भाद्रपद मास शुरू होते ही गोबिंद सागर झील में बेड़ा तारने की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा भी शुरू हो गई। सोमवार को भाद्रपद मास के पहले दिन झील के किनारे स्थित विभिन्न घाटों पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। लोगों ने विधिवत पूजा-अर्चना के बाद बेड़ा तारकर इस प्राचीन परंपरा को निभाया। घाटों पर सुबह से शाम तक श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। गोबिंद सागर झील के किनारे लुहणू घाट, ऋषिकेश घाट, बैरी और नाले नौण में बेड़ा तारने की परंपरा निभाई जाती है। श्रद्धालु घरों से प्रसाद और पूजा सामग्री लेकर घाटों पर पहुंचे। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मल्लाह को वस्त्र और अन्य अलंकार भेंट किए गए। इसके बाद बेड़ा तारने वाले परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों को नाव में बैठाकर झील की सैर करवाई गई। इस दौरान घाटों पर धार्मिक अनुष्ठानों के साथ श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिला। स्थानीय लोगों के अनुसार बेड़ा तारने की इस परंपरा के पीछे धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद आत्मा के सामने वैतरणी नदी आती है। ऐसे में बेड़ा तारने से मिलने वाला पुण्य आत्मा को भवसागर से पार लगाने में सहायक माना जाता है। इसी धार्मिक आस्था के चलते भाद्रपद मास के दौरान लोग परिवार की सुख-शांति और पूर्वजों की शांति की कामना के साथ बेड़ा तारने की परंपरा निभाते हैं। बेड़ा तारने के दौरान गोबिंद सागर के घाटों पर धार्मिक माहौल देखने को मिला। महिलाएं एकत्र होकर भजन गाती रहीं और नृत्य करती रहीं। पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच श्रद्धालुओं ने पूरी आस्था के साथ परंपरा निभाई। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बिलासपुर क्षेत्र के लोगों की धार्मिक आस्था और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। भाद्रपद मास के शुरू होते ही घाटों पर जुटने वाली भीड़ इस परंपरा से लोगों के गहरे जुड़ाव को दर्शाती है।