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चिराग के बाद जीतन राम मांझी ने NDA में सीट बंटवारे पर दिखाए तेवर

अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Updated Wed, 08 Oct 2025 05:04 PM IST

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का ऐलान हो चुका है, और अब राज्य की सियासत पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुकी है।
एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के अंदर सीट बंटवारे पर चर्चा तेज हो गई है, लेकिन इसी बीच एक ऐसा बयान आया जिसने राजनीतिक तापमान और बढ़ा दिया।
हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने बुधवार (8 अक्टूबर) को कहा कि उनकी पार्टी मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री पद नहीं, बल्कि “विधानसभा में मान्यता प्राप्त दल का दर्जा” चाहती है।

मांझी ने बेहद स्पष्ट और सधी हुई भाषा में अपनी मांग रखी। उन्होंने कहा,

“हम बस इतनी ही मांग कर रहे हैं कि हमारी पार्टी को मान्यता मिले। अगर हमारी मांग पूरी नहीं होती तो हम एक भी सीट पर चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन एनडीए में ही बने रहेंगे।”

उनका यह बयान जितना सधा हुआ था, उतना ही राजनीतिक रूप से गहरा भी। उन्होंने एक तरफ दबाव की रणनीति दिखाई, तो दूसरी ओर गठबंधन न तोड़ने का संदेश देकर बीजेपी को राहत भी दी।

राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि मांझी का यह रुख “दबाव की राजनीति” का हिस्सा है।
वह गठबंधन में अपनी राजनीतिक हैसियत बरकरार रखना चाहते हैं, लेकिन खुला विद्रोह नहीं करना चाहते।

सूत्रों के मुताबिक, जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) को एनडीए की सीट बंटवारे की शुरुआती रूपरेखा में केवल 7 सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है।
लेकिन मांझी इस पर सहमत नहीं हैं।
वह कम से कम 15 सीटों पर चुनाव लड़ने के मूड में हैं, जबकि उनकी मांग 20 सीटों की है।

अंदरखाने यह चर्चा है कि बीजेपी और जेडीयू दोनों मांझी को सीमित सीटों में समायोजित करना चाहते हैं ताकि अन्य सहयोगियों—एलजेपी (रामविलास) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (उपेंद्र कुशवाहा) को भी जगह दी जा सके।
लेकिन मांझी अपनी पार्टी की “मान्यता” को लेकर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।

जीतन राम मांझी ने बुधवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता शेयर की—

“हो न्याय अगर तो आधा दो,
यदि उसमें भी कोई बाधा हो,
तो दे दो केवल 15 ग्राम,
रखो अपनी धरती तमाम,
हम वही खुशी से खाएंगे,
परिजन पे आसी ना उठाएंगे।”

इस कविता को राजनीतिक संकेतों में पढ़ा जा रहा है।
कविता के जरिए मांझी ने यह संदेश दिया है कि उन्हें सत्ता का लोभ नहीं, बल्कि सम्मान चाहिए।
वे गठबंधन में बराबरी का दर्जा चाहते हैं, भले ही सीटें कम मिलें।
इस पोस्ट के बाद बिहार के सियासी गलियारों में चर्चा शुरू हो गई कि मांझी अपने भावों को “कविता की भाषा” में व्यक्त कर रहे हैं ताकि किसी पर सीधे प्रहार भी न हो और संदेश भी पहुंच जाए।

एनडीए के भीतर सीट बंटवारे पर सिर्फ मांझी ही नहीं, चिराग पासवान भी असंतोष जता रहे हैं।
सूत्रों का कहना है कि चिराग को उम्मीद से कम सीटें मिलने की संभावना है, और वह भी खुलकर अपनी नाराजगी व्यक्त कर चुके हैं।
अब मांझी का यह बयान बीजेपी के लिए एक और सिरदर्द बन गया है।

हालांकि, मांझी के यह कहने से कि “हम गठबंधन में ही रहेंगे”, बीजेपी को कुछ राहत जरूर मिली है।
इससे यह स्पष्ट है कि वे विपक्ष में नहीं जाना चाहते, लेकिन अपनी राजनीतिक पहचान को कमजोर भी नहीं पड़ने देंगे।

राजनीति के जानकार कहते हैं कि मांझी का असल मकसद सीटों की संख्या से ज्यादा राजनीतिक सम्मान और पहचान को बनाए रखना है।
वे नहीं चाहते कि उनकी पार्टी सिर्फ “प्रतीकात्मक” सहयोगी के रूप में रह जाए।
इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री पद का लोभ छोड़कर “मान्यता प्राप्त दल” की मांग रखी जो उन्हें लंबे समय तक राजनीतिक पहचान दे सकती है।


बिहार की राजनीति में जीतन राम मांझी अपनी सधी हुई भाषा और प्रतीकात्मक संदेशों के लिए जाने जाते हैं।
इस बार भी उन्होंने वही किया न कोई आक्रामक बयान, न कोई धमकी, बस एक कवितामय संदेश के जरिए गठबंधन को सोचने पर मजबूर कर दिया।

अब देखना यह होगा कि बीजेपी और जेडीयू उनकी इस “15 ग्राम की मांग” पर क्या फैसला लेते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि मांझी ने चुनावी सीजन में एनडीए के भीतर एक नई सियासी सुगबुगाहट जरूर पैदा कर दी है-
जहां सवाल सिर्फ सीटों का नहीं, सम्मान का है।

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