रसार को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है। यह नियंत्रण चीन द्वारा कुल 40 अत्याधुनिक तकनीकों (जिसमें एआई और बायोमेडिसिन भी शामिल) की निर्यात सूची में किए जा रहे संशोधनों का एक हिस्सा है। इस प्रस्ताव पर जनता और उद्योग जगत से 15 नवंबर तक सुझाव मांगे गए हैं।

चीन ने सोलर पीवी सप्लाई चेन के महत्वपूर्ण चरणों से जुड़ी तकनीकों को इस दायरे में रखा है। इसमें सोलर सेल बनाने के लिए जरूरी मुख्य कच्चे माल पॉलीसिलिकॉन से जुड़ी कोर इंजीनियरिंग तकनीकें प्रमुख हैं। इसमें विशेष रूप से सालाना 30,000 टन या उससे अधिक क्षमता वाली उत्पादन लाइनों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक शामिल है।  
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इस फैसले से भारत के सामने भी बढ़ेंगी चुनौतियां  
चीन का यह कदम भारत की सौर आत्मनिर्भरता की महत्वाकांक्षाओं के लिए भी एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। भारत में लगने वाले 15 गीगावाट से अधिक के बड़े सोलर प्लांट्स के लिए जरूरी मशीनरी के लिए कंपनियां पूरी तरह चीन पर निर्भर हैं। इस नियंत्रण से भारत में प्लांट्स स्थापित करने में देरी हो सकती है।

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भारत सरकार ने 2026 की शुरुआत में ही चीनी निवेश के नियमों में ढील दी थी ताकि भारतीय कंपनियां चीन के साथ मिलकर पॉलीसिलिकॉन और वेफर सेगमेंट में ज्वाइंट वेंचर या टेक्नोलॉजी ट्रांसफर समझौते कर सकें। अब चीन की मंजूरी न मिलने के कारण ये रणनीतिक साझेदारियां खटाई में पड़ सकती हैं।
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भारतीय निर्माता वर्तमान में टॉपकॉन और पर्क जैसी मौजूदा तकनीकों पर काम कर रहे हैं। चीन द्वारा अगली  पीढ़ी की पेरोव्स्काइट और टैंडम सोलर सेल तकनीकों के साझा करने  पर पूरी तरह रोक लगाने से भारत भविष्य की सौर तकनीकों की दौड़ में पीछे छूट सकता है।
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