मोहम्मद हसन पी.जी. कॉलेज (जौनपुर) की असि. प्रोफेसर मनोविज्ञान विभाग डॉ. ममता सिंह ने कहा कि दिल्ली से सामने आई तीन सगी बहनों की आत्महत्या की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह केवल एक पारिवारिक त्रासदी नहीं है, बल्कि हमारे समाज, शिक्षा व्यवस्था और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति हमारी सामूहिक उदासीनता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, तीनों बहनें पढ़ाई और भविष्य को लेकर अत्यधिक मानसिक दबाव में थीं। प्रतियोगी माहौल, सफलता की अनिवार्यता और असफलता के भय ने उन्हें इस कदर घेर लिया कि जीवन से बड़ा उन्हें कोई विकल्प दिखाई नहीं दिया। यह घटना उस सोच को उजागर करती है, जिसमें बच्चों की योग्यता को केवल अंकों, रैंक और करियर से आँका जाता है। आज का छात्र केवल पाठ्यक्रम का बोझ नहीं ढो रहा, बल्कि परिवार और समाज की अपेक्षाओं का भार भी अपने कंधों पर उठाए हुए है। “हर हाल में सफल होना है” और “दूसरों से बेहतर साबित करना है” जैसी मानसिकता बच्चों को अंदर ही अंदर तोड़ देती है। दुर्भाग्यवश, कई बार वे अपनी पीड़ा और भावनाएँ किसी से साझा करने का साहस भी नहीं जुटा पाते। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो लगातार दबाव, भावनात्मक समर्थन की कमी और असफलता को स्वीकार न कर पाने की प्रवृत्ति आत्मघाती विचारों को जन्म देती है। बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि जीवन में असफलता अंत नहीं, बल्कि सीखने और आगे बढ़ने की प्रक्रिया का हिस्सा है।