संवाद न्यूज एजेंसी बादली। इसको हवेलियों का गांव भी कहा जाता है। कई सुरंगों और सात तलों से बनी सात चौकी हवेली आज भी इतनी बड़ी है कि अनजान व्यक्ति को बाहर निकलने में घंटों लग जाते हैं। लाल हवेली, तीन गुंदों वाली मस्जिद और बाग की छतरी आज भी गांव की शौभा बढ़ा रही हैं। एतिहासिक स्मारक के तौर पर मुगलकालीन लाल हवेली के बारे में बताया जाता है कि दिल्ली के लाल किले के निर्माण होने से बाद बची हुई निर्माण सामग्री से लाल हवेली का निर्माण किया गया था। यही है बादली की पहचान जिसमें पुरानी हवेलियों से झलकता इतिहास, मंदिरों में बसती है बदली की आत्मा बस्ती है। गांव की हवेलियां सुनाती हैं किस्से, मंदिर-मस्जिद भाईचारे का संदेश देती है। लाल हवेली से दादा सारंददेव मंदिर तक, विरासत का अनोखा संगम है। 500 साल पुराना इतिहास आज भी शान से खड़ा है। बादली गांव की हवेलियां, मंदिर और मस्जिद शान बना रहे हैं। आस्था, इतिहास और भाईचारे की मिसाल पर हवेलिया और मंदिर कायम है।