हांसी–जींद मार्ग पर जिला मुख्यालय से करीब 16 किलोमीटर दूर स्थित गांव माढ़ा अपने गौरवशाली इतिहास, सामाजिक समरसता और शिक्षा के स्तर के लिए क्षेत्र में अलग पहचान रखता है। करीब 410 वर्ष पहले चरखी (दादरी) क्षेत्र से आए माढ़ सांगवान ने इस गांव की स्थापना की थी और उन्हीं के नाम पर इसका नाम माढ़ा पड़ा। आज करीब 3,040 की आबादी और 1,720 मतदाताओं वाला यह गांव अपनी विरासत और सामूहिक संस्कृति के लिए जाना जाता है। इतिहास से जुड़ी पहचान, नहर किनारे बसी बस्ती माढ़ा गांव का आरंभ चितंग नहर के किनारे हुआ, जिसे आज हिसार मेजर डिस्ट्रीब्यूटरी के नाम से जाना जाता है। इसी क्षेत्र से आगे चलकर जनता नगर बसा, जहां जाट, यादव और झीमर समाज के लोग रहते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार माढ़ा और थुराना गांव लगभग एक ही समय में बसे थे लेकिन विकास के मामले में माढ़ा अब भी कुछ पीछे माना जाता है। करीब 694 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस गांव में लगभग 8 हजार बीघा भूमि खेती योग्य है। जाट, ब्राह्मण, पंजाबी, अहीर, वाल्मीकि, धानक, हेड़ी और बनिया समाज के लोग यहां आपसी भाईचारे के साथ रहते हैं। जाटों में चहल गोत्र की संख्या अधिक है, जो गांव की सामाजिक संरचना में अहम भूमिका निभाते हैं।