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हिम्मत वतन की हमसे है: गोली लगने के 10 घंटे तक आतंकियों से लड़ते रहे शहीद मेजर आशीष धौंचक, 15 अगस्त 2024 को मरणोपरांत मिला शौर्य चक्र

शाहिल शर्मा Updated Sat, 02 May 2026 08:26 PM IST

पानीपत शहर से सटे बिंझौल गांव के मेजर आशीष धौंचक ने 36 साल की उम्र में 13 सितंबर 2023 को देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया था। मेजर आशीष कश्मीर के अनंतनाग क्षेत्र में गोली लगने के बाद 10 घंटे तक आतंकवादियों के साथ मुकाबला करते रहे। उनके पैर से गोली लगने पर खून बहता रहा, लेकिन इसकी परवाह नहीं की। शहीद मेजर आशीष धौंचक को मरणोपरांत शौर्य चक्र 15 अगस्त 2024 को दिया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शहीद की मां कमला और पत्नी ज्योति को यह सम्मान दिया था। शहीद मेजर आशीष धौंचक को इससे पहले सेना मेडल भी मिल चुका है। वे दो मेडल पाने वाले पानीपत के पहले सपूत हैं। शहीद मेजर आशीष धौंचक का परिवार टीडीआई सिटी में रहता है। उनकी पत्नी ज्योति गुरुद्वारा में जिला रोजगार अधिकारी हैं। ज्योति ने बताया कि मेजर आशीष धौंचक अनंतनाग में अपनी टीम के साथ मिशन पर थे। उनकी आतंकियों के साथ मुठभेड़ चल रही थी। उनकी जांघ में एक गोली लग गई। उनको कैंप में ले जाने के लिए टीम आई, लेकिन मेजर ने उनको मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वे आतंकियों को मारकर ही आएंगे। वे घायल अवस्था में लगातार 10 घंटे तक आतंकवादियों का मुकाबला करते रहे। उन्होंने चार-पांच दुश्मनों को भी गिरा दिया था। उन्होंने अपने सपनों का नया घर टीडीआई में बनाया था। आशीष के जन्मदिन पर 23 अक्टूबर 2023 को नए घर में प्रवेश करने की तैयारी चल रही थी। इससे पहले ही आतंकियों से मुठभेड़ में शहीद हो गए। बिंझौल गांव के नर सिंह ने बताया कि आशीष स्कूल समय से ही बहादुर रहे हैं। वे गांव में चोर पुलिस का खेल खेलते थे तो आशीष पुलिस अधिकारी का रोल करते थे। आशीष ने एनएफएल के केंद्रीय विद्यालय में 12वीं तक की पढ़ाई की। उन्होंने इसके बाद बरवाला से बीटेक इलेक्ट्रॉनिक की डिग्री ली। इसके बाद एमटेक की पढ़ाई के दौरान 25 साल की उम्र में 2013 में भारतीय सेना में बतौर लेफ्टिनेंट भर्ती हुए थे। उनकी शहादत का समाचार मिलते ही गांव का हर बच्चा और मां खुद को रोक नहीं पाए। गांव के लाल काे अंतिम विदाई देने के लिए पहुंच गए थे। उनके पार्थिव शरीर के पीछे एक किलोमीटर तक लोग पैदल चल रहे थे। तीन बहनों के इकलाैते भाई थे आशीष टीडीआई की कमला ने बताया कि आशीष तीन बहनों के इकलौते भाई थे। तीनों बहनें अंजू, सुमन और ममता शादीशुदा हैं। उनके पिता लालचंद नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड से सेवानिवृत हैं। उन्होंने अपनी खुशियों को समेटकर बच्चों को पढ़ाया लिखाया। उनके पिता आशीष के शहीद होने से दो साल पहले ही सेवानिवृत्ति हुए थे। वे सेक्टर-7 में किराये के मकान में रहते थे और टीडीआई में अपना मकान बना रहे थे। आशीष की ज्यादातर नौकरी बठिंडा, बारामूला और मेरठ में रही। वे 2018 में पदोन्नत होकर मेजर बने थे। उनकी ढाई साल पहले ही मेरठ से राजौरी में तैनाती हुई थी। उनकी 15 नवंबर 2015 को जींद की ज्योति के साथ शादी हुई थी।

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