उठो मेरे शेरों, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो, तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंद जीव हो, धन्य हो,सनातन हो, तुम तत्व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो। ये शब्द थे उस सन्यासी के जिसने पूरी दुनिया में भारत को एक नई पहचान दी। ये शब्द थे स्वामी विवेकानंद के।