क्या असम की राजनीति में इतिहास खुद को दोहराने जा रहा है? क्या एक बेटे के कंधों पर पिता की विरासत का बोझ भारी पड़ जाएगा या वही विरासत उसे जीत दिलाएगी? क्या कभी साथ काम करने वाले दो नेता अब सबसे बड़े सियासी प्रतिद्वंदी बन चुके हैं? और सबसे बड़ा सवाल क्या ये चुनाव सिर्फ पार्टियों की लड़ाई है या दो चेहरों की सीधी टक्कर?
असम की सियासत में 25 साल बाद फिर वही मोड़, वही सवाल और एक नई कहानी लिखने की तैयारी। इस वीडियो में बात होगी गौरव गोगोई की जिनके सामने उनके पिता की विरासत है सामने प्रतिद्वंदी है एक ऐसा व्यक्ति जिसके साथ उन्होंने लंबे समय तक काम किया और अब दोनों एक दूसरे के खिलाफ है। असम में कांग्रेस की लिस्ट जारी होने के बाद से भाजपा और कांग्रेस की टक्कर पर चर्चा होने लगी है ऐसे में इतिहास के पन्ने को पलटने की जरूरत भी हो जाती है ये समझने के लिए की आने वाले इस चुनाव में क्या समीकरण हैं।
असम की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। 1990 के दशक का वो दौर, जब राज्य उग्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था, आज फिर चर्चा में है। उस समय उग्रवादी संगठनों के निशाने पर कांग्रेस के नेता थे और हालात इतने खराब थे कि हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई थी। इसके बाद असम गण परिषद यानी एजीपी ने दूसरी बार सत्ता संभाली।
लेकिन 22 अप्रैल 1996 को सैकिया के निधन के बाद कांग्रेस के सामने नेतृत्व का संकट खड़ा हो गया। ऐसे मुश्किल वक्त में पार्टी की कमान तरुण गोगोई को सौंपी गई। उन्होंने असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के तौर पर संगठन को दोबारा खड़ा करने के लिए लगातार मेहनत की। करीब पांच साल की रणनीति और संगठनात्मक मजबूती का नतीजा 2001 में सामने आया, जब कांग्रेस ने एजीपी को हराकर सत्ता में वापसी की।
इसके बाद तरुण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस ने असम की राजनीति पर लंबा राज किया। 2001 से 2016 तक लगातार तीन कार्यकाल तक उनकी सरकार बनी रही। इस दौरान उन्होंने राज्य में स्थिरता लाने और विकास की दिशा में कई कदम उठाए। यही वजह है कि उनका कार्यकाल असम की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
अब करीब 25 साल बाद, असम फिर एक अहम चुनावी मोड़ पर खड़ा है। 9 अप्रैल को राज्य की 126 विधानसभा सीटों पर एक चरण में मतदान होना है। इस बार कांग्रेस की कमान तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई के हाथों में है। पार्टी ने उन्हें एक साल पहले ही राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए आगे किया था।
गौरव गोगोई के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पिता की विरासत को संभालने और संगठन को एकजुट रखने की है। 2023 के परिसीमन के बाद उन्होंने अपना लोकसभा क्षेत्र बदलकर जोरहाट कर लिया, जो गोगोई परिवार का मजबूत गढ़ माना जाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने इस सीट पर जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक पकड़ का संकेत भी दे दिया।
लेकिन 2026 का विधानसभा चुनाव उनके लिए असली परीक्षा माना जा रहा है। इस बार उनका सीधा मुकाबला राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से है। राजनीतिक विश्लेषक इस चुनाव को केवल पार्टियों की लड़ाई नहीं, बल्कि दो व्यक्तित्वों के टकराव के रूप में देख रहे हैं।
एक तरफ गौरव गोगोई हैं, जो अपने पिता की विरासत और कांग्रेस की परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ हिमंत बिस्वा सरमा हैं, जो आज बीजेपी के सबसे मजबूत चेहरों में से एक हैं और आक्रामक राजनीतिक शैली के लिए जाने जाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि सरमा कभी कांग्रेस का ही हिस्सा थे और तरुण गोगोई सरकार में अहम भूमिका निभाते थे। लेकिन समय के साथ उन्होंने पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया।
इस चुनाव को और चुनौतीपूर्ण बनाता है कांग्रेस का आंतरिक संकट। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के बीजेपी में शामिल होने से संगठन कमजोर हुआ है। इससे गौरव गोगोई के सामने न सिर्फ बाहरी, बल्कि अंदरूनी चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं।
अब देखना होगा कि क्या गौरव गोगोई अपने पिता की तरह संगठन को मजबूत कर पाते हैं और कांग्रेस को सत्ता में वापसी दिला पाते हैं, या फिर हिमंत बिस्वा सरमा की रणनीति और मौजूदा पकड़ एक बार फिर बीजेपी को बढ़त दिलाएगी। असम की यह चुनावी लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि विरासत, रणनीति और नेतृत्व की भी परीक्षा बनने जा रही है।