हरमोनियम की धुन, गिटार की झंकार, झिलमिलाती रोशनी में गूंजती सीटी और तालियां। ये नजारा था रविवार रात शिल्पग्राम के मुक्ताकाशीय मंच का। यहां अभिनय और गायकी से मशहूर हुए पीयूष मिश्रा ने बल्लीमारान बैंड की धुनों पर अपनी जादुई आवाज से समा बांध दिया। ताज महोत्सव की महफिल सजी तो अपने अनोखे संगीत और कविताओं से श्रोताओं को पीयूष मिश्रा ने देर रात तक मंत्रमुग्ध किया। अपनी प्रस्तुतियों में उन्होंने शेक्सपियर के हैमलेट से लेकर व्हिस्की की सिसकियां, मुंबई की रातें और बुंदेलों की कहानी को गीतों में पिरोया। उन्होंने एक बगल में चांद होगा, एक बगल में रोटियां सुनाकर तालियों की दाद पाई। इसके बाद जब उन्होंने मंच से आरंभ है प्रचंड... गीत प्रस्तुत किया तो मौजूद लोग झूम उठे। उन्होंने एक से बढ़कर एक गीत प्रस्तुत किए। थोड़ा नजारा, चटपट बातें... बूंदे लेहर बोलो कि... ओ री दुनिया.. जैसे गीत गूंजे। प्रशंसक उनकी जादुई आवाज में खो गए। गहरी और भावनात्मक कविताएं, उनके प्रभावशाली मंच प्रदर्शन और उनकी अनोखी कहानी कहने की कला, शिल्पग्राम से दर्शकों को उनकी दुनिया में खींच ले गई।बल्लीमारान के साथ, उन्होंने एक ऐसा अनूठा संगीत तैयार किया है, जो बीते दौर की गूंज रहा और आज की ताजगी को एक साथ जोड़ता है। उन्होंने रुपये की भरमार साथ में दबी चवन्नी... डेनमार्क के हालात के लूपपोल... बुंदेलो हरबोलों के मुंह... खुमारी थी सपना था...रात है नशे में जैसे गीतों से देर रात तक महफिल को जवां रखा। इसके पहले उन्होंने बताया कि मैं दिल्ली में लंबे समय तक रहा हूं। उर्दू शायरी के मास्टर मिर्जा गालिब को उनका बैंड संगीतमय श्रद्धांजलि देता है। इस बैंड का नाम, दिल्ली की उस गली से प्रेरित है, जहां कभी मिर्जा गालिब रहा करते थे।