भालौठ गांव सिर्फ बाजरे और वैज्ञानिकों के लिए नहीं शहादत की मिसालों के लिए भी जाना जाता है। 1971 में 30 गोलियां खाने के बाद भी दुश्मन से भिड़ने वाले वीर चक्र विजेता प्रहलाद सिंह से लेकर कारगिल के हीरो रामधारी अत्री तक, यहां की मिट्टी ने देश को कई रणबांकुरे दिए। आज भी गांव के 150 से अधिक बेटे सेना में रहकर सरहद की हिफाजत कर रहे हैं। वीरभूमि में भालौठ गांव का नाम शौर्य की अलग इबारत लिखता है। 1971 के युद्ध में भालौठ के सपूत प्रहलाद सिंह ने अदम्य साहस का परिचय दिया। लड़ाई के दौरान उनके शरीर में 30 गोलियां लगीं, फिर भी वे मोर्चा छोड़कर पीछे नहीं हटे। आखिरी गोली तक दुश्मन को जवाब देते रहे। उनकी बहादुरी को सलाम करते हुए राष्ट्रपति ने उन्हें जीवित रहते ही वीर चक्र से नवाजा। गंभीर रूप से घायल प्रहलाद सिंह बाद में शहीद हो गए लेकिन जाते-जाते गांव के हर युवा के दिल में वर्दी का जुनून भर गए। भालौठ की शहादत की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान गांव के रामधारी अत्री ने टाइगर हिल पर अदम्य साहस दिखाया। बर्फीली चोटियों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों से लोहा लेते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। आज गांव का शहीद रामधारी अत्री खेल स्टेडियम उन्हीं की याद दिलाता है जहां रोज 100 से ज्यादा युवा सेना भर्ती की तैयारी करते हैं।